महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्

श्लोक २

Shloka 2

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि कल्मषमोषिणि घोषरते ।
दनुजनिरोषिणि दुर्मदशोषिणि दुर्मुनिरोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
सुरवरवर्षिणि सुर + वरवर्षिणि
सुर = देवता
वरवर्षिणि = वरदान बरसाने वाली
दुर्धरधर्षिणि दुर्धर + धर्षिणि
दुर्धर = एक असुर का नाम है
धर्षिणि = प्रहार करने वाली, उसे पराभूत करने वाली
दुर्मुखमर्षिणि दुर्मुख + मर्षिणि
दुर्मुख = एक असुर का नाम है
मर्षिणि = जूझने वाली, मार डालने वाली
हर्षरते = हर्षित रहने वाली व हर्षित करने वाली
त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते
त्रिभुवनपोषिणि = तीनों लोकों का पालन-पोषण करने वाली
शंकरतोषिणि = शिव को प्रसन्न व परितुष्ट रखने वाली
कल्मष = पाप, अपराध
मोषिणी = नष्ट करने वाली
घोषरते = (युद्ध में आयुधों के) घोष यानि ध्वनि से प्रसन्न होने वाली
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
दनुजनिरोषिणि दनुज + निरोषिणि
दनुज = दनु के पुत्र अर्थात् दानव
निरोषिणि = संहार करने वाली
दुर्मदशोषिणि दुर्मद + शोषिणि
दुर्मद = (बल के)  मद से उन्मत्त (दैत्यों का)
शोषिणि = शोषण करने वाली
दुर्मुनिरोषिणि दुर्मुनि + रोषिणि
दुर्मुनि = सदाचार से विमुख मुनिगण (पर)
रोषिणि = क्रोध करने वाली
सिन्धुसुते = (हे) सागर-कन्या
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि शैलसुते
महिषासुरमर्दिनी महिषासुर + मर्दिनी
महिषासुर = यह एक असुर का नाम है
मर्दिनी = घात करने वाली
रम्यकपर्दिनि रम्य + कपर्दिनि
रम्य = सुन्दर, मनोहर
कपर्दिनि = जटाधरी
शैलसुते = हे पर्वत-पुत्री

अन्वय

(हे) सुर वरवर्षिणि दुर्धर धर्षिणि दुर्मुख मर्षिणि (हे) हर्षरते (हे) त्रिभुवन पोषिणि शंकर तोषिणि कल्मष मोषिणि (हे) घोषरते (हे) दनुज निरोषिणि दुर्मद शोषिणि दुर्मुनि रोषिणि (हे) सिनधुसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि (जय जय हे) शैलसुते ।

भावार्थ

हे सुरों पर वरदानों का वर्षंण करने वाली, दुर्मुख और दुर्धर नामक दैत्यों का संहार करने वाली, सदा हर्षित रहने वाली, तीनों लोकों का पालन-पोषण करने वाली, शिवजी को प्रसन्न रखने वाली, पापों को (व पापियों  को) नष्ट करने वाली, हे (नाना प्रकार के आयुधों के) घोष से प्रसन्न होने वालीं, दनुजों के रोष को निरोष करने वाली – निःशेष करने वाली, तात्पर्य यह कि दनुजों को ही समाप्त करके उनके रोष (क्रोध) को समाप्त करने वाली, दुर्मद दैत्यों को, यानि मदोन्मत्त दैत्यों को, भयभीत करके उन्हें सुखाने वाली (उनके प्राण सुखाने वाली), (सदाचार से विमुख) मुनिजनों पर क्रोध करने वाली हे सागर-पुत्री ! हे महिषासुर का घात करने वाली, सुन्दर जटाधरी गिरिजा ! तुम्हारी जय हो, जय हो !

व्याख्या

महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम् के दूसरे श्लोक में देवी के उस रूप की स्तुति की गई है, जिसमें वे दैत्यराज महिषासुर के योद्धाओं का वध करती हैं । उनको दिए गए सम्बोधनों को भी उसी कथा के सन्दर्भ में देखा जाना उपयुक्त है । स्तोत्र के रचयिता देवी का स्तवन करते हुए कहते हैं कि हे देवताओं पर वरदान-वर्षण करने वाली, दुर्मुख और दुर्धर नामक दैत्यों का संहार करने वाली, सदा हर्षित रहने वाली, तीनों लोकों का पालन-पोषण करने वाली, समस्त जगत का शुभ करने वाले और अपने स्वामी भगवान शंकर को प्रसन्न रखने वाली, पापों को, दोषों को दूर करने वाली, हे (नाना प्रकार के आयुधों के) घोष में रत हे देवी, अधर्म में रत रहने वाले दनुजों के रोष को निरोष करने वाली – निःशेष करने वाली, तात्पर्य यह कि दनुजों को ही समाप्त करके उनके रोष (क्रोध) को समाप्त करने वाली, मदोन्मत्त दैत्यों को, भयभीत करके उन्हें सुखाने वाली, तात्पर्य यह कि उनके ओज और जीवनरस को सुखा कर उन्हें प्राणहीन करने वाली साथ ही उन मुनि जनों पर क्रोध करने वाली जो सदाचार का पालन नहीं करते तथा हे सागर-पुत्री !  हे महिषासुरमर्दिनी , हे सुकेशिनी, नगेश-नंदिनी ! तुम्हारी जय हो, जय हो !

lakshmi_in_oceanप्रस्तुत श्लोक में स्तुतिकार देवी को सुरवरवर्षिणि कह कर सम्बोधित करता है, जिसका अभिधार्थ (स्पष्ट शाब्दिक अर्थ) है, देवताओं पर वरदानों की वर्षा करने वाली तथा निहितार्थ (इसके भीतर निहित अर्थ) है, देवों पर सदैव प्रसन्न रहने वाली एवं उन पर अपनी कृपा बरसाने वाली । देवताओं द्वारा प्रार्थना किये जाने पर उनकी रक्षा व सहायतार्थ (सहायता के लिये) वे प्रकट हो जाती हैं । इसीलिये वरवर्षिणी कहा है । क्योंकि देवी या देवता वर उसीको देते हैं, जिन पर वे प्रसन्न होते हैं । उनका प्रकट होना स्वयं ही एक वरदान है । महिषासुर से त्रस्त देवताओं के सम्मुख देवी का प्रकट हो कर,उन्हें अभय देना, युद्ध में उनके शत्रुओं को मृत्यु-शैय्या देना (मार देना), देवों का प्रिय (भला) करना, उनका अभीष्ट सिद्ध करना आदि सुरों पर वरदानों का वर्षण है । देवी ने देवताओ की स्तुति से प्रसन्न हो कर उन्हें वरदान देते हुए आश्वासन दिया था कि “पृथ्वी पर जब जब असुरों की उत्पति बढ़ेगी, मैं विभिन्न रुपों में अवतीर्ण हो कर उनका नाश और तुम्हारी रक्षा करुँगी ।”

दुर्मुख तथा दुर्धर महिषासुर के शूरवीर दैत्ययोद्धा थे, जिन्हें रण में देवी ने मार गिराया और वे कवि द्वारा दुर्धरधर्षिणि तथा दुर्मुखमर्षिणि कह कर पुकारी गईं । जब वे देवों का अभीष्ट सिद्ध करती हैं, तब वे हर्षित होती हैं । देवताओं को कार्यसिद्धि का आश्वासन दे कर देवी ने प्रचंड अट्टहास किया, जिसके महाभयानक गर्जन को सुन कर पृथ्वी कांपने लगी, पर्वत चलायमान होने लगे और दानव उस तीव्र ध्वनि को सुन कर डर गए एवं देवतागण प्रसन्न हो गए । इसी प्रकार दैत्यराज के भेजे गए दूत्त से उसका प्रणय-संदेश सुन कर भी देवी जोर से हंसती हैं तथा मेघ-गंभीर वाणी में कहती हैं कि “मैं दैत्यों का नाश करने वाली महालक्ष्मी हूँ । तुम जा कर महिषासुर से कह दो कि हे महामूढ़ ! मैनें युग-युग में तुम्हारे जैसे असंख्य दैत्यों का संहार किया है, उसी प्रकार मैं तुम्हें भी मार दूँगी। काम-पीड़ित तुम रण में मेरे साथ युद्ध करो ।” इस प्रकार देवी के आख्यानों (कथाओं) में अनेक बार उनके हास के विभिन्न प्रसंग आते हैं । कहीं पर मंद-मंद मुस्कान बिखेरती, लावण्यमयी नारी के रूप में, कहीं आर्त -जनों की पुकार पर अपने प्राकट्य के समय वे मधुर हास से युक्त होती हैं, तो अधर्मी असुरों को ललकारते समय भीषण अट्टहास से गर्जना करती हैं । अपने कृपामय एवं कोपमय- दोनों रूपों में देवी दिव्य हास में रत रहती हैं । असुरों का घात करके, उनसे त्रस्त जनों को तुष्ट करके वे हर्षित होती हैं । अतएव उन्हें हर्षरते कह कर सम्बोधित किया है । हर्षमंगलकारिका, हर्षमंगलचण्डिका आदि माँ के नाम उनके भिन्न भिन्न स्तोत्रों में मिलते हैं ।

देवी को त्रिभुवनपोषिणि कहने से तात्पर्य है, उनके द्वारा- जगन्माता द्वारा तीनों लोकों का भरण-पोषण करना । वे स्वयं ही प्रकृति हैं और प्रकृति अपने सभी जीवों के लिए उनकी क्षुधा (भूख) के अनुसार भोजन की व्यवस्था करती हैं । वे ही देवी अन्नपूर्णा हैं, भुवनेश्वरी है । उन्हीं से देवता अपना यज्ञ-भाग पाते हैं । महिषासुर के वध के अनन्तर (पश्चात्) हर्षोल्लास से भरे हुए देवता उनकी स्तुति करते हुए उनसे यह कहते हैं कि वे ही स्वाहा के रूप में मुनियों द्वारा विधिवत् प्रदत्त आहुति-रूप यज्ञ-भाग देवताओं को लब्ध कराती हैं । देवों के पुष्ट होने से, तृप्त होने से पृथ्वी पर मेघ बरसते हैं और वह भी पुष्ट व प्रसन्न होती है । देवी भागवत के तृतीय स्कंध, छठे अध्याय में वर्णित है कि जब वे महासरस्वती, महालक्ष्मी, और महाकाली नामक अपनी शक्तियों को क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और शिव को प्रदान करती हैं , तब वे त्रिदेवों तथा अन्य देवगणों से कहती हैं कि “सभी यज्ञों में मेरे नाम का उच्चारण करते ही आप सभी लोग सदैव तृप्त हो जायेंगे ।” त्रिदेव की पुष्टि ही वास्तव में त्रिभुवन-पोषण है, इसीसे स्तुतिकार ने देवी को त्रिभुवनपोषिणि कह कर पुकारा ।

देवी पार्वती भगवान शंकर की पत्नी हो कर उन्हें पूर्णतया तोष अर्थात् संतोषमय आनंद देती हैं । उनका मन मुदित रखती हैं, जिससे देवी शिव-मनोरमा कहलाती हैं । शिव-पार्वती सनातन दिव्य दंपति हैं । वे शिव की शक्ति हैं । दोनों के प्रातः विहार तथा सांध्य विहार की अनेक कथाएँ धार्मिक ग्रंथों में प्राप्त होती हैं । शिवरानी हो कर वे काशीपुराधीश्वरी भी कहलाती हैं । जब वन के भोलेभाले भीलों के बीच भगवान शिव भील के रूप में पहुंचते हैं तो उनके साथ देवी भी भीलनी रूप में लीलाएं करती हैं । उनके किराती, शबरी, मातंगी आदि नाम भी इसीलिये हैं । दिव्य-दंपत्ति द्वारा निर्मित शाबर-मन्त्र उनकी इसी नाट्यलीला के सुफल हैं । इस प्रकार वे शंकरतोषिणि कही गई हैं ।

कल्मष का अर्थ है त्रुटि, अपराध, पाप तथा पापी आदि भी ।  देवी सभी के पाप, दोष करने वाली जगज्जननी हैं । अपने अपराध का बोध होने पर, उसका स्वीकार कर लेने से, अपना दोषजन्य दुःख माता के सम्मुख कह देने से वे करुणामयी क्षमा करने में किंचित भी विलम्ब नहीं करती हैं । श्री शंकराचार्य ने देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् की रचना की है, जिसमें वे देवी से कहते हैं कि हे माता ! मैं तुम्हारा मन्त्र, यंत्र, स्तुति, आवाहन, ध्यान, स्तुतिकथा, मुद्रा आदि कुछ भी नहीं जानता । आगे कहते हैं कि तुम्हारे चरणों की सेवा करने में जो भूल हुई हो, उसे क्षमा करो । बारह श्लोकों के इस पवित्र स्तोत्र का अंतिम श्लोक उदहारण के रूप में दिया जा रहा है ।

मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि ।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथा योग्यं तथा कुरु ।।

अर्थात् हे महादेवि ! मेरे समान कोई पापी नहीं है और तुम्हारे समान कोई पाप-नाश करने वाली नहीं है, यह जान कर जैसा उचित समझो वैसा करो ।

महिषासुर के वध के लिए देवी को सभी देवताओं द्वारा विविध आयुध प्रदान किये गए थे, जो दैत्यों व उनके राजा महिषासुर का संहार करने में समर्थ थे । अठारह भुजाओं वाली देवी ने संग्राम में सहस्रों भुजाएं धारण कर ली थीं और उन हाथों में वे शस्त्राशस्त्र विविध प्रकार की टंकार और रणकार उत्पन्न करते थे । वह ध्वनि देवी के विजय घोष के समान थी तथा वह घोष, युद्ध करती हुई देवी को प्रसन्न करता था । रत रहने का अर्थ केवल व्यस्त या मग्न रहना ही नहीं है, अपितु इसका अर्थ प्रसन्न होना भी है । युद्ध क्षेत्र के उस कोलाहल में, तुमुल घोष में रत अथवा तत्पर भगवती को घोषरता नाम कवि द्वारा दिया गया । पुकारते समय रता का रते रूप बन गया । अत: उन्हें घोषरते कह कर पुकारा गया ।

दनुज अर्थात् असुरों के रोष (क्रोध) को देवी ने समाप्त किया, स्वयं असुरों को ही समाप्त करके । क्रुद्ध होना व अत्याचार करना दैत्यों की सहज प्रकृति थी, जिसमें रत होकर वे पशुवत् जीवन-यापन करते थे । वस्तुतः (वास्तव में) पुराणों में वर्णित आख्यानों (कथाओं) में हमें अति पुरातन काल के जीवन की अवस्था और व्यवस्था की झांकी मिलती है । जिस समय नदियों के आसपास मानव सभ्यता ने पहलेपहल अपनी आँखें खोलीं, उस समय सब ओर प्राकृतिक वन थे और साथ ही थे, उन वनों में रहने वाले वन्य जीव, जिनसे निपटना सरल नहीं था । मानव की शारीरिक शक्ति उनसे बहुत कम थी । अतः अन्य आपदाओं की तरह इस आपदा से पार पाने के लिये भी दैवीय सहायता की आवश्यकता प्रतीत हुई व फलस्वरूप प्रार्थनाएं की गईं । तब शक्तिरूपिणी देवी अवतरित होने पर बाध्य हुईं । क्योंकि उनकी कृपा के बिना क्रमिक विकास की अगली अवस्था पर पहुंचना संभव नहीं था । महिषासुर सींगों वाला भैंस था । मानव-जीवन के विकास के लिये उसका तथा मद में अन्धे उसके साथियों का वध भगवती के हाथों हुआ । अतः देवी को दनुजनिरोषिणि कहा । इसके तुरंत बाद दुर्मदशोषिणि कह कर कवि ने उन्हें पुकारा । वे मदोत्कट दैत्यों पर वे क्रोध करने वाली देवी हैं । जब उनकी निष्कपट-निर्दोष संतान को अधम, दुर्दान्त, मदान्ध दैत्य पीड़ित करते हैं तो वे चण्डिका क्रोध से आँखें लाल करते हुए उनका सर्वनाश करने पर उद्यत (उतारू) हो जाती हैं । सिंह पर सवार हो कर जब वे दैत्यों को ललकारते हुए गगनभेदी गर्जना करती हैं तो दुर्मद अर्थात् मद में अंधे हो कर दुष्ट आचरण करने वाले राक्षसों के दिल दहल जाते हैं, भय के कारण उनकी ऊर्जा, उनका रक्त सूख जाता है, जिससे वे दुर्मदशोषिणी कहलाईं । दुराचार करने वाले असुर हों या कोई अन्य, देवी पक्षपात-रहित रहती हैं । चाहे उनकी उपासना करने वाले मुनिजन ही क्यों न हों, आचरण की, चरित्र की भ्रष्टता देवी को क्रुद्ध करती है । अत: माँ को दुर्मुनिरोषिणि कह कर पुकारा । महालक्ष्मी के सागर से उद्भूत होने की कथा सर्वज्ञात है । अमृत प्राप्ति के लिए किये गये सागर-मन्थन से देवी महालक्ष्मी का प्राकट्य हुआ, जिसके कारण वे सिन्धु-सुता या सागर-सुता कहलाईं । उन्हें स्तुतिकार ने सिन्धुसुते कह कर संबोधित किया है । अंतिम पंक्ति में जयजयकार करता हुआ कवि कहता है, हे महिषासुर का घात करने वाली, सुन्दर जटाधरी गिरिजा ! तुम्हारी जय हो, जय हो !

पिछला श्लोक अनुक्रमणिका अगला श्लोक

Separator-fancy

6 comments

    • Kiran Bhatia says:

      कृपया कुछ समय दें , माँ की कृपा से यह भी हो जायेगा । इति शुभम् ।

  1. Rashmi says:

    बहुत सुन्दर अनुवाद व व्याख्या कृप्या सम्पूर्ण स्तोत्र की व्याख्या उपलब्ध करायें!

    • Kiran Bhatia says:

      धन्यवाद रश्मिजी । कृपया आगे के पृष्ठों का अवलोकन करें, संपूर्ण स्तोत्र की श्लोक-प्रति-श्लोक व्याख्या दी गई है । इति शुभम् ।

    • Kiran Bhatia says:

      Glad to know that Nileshji. You are welcome. Please feel free to ask any question regarding the stotra . We will try our best to clear the doubts, if any and make it easier for भगवती-प्रिय पाठक-वृन्द । Thanks.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *