महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्

श्लोक ३

Shloka 3

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्बवनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुंगहिमालय श्रृंगनिजालय मध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगंजिनि कैटभभंजिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्बवनप्रियवासिनि हासरते
अयि = हे (यह संबोधन है)
जगदम्ब जगत् + अम्ब
जगत् = संसार
अम्ब = माता
मदम्ब मत् + अम्ब
मत् = मेरी
अम्ब = माँ
कदम्बवनप्रियवासिनि कदम्बवन + प्रियवासिनि
कदम्बवन = कदम्ब का वृक्षों के वन
प्रियवासिनि = वास करना प्रिय है जिसे
हासरते = हँसी में रत, हँसी से युक्त
शिखरिशिरोमणितुंगहिमालयश्रृंगनिजालय मध्यगते
शिखरिशिरोमणितुंगहिमालयश्रृंगनिजालय शिखरि + शिरोमणि + तुंग + हिमालय + श्रृंग + निज + आलय
शिखरि = पहाड़
शिरोमणि = सिरमौर, सर्वाधिक ऊंचा
तुंग = उन्नत, प्रमुख
हिमालय = हिमालय पर्वत
श्रृंग = चोटी
निज = अपना, स्वयं का
आलय = घर, आवास
मध्यगते = मध्य अर्थात् बीच में गई हुई
मधुमधुरे मधुकैटभगंजिनि कैटभभंजिनि रासरते
मधुमधुरे = (हे) मधु-सी मीठी
मधुकैटभगंजिनि मधु + कैटभ + गंजिनि
मधु = यह एक दैत्य का नाम है
कैटभ = यह भी एक दैत्य का नाम है
गंजिनि = जीतने वाली, पराजित करने वाली
कैटभभंजिनि कैटभ + भंजिनि
कैटभ + भंजिनि = कैटभ को नष्ट करने वाली
रासरते = (हे) कोलाहल में रत और कोलाहल मचाती हुई
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि शैलसुते
महिषासुरमर्दिनी महिषासुर + मर्दिनी
महिषासुर = यह एक असुर का नाम है
मर्दिनी = घात करने वाली
रम्यकपर्दिनि रम्य + कपर्दिनि
रम्य = सुन्दर, मनोहर
कपर्दिनि = जटाधरी
शैलसुते = हे पर्वत-पुत्री

अन्वय

अयि मत् अम्ब जगत् अम्ब कदम्बवन प्रियवासिनि (हे) हासरते (हे) शिखरिशिरोमणि हिमालय तुंग श्रृंग निज आलय मध्यगते (हे) मधुमधुरे मधुकैटभगंजिनि कैटभभंजिनि (हे) रासरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि (जय जय हे) शैलसुते ।

भावार्थ

कवि महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम् के तीसरे श्लोक में स्तुति करते हुए भगवती से कहते हैं – हे जगन्माता, हे मेरी माता ! अपने प्रिय कदम्ब-वृक्ष के वनों में वास व विचरण करने वाली हे हासरते ! हासरते अर्थात उल्लासमयी, हास-उल्लास में रत। ऊंचे हिमाद्रि के मुकुटमणि सदृश सर्वोच्च शिखर के बीचोबीच जिसका गृह (निवासस्थान) है, ऐसी हे शिखर-मंदिर में रहने वाली देवी ! मधु के समान मधुर ! मधु-कैटभ को पराभूत करने वाली, कैटभ का संहार करने वाली, कोलाहल में रत रहने वाली, हे महिषासुरमर्दिनि, हे सुकेशिनी, हे नगेश-नंदिनी ! तुम्हारी जय हो, जय हो !

व्याख्या

Forest Flowers Desktop Backgroundमहिषासुरमर्दिनी के तीसरे श्लोक में स्तुतिकार भगवती को संबोधित करते हुए कहता है कि हे जगन्माता, हे मेरी माता ! हे कदम्ब वृक्षों से सुगन्धित वनों में विचरण करना पसंद करने वाली माता, इन सुगन्धित वनों में वास करना तुम्हें प्रिय है । वहां वास करना आपको हास-उल्लास से भर देता है । कदम्ब वृक्षों से सघन, सुगन्धित वन आपको प्रिय हैं । कदम्ब की मधुर-मादक गंध से सुरभित वनों में वास व विचरण करने वाली हे कदम्बगंधप्रिय माता !  वस्तुत: कदम्ब के वन-वृक्ष मां को अतीव प्रिय है । ध्यातव्य है कि हिमालय के कुछ नीचे के भागों में इन वनों की बहुलता है तथा माता पार्वती हिमालय-सुता हैं । यही सघन वन उनके कौमार्य-काल की क्रीड़ा-स्थली रहे हैं । अतः कदम्ब-कुंजों से उनका प्रेम स्वाभाविक है । वस्तुतः कदम्ब अथवा नीप का वृक्ष माता पार्वती का वृक्ष माना जाता है, जैसे नीम का वृक्ष शीतला माता का । पर्वतीय प्रकृति में और नदी के कछारों में अपने रूप-रंग-गंध की स्वर्गीय सुषमा बिखेरते जुए कदम्ब के शोभाकर वृक्ष अपनी मधुर-मादक गंध के लिए जाने जाते हैं । इनकी शाखाओं-कोटरों से चूता हुआ द्रव कदम्ब-मधु अथवा नीरा कहलाता है । इन वृक्षों से इत्र भी बनता है और वारुणी भी । कदाचित् कादंबरी के नाम से जाने वाली वारुणी यही है । कदम्ब वृक्ष की वारुणी व सुवास के कारण इस वृक्ष का जुड़ाव गन्धर्व संस्कृति तथा कामदेव से भी है । प्राचीन काल में हिमालय के निचले भागों में किरातों की गन्धर्व-शाखा वास करती थी (इनका उल्लेख कालिदासकृत कुमारसम्भवम् में मिलता है) । मान्यता है कि मध्यरात्रि के समय कदम्ब के बन-कुंजों में गन्धर्वों की बाँसुरी बजती है । प्रकृति और पर्यावरण के प्रहरी-से प्रतीत होते हुए कदम्ब के लम्बे, छरहरे वृक्ष बारहों महीने हरे-भरे रहते हैं और तेजी से बढ़ते हैं । लाल-गुलाबी, पीत -हरित, गोल-गोल व छोटे फूलों से कुसुमित तथा मीठी-मादक गंध से सुरभित कदम्ब का वृक्ष भगवान श्रीकृष्ण का अति प्रिय वृक्ष रहा है । कदम्ब तरु के तले खड़े हो कर वे अपनी बांसुरी की मनमोहिनी तान छेड़ते थे । यहाँ वृक्ष के साथ-साथ कदम्ब शब्द सुगंध का भी बोध कराता है ।

संस्कृत भाषा में कदम्ब शब्द के अनेक अर्थ होते हैं । यद्यपि सर्वाधिक प्रचलित अर्थ कदम्ब का वृक्ष है, किन्तु इसके अलावा समूह या समुच्चय का भी वाचक है यह शब्द । इसका एक अन्य अर्थ हल्दी तथा सुगन्धित भी है, जैसे कदम्ब वायु, अर्थात् सुगन्धित वायु । देवी-देवता सुगन्ध-प्रिय होते हैं । पहाड़ों के वनों की, वनौषधियों और बनफूलों से युक्त अपनी एक विशिष्ट, एक अलग सुगन्ध होती है, जिससे पर्वतप्रेमी और पर्वतारोहण करने वाले लोग बहुत भलीभाँति परिचित होते हैं । अगली पंक्ति में माता को शिखरि कह कर संबोधित किया है । शिखरी अर्थात् ऊँची पर्वतचोटी वाली । लोकगीतों व भजनों में भी इन्हें उच्चे पहाड़ां वाली या ऊँचे पहाड़ वाली माता कह कर पुकारा जाता है । वे शिखरी हैं, अतः पर्वतीय वनस्थली, वहाँ का वनविहार व वनसौरभ उन्हे प्रिय है । देवी का वास साधारण शिखर पर नहीं हैं, अपितु (बल्कि) हिमालय के मुकुटमणि (शिरोमणि) जैसे लगने वाले सर्वाधिक ऊंचे शिखर अथवा चोटी पर मन्दिर यानि आवास है उनका । ऐसी ऊँची चोटी पर रहने वाली का वनप्रियवासिनी होना कोई आश्चर्य की बात नहीं । सौरभमय सघन वनों की सुगन्ध उनका मन मोहती है, रम्य शिखर उन्हें उल्लसित व प्रमुदित रखते हैं । इस प्रकार हास-उल्लास में रत रहने वाली वे हासरता हैं, अतः हासरते कह कर सबोंधित किया है ।

देवी को हासरते कह कर सम्बोधित करने से अन्य अभिप्राय यह भी है कि जब वे देवों के सम्मुख उनके द्वारा प्रदत्त आभूषणों और आयुधों से सुसज्जित होकर उनके तेजांशों से प्रकट हुईं थीं, तब माता ने भयंकर अट्टहास किया था, जिसे सुन कर दैत्यराज महिषासुर ने क्रुद्ध होकर अपने दूतों को भेजा,  उस हास की ध्वनि के उद्गम-स्थल का पता लगाने के लिए । फलतः दूतों ने जब अठारह भुजाओं वाली, उत्तम आयुधों से सज्जित, दिव्यविग्रहमयी देवी को देखा तो वे भयभीत हो वहां से भाग खड़े हुए व महिषासुर से जाकर बोले कि यह हास की ध्वनि किसी अद्भुत स्त्री की है, जो श्रृंगार, वीर, रौद्र व अद्भुत रस के साथ हास्यरस से भी परिपूर्ण है । दैत्यराज ने अपनी कामुकता के वशीभूत होकर उस अद्भुत सुंदरी को पाना चाहा । फलत: वहां अपने दूत भेजे ।  प्रेम-सन्देश ले कर जब भी उसका कोई दैत्य देवी के पास जाता, तब वे इसी प्रकार जोर से हंस पड़ती थीं और महिषासुर को युद्ध के लिए ललकारतीं थीं । उसके द्वारा भेजे गए प्रत्येक दूत के आने पर वे देती हैं । उस हंसी में उनकी विजय का उदघोष था, दुरात्मा-दुष्ट के संहार का प्रबल निश्चय व एक प्रकार से उसके सर्वनाश की सूचना भी थी ।  इस कथा में बार-बार देवी के इसी प्रकार हंसने का प्रसंग आता है, अतः उन्हें हासरते कह कर पुकारने का यह भी एक अभिप्राय है ।

आगे कहा गया है कि हे देवी ! तुम मधु के समान मधुर यानि शहद-सी मीठी हो, मधु और कैटभ- इन दैत्यों को धराशायी करने वाली हो, कैटभ को मारने वाली हो तथा तुम रास में अर्थात् कोलाहल में रत रहने वाली हो । रासरते शब्द ध्यातव्य (ध्यान देने योग्य) है । रास शब्द से प्रायः उसका प्रचलित तथा प्रसिद्ध अर्थ भगवान कृष्ण का राधा और गोपियों के साथ किया गया मण्डलाकार नृत्य ही लिया जाता है । किन्तु इस शब्द का एक और अर्थ कोलाहल, शोर, मस्ती-हुड़दंग या अन्य किसी प्रकार की की ऊंची आवाज़ें, एवं हल्ला-गुल्ला भी है । और यही अर्थ यहाँ अभिप्रेत है । युद्ध-स्थल में तरह तरह का कोलाहल उठता है, कहीं लड़ने वालों की ललकार, कहीं मार-काट व हाहाकार, कहीं घायलों का चीत्कार, कहीं तलवारों की रणकार तो कहीं धनुषों की टंकार । क्रोध में भरी हुईं देवी रणचण्डी बन कर जब दैत्यों का सर्वनाश करती हैं, तब संग्राम-स्थल पर हाहाकार मच जाता है, सर्वत्र कोलाहल की स्थिति बन जाती है, अतएव वे रासरता हैं ।

अंतिम पंक्ति में जयजयकार करता हुआ कवि कहता है, हे महिषासुर का घात करने वाली सुन्दर जटाधरी गिरिजा ! तुम्हारी जय हो, जय हो !

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