महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्

श्लोक ४

Shloka 4

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्ड गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्ड गजाधिपते
अयि = हे
शतखण्ड = सौ टुकड़े
विखण्डितरुण्ड विखण्डित + रुण्ड
विखण्डित = जो तोड़ दिया गया हो वह
रुण्ड = धड़
वितुण्डितशुण्ड वितुण्डित + शुण्ड
वितुण्डित = काटी गई
शुण्ड = हाथी की सूँड़
गजाधिपते = (हे) गजाधपति (श्रेष्ठ हाथी) को मारने वाली
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते
रिपुगजगण्ड रिपु + गज + गण्ड
रिपु = शत्रु (पक्ष)
गज = हाथी
गण्ड = हाथी के गाल व कनपटी समेत मुख पूरा भाग
विदारणचण्ड विदारण + चण्ड
विदारण = चीर डालना
चण्ड = (चीर डालने में) क्रूरता से निपुण
पराक्रमशुण्ड पराक्रम + शुण्ड
पराक्रम = शौर्य, आक्रामक
शुण्ड = सूँड़
मृगाधिपते = मृगाधिपति अर्थात् सिंह की (हे) स्वामिनी
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्डभटाधिपते
निजभुजदण्ड निज + भुज + दण्ड
निज = अपनी
भुज = भुजा में उठाये हुए
दण्ड = त्रिशूल-दण्ड
निपातितखण्ड निपातित + खण्ड
निपातित = (भू पर) नीचे फेंक दिये गये
खण्ड = टुकड़े टुकड़े
विपातितमुण्ड विपातित + मुण्ड
विपातित = काट डाले गये, गिरा दिये गये
मुण्ड = मस्तक
भटाधिपते = भटाधिपति अर्थात् चण्ड योद्धा (हे उन्हें मारने वाली )
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि शैलसुते
महिषासुरमर्दिनी महिषासुर + मर्दिनी
महिषासुर = यह एक असुर का नाम है
मर्दिनी = घात करने वाली
रम्यकपर्दिनि रम्य + कपर्दिनि
रम्य = सुन्दर, मनोहर
कपर्दिनि = जटाधरी
शैलसुते = हे पर्वत-पुत्री

अन्वय

वितुण्डितशुण्ड शतखण्ड विखण्डितरुण्ड अयि गजाधिपते पराक्रमशुण्ड रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड (हे) मृगाधिपते (हे) निजभुजदण्ड विपातितमुण्ड निपातितखण्ड भटाधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि (जय जय हे) शैलसुते ।

भावार्थ

शत्रु सैन्य के हाथियों की सूंड काट कर उनके खंड-खंड हुए धड़ों के सौ सौ टुकड़े करने वाली (हे) गजराजगंजिनि, जिनका सिंह शत्रुओं के बलवान हाथियों के मुंह-गाल नोच नोच कर चीर डालने में हिंसक रूप से पटु है, ऐसी हे सिंहवाहिनी, भुजा में उठाये हुए त्रिशूलदण्ड से शत्रुपक्ष के चण्ड योद्धाओं के मुंड (सिर)    गिरा कर, खण्ड खण्ड करके फेंक देने वाली (हे) दैत्यनिषूदिनी ! हे महिषासुर का घात करने वाली सुन्दर जटाधरी गिरिजा ! तुम्हारी जय हो, जय हो !

व्याख्या

111महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम् के चौथे श्लोक में स्तुतिकार देवी के रणचंडी रूप का स्तवन करते हुए कहता है कि वे शत्रुपक्ष के गजाधिपतियों अर्थात् श्रेष्ठ व बलशाली हाथियों की सूंड काट कर उनके धड़ों को छिन्न-भिन्न कर देती हैं, इसलिए  ऐसी गजराजसंहारिणी देवी को इस श्लोक की पहली पंक्ति में गजाधिपतियों को सूँड़-रहित करके उनके कटे हुए धडों के सौ-सौ टुकड़े करने वाली कह कर पुकारा है । गजाधपति का अर्थ हाथियों का स्वामी भी होता है तथा उत्तम हाथी भी होता है । यहां तात्पर्य श्रेष्ठ हाथियों से है, जिनकी सूँड़ में बहुत बल है और जो आक्रामक हैं ।

देवी सिंहवाहिनी हैं, सिंहसंचारिणी हैं, सिंह उनका वाहन है । शत्रुओं के विशाल हाथी पराक्रमी हैं तो देवी का सिंह भी भयंकर है । वह बलशाली सूँड़ वाले हाथियों के गण्ड-स्थल अर्थात् मुख, गाल और कान के पार्श्व भाग चीर डालने में बड़े हिंस्र रूप से पटु है । मृगाधिपति कहते हैं मृगराज अर्थात् सिंह को । देवी ऐसे गजघाती मृगाधिपति की स्वामिनी हैं । देवी से सम्बद्ध विभिन्न पुराणों में वर्णित महिषासुर की कथाओं में उनके सिंह का विकराल रूप परिलक्षित होता है । वह रण में भयंकर गर्जना करता हुआ असुरों के प्राणों को हरता है, हाथियों के ऊपर छलांग लगा कर चढ़ जाता है आदि । देवी-भागवत की कथा के अनुसार देवी के सिंह ने महिषासुर के वीर योद्धा असिलोमा का ह्रदय अपने तीक्ष्ण नखों से विदीर्ण कर दिया था तथा लोहे की भरी गदा से अपने ऊपर प्रहार करने के लिए आते हुए अंधक नामक एक अन्य योद्धा को चीर कर उसका भक्षण कर लिया था । यहाँ इस श्लोक में बताया है कि देवी-वाहन प्रचंड सिंह रिपुपक्ष के पराक्रमी हाथियों के मुंह-गाल नोच लेता है, उनकी  सबल सूँड़ें उखाड़ फेंकता है । इस प्रकार वह रिपुगजगण्ड का विदारण करने में अर्थात् उन्हें चीर देने में चण्ड-चतुर है, अतः उसे विदारणचन्ड कहा, रिपुदल के हाथी पराक्रमी हैं, एतदर्थ उन्हें पराक्रमशुण्ड कहा और इन्हीं विशेषताओं से युक्त सिंह पर सवार देवी को रिपुगजगण्ड विदारणचन्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते कह कर पुकारा गया है ।

अपने हाथ में त्रिशलदण्ड लिए हुए देवी चंडी रूप धारण कर क्रोधपूर्वक शत्रु-योद्धाओं के रूण्डों से मुंड अलग कर देती हैं, अर्थात् उनके धड़ों से उनके मस्तक काट कर गिरा देती हैं  व खण्ड खण्ड करके उन्हें फेंक देती हैं ।  भटाधिपति का अर्थ है शूरवीर योद्धा, युद्धकुशल सेनानी । वे चण्ड असुर योद्धा निपातितखण्ड हो गए हैं, अर्थात् वे टुकड़े टुकड़े  हो कर भूमि पर गिरे हुए हैं । खंड यानि शरीर के खंड या टुकड़े और मुंड का अर्थ है मस्तक । दैत्यदुर्गतिकारिणी माता के चण्डशौर्य से बलवान व दुर्मद दैत्यों के कटे-बींधे, रक्तरंजित विपातितमुण्ड भू पर खण्ड खण्ड हो कर लोट रहे हैं । अतः कवि स्तुति करता है कि अपने भुजदंड से शूरवीर योद्धाओं के सर धड़ से अलग कर देने वाली हे देवी, हे महिषासुर का घात करने वाली सुन्दर जटाधरी गिरिजा ! तुम्हारी जय हो, जय हो !

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2 comments

  1. संदीप कुमार says:

    श्लोक 4 की व्याख्या में शतखणड स्थान पर शतखण्ड लिख कर त्रुटि को दूर करें।

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