महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्

श्लोक ५

Shloka 5

अयि रणदुर्मदशत्रुवधोदितदुर्धरनिर्जरशक्तिभृते
चतुरविचारधुरीणमहाशिवदूतकृतप्रमथाधिपते |
दुरितदुरीहदुराशयदुर्मतिदानवदूतकृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ

हे युद्ध में उन्मत्त हो जाने वाली, शत्रुओं का वध करने के लिए आविर्भूत होने वाली, उनके लिए दुस्सह, सदा युवा रहने वाली, शक्ति को धारण करने वाली या शक्ति से सज्जित, बुद्धिमानों में अग्रणी भगवान शिव को -भूतनाथ को, दूत बना कर भेजने वाली तथा अधम वासना व कुत्सित उद्देश्य से दैत्यराज शुम्भ द्वारा भेजें गये दानव-दूतों का अंत करने वाली, हे महिषासुर का घात करने वाली सुन्दर जटाधरी गिरिजा ! तुम्हारी जय हो, जय हो !

व्याख्या

`महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्` के पांचवें श्लोक में स्तुतिकार देवी को सम्बोधित करते हुए उन्हें `दुर्मद` कह कर पुकारता है क्योंकि वे रणभूमि में युद्धोन्माद (युद्ध का उन्माद) से भर जाती हैं, दैत्यों के वध का एक उन्माद उन पर छा जाता है, वे उनके रक्त की प्यासी हो जाती हैं । वस्तुतः (वास्तव में) देवताओं के तेजांशों से उनका आविर्भाव ही शत्रु महिष असुर (महिषासुर) व उसके अन्य असुरों को मारने के लिए हुआ था | देवी-भागवत में महिषासुर-वध की कथा के अनुसार देवी का आविर्भाव हुआ था देवताओं को वरदान-प्राप्त बलशाली महिषासुरके त्रास से मुक्त कराने के लिए। और उस समय सभी देवताओं ने अपने अपने तेज का अंश प्रदान किया था, जिससे एक अत्यंत दीप्तिमान तेजपुंज प्रकट हुआ था, भगवती के रूप में । उनकी अठारह भुजाएं थीं । तब सभी देवों ने उन्हें विविध आयुध व वस्त्राभूषण भी प्रदान किये। अतः देवी को `शत्रुवधोदित` कहा, यानि वे शत्रुओं के वध के लिए उदित (प्रकट) हुईं । शत्रु उन्हें किसी भी प्रकार से सह नहीं सकते थे, चाहे उनके हाथों में कोई भी, कितना भी शक्तिशाली आयुध क्यों न हो, यानि वे दुर्धर हैं, दुस्सह हैं, प्रचंड हैं । वे रणचंडी बन कर दैत्यों का संहार करती हैं । `निर्जर` अर्थात वृद्ध न होने वाली-नित्ययौवना हैं । जरा का अर्थ है बुढ़ापा, निर्जर यानि कभी वृद्ध न होने वाला, यानि सदैव युवा ओज से भरपूर । शक्तिभृता यानि शक्ति धारण करने वाली, शक्ति से सज्जित | और वही सम्बोधन के कारण हो गया `शक्तिभृते’ |देवी-भागवत की कथा के अनुसार अग्निदेव ने भगवती को शत्रुओं के संहार में सक्षम और मन के समान तेज गति करने वाली `शक्ति` प्रदान की थी । पूरी पंक्ति का अर्थ हुआ- हे नित्ययौवना, शत्रुओं के वध के लिए आविर्भूत, हाथ में शक्ति उठाये उनके रक्त की प्यासी, हे रणचंडी !

goddess_durgaइसके उपरांत अगली पंक्ति में देवी के द्वारा महादेव को दौत्य-कार्य के लिए भेजे जाने का संकेत देते हुए कहा है,`चतुरविचारधुरीणमहाशिव`अर्थात् चतुर या बुद्धिमत्तापूर्ण विचारणा करने वालों में अग्रणी यानि प्रमुख हैं जो, ऐसे महाशिव को, भूतप्रेतों के अधिपति को अपना दूत बनाने वाली,देवी ! शिवजी को दूत बना कर देवी द्वारा दैत्यराज शुम्भ के पास भेजने की कथा अति संक्षेप में इस प्रकार है । महान बलवाले दो भाई-शुम्भ-निशुम्भ अन्धक दानव के पुत्र थे । ब्रह्माजी से वर प्राप्त कर वे घमंड से मद में चूर हो गए थे । दोनों भाइयों ने तीनों लोकों को प्राप्त कर लिया था । शुम्भ ने इंद्रत्व प्राप्त कर देवताओं को स्वर्ग तथा यज्ञभाग से दूर कर दिया था । इंद्र सहित सब देवगण हिमालय पर्वत पर गए व महामाया की स्तुति की । प्रसन्न देवी प्रकट हुईं व देवताओं से उनकी व्यथ-कथा सुनकर भगवती ने अपने शरीर से एक दूसरा रूप प्रकट कर दिया । देवी के काय-कोष से निकलने के कारण इन अम्बिका का नाम `कौशिकी` पड़ा । पार्वती के शरीर से देवी कौशिकी के निकल जाने से उनका शरीर क्षीण हो गया व पार्वती कृष्ण वर्ण की हो गईं और वे `कालिका` नाम से विख्यात हुईं । अंजन के समान काली दैत्यों के लिए महाभयंकर तथा भक्तों के मनोरथ पूर्ण करने वाली होने के कारण `कालरात्रि` भी कही गईं । लेकिन कौशिकी अत्यंत मनोहर व लाावण्यमयी थीं । उन्होंने देवताओं को उनकी कार्य-सिद्धि का आश्वासन दिया तथा सिंह पर सवार हो कर शुम्भ के नगर में कालिका के साथ जा पहुंचीं, जहां एक उपवन में मधुर गीत का गायन करने लगीं । एक त्रिभुवन-सुंदरी के आगमन का समाचार पा कर कामातुर शुम्भ ने प्रणय-संदेश देवी के पास अपने दूत के हाथ भेजा । देवी ने प्रत्युत्तर में उसे ललकारा व कुछ घटनाओं के बाद भयंकर युद्ध होता रहा ।

शुम्भ काम से पीड़ित हो कर देवी को अपने अधीन करने हेतु अपने दानव-योद्धाओं को रणस्थल में भेज कर भयानक युद्ध रच रहा था । उसकी चतुरंगिणी सेना के साथ संग्राम करने हेतु देवी रणभूमि में चली, तब ब्रह्मा आदि देवताओं की विभिन्न शक्तियां भी चण्डिका के पास पहुँच गईं । शिवजी भी उन शक्तियों के साथ वहां संग्राम में भगवती चण्डिका के पास आये व देवी से बोले कि देवताओं की कार्यसिद्धि के लिए आप शुम्भ-निशुम्भ व अन्य सब दानवों का संहार कर दीजिए । तब मंद मंद मुस्कान के साथ शक्ति ने शिव से कहा कि आप कामरिपु हैं, और शुम्भ कामपीड़ित है, अतः हे कामशत्रु ! शुम्भ के पास आप मेरे दूत बन कर जाइए और शुम्भ-निशुंभ से मेरे यह शब्द कहिये कि वे सब स्वर्ग त्याग कर तत्काल पाताललोक चले जाएँ, जिससे इंद्र के साथ देवगण स्वर्ग में चले जाएँ व अपना यज्ञभाग पुनः पा सकें । अथवा युद्ध की इच्छा रखते हों तो यहाँ मरने के लिए आ जाएंं । देवी का यह सन्देश ले कर शिवजी दैत्यराज शुम्भ के पास गये । इस कारण देवी `शिवदूती` नाम से विख्यात हुईं ।

दुरित यानि अधम, दुरीह यानि दुष्ट इच्छा या वासना वाले ,दुराशय अर्थात् कुत्सित उदेश्य या प्रयोजन वाले, दुर्बुद्धि दानवदूतों का अंत करने वाली देवी, यह सम्बोधन देवी के लिए इसलिय प्रयुक्त (इस्तेमाल) किया गया, क्योंकि दैत्यराज शुम्भ ने देवी पर आसक्त हो कर अपना मन मैला कर लिया था तथा कुत्सित आशय (उद्देश्य) से अधम (नीच) और निर्लज्ज सन्देश माता के पासभेजा था । अपने दूतों के हाथ। जब देवी ने घोर गर्जना के साथ उनके दैत्यराज के लिए प्रत्युत्तर में उस स्थान को छोड़ कर जाने के लिए या फिर युद्ध करने के लिय कहा । तब वे दूत दुबारा देवी के पास बलप्रयोग अथवा युद्ध के लिए गए और देवी ने निर्ममतापूर्वक उनका अंत कर दिया । इसीलिए देवी को दानदूतों का अंत करने वाली कह कर पुकारा गया ।

अंत में पुकारा है, हे महिषासुर का घात करने वाली सुन्दर जटाधरी गिरिजा ! तुम्हारी जय हो, जय हो !

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