महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्

श्लोक ६

Shloka 6

अयि शरणागत वैरिवधूवर वीरवराभय दायकरे
त्रिभुवनमस्तक शूलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शूलकरे ।
दुमिदुमितामर दुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत तिग्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ

शरण में आई हुईं पतिपरायण शत्रुपत्नियों के योद्धा-पतियों को अभय प्रदान करने वाली, अपने त्रिशूल-विरोधी के मस्तक को, चाहे  वह त्रिभुवन का स्वामी ही क्यों न हो, अपने पावन त्रिशूल से अपने अधिकार में करने वाली (त्रि)शूलधारिणी,  दुमि-दुमि की ताल पर बजने वाली देवताओं की  दुन्दुभि का नाद से उत्सव जैसा बना हुआ वातावरण और भी भीषणता से शब्दायमान हो उठता है जिनसे, ऐसी हे प्रखर तेजस्विनी (तिग्मकरे) ! हे महिषासुर का घात करने वाली, हे सुन्दर जटाधरी गिरिनन्दिनि तुम्हारी जय हो, जय हो !

व्याख्या

`महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्` के छठे श्लोक में देवी के रणचंडी रूप के दर्शन होते हैं, जहाँ वे केवल कोपमयी नहीं, कृपामयी भी हैं । क्रोध से भरी हुई देवी को रण में शत्रुओं का विनाश करते हुए देख कर वैरियों की पतिव्रता पत्नियां भयभीत हो कर अपने सौभाग्य की रक्षा के लिए उनकी शरण में आती हैं, तब देवी उनके शूरवीर योद्धा स्वामियों को अभय प्रदान कर उन पर कृपा करती हैं । अभय देने से तात्पर्य है कि उन्हें मृत्यु-भय से मुक्त करती हैं, उनके प्राणों का हरण नहीं करतीं । इस प्रकार वे दयालु देवी शरणापन्न `वैरिवधूवर` (शत्रु-पत्नियों) के सुहाग की रक्षा करती हैं ।

aदेवी रण में कुपित हो कर घूमती हैं, बाणों की वर्षा करती हैं, खड्ग से दैत्यों का शिरोच्छेदन करती हैं तथा शत्रुदल में हाहाकार मच  जाता है । इस श्लोक में कवि कहता है कि उनके अमल अर्थात् पावन  त्रिशूल का जो कोई भी विरोधी होता है, चाहे वह ‘त्रिभुवनमस्तक’ अर्थात् तीनों लोकों का अधिपति  ही क्यों न हो, वे उसके मस्तक को अपने पावन त्रिशूल से अपने अधिकृत कर लेती हैं, उसे त्रिशूल से बींध देती हैं । उनके त्रिशूल का विरोधी होने से तात्पर्य है अधर्मी होना, अत्याचारी और परपीड़क होना । एतदर्थ देवी को ‘त्रिभुवनमस्तक शूलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शूलकरे’ कहा ।

आगे वर्णन है कि देवता दुन्दुभि (एक प्रकार का बडा ढोल) बजा कर तुमुल नाद कर रहे हैं । दुन्दुभि एक वैदिककालीन वाद्य है और तब इसका प्रयोग मंगलोत्सव व विजयोत्सव पर किया जाता था । यह एक रणवाद्य है और रण में दुन्दुभि का नाद जयघोष करने के लिये किया जाता है । देवों द्वारा उल्लास से नाद करना,  विजय की घोषणा कर मह: मनाने का सूचक है । मह: का अर्थ है उत्सव, जैसे कौमुदीमह:, वसन्तमह: अर्थात् कौमुदी-उत्सव, वसन्तोत्सव आदि । ‘मह:’ से ‘उत्सव’ शब्द जुड़ कर ‘महोत्सव’ शब्द बना है, जिससे हम सब भलीभाँति परिचित हैं । ‘दुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत’ कहना स्पष्ट करता है कि दुन्दुभिनाद करके अमर (देवगण) उत्सव मनाने की घोषणा कर रहे हैं और यह जय का उत्सव है। उत्सव मनाना यानि आजकल हम जिसे ‘सेलिब्रेट् करना’ कहते हैं , वही है । इधर रण में देवी उग्रता से शत्रुओं के शिरोच्छेद करने पर कटिबद्ध है । महिषासुर के साथ इस महासंग्राम में क्रुद्ध देवी का रूप, उनका शौर्य उनका आक्रमण, उनका गर्जन सभी कुछ चण्ड है । कराल काल के समान दैत्यों को कंपायमान करती देवी का प्रखर तेज दुस्सह है । यह उनका उग्रचण्डा रूप है । देव-दुन्दुभि का तुमुल नाद उनके प्रभूत पराक्रम से प्रबल हो कर सप्राण हो उठता है । वे तेजस्विनी देवी सुतप्त भी हैं और सुदीप्त भी, अर्थात् उनमें प्रचण्ड ताप भी है तथा स्नेह की सौम्य दीप्ति भी, वे जलाती भी हैं और जगमगाती भी हैं । क्यों न हो, उनका आविर्भाव देवताओं द्वारा प्रदान किये गये उनके अपने अपने सात्त्विक तेज़ के अंशों से हुआ है, उन्हीं के अभीष्ट कार्य सिद्ध करने के लिये । इस प्रकार तेजोपुंज देवी के उग्रचण्डा रूप की सक्रिय करालता देव-दुन्दुभिनाद निर्मित वातावरण को तिग्म करके, उत्तेजित करके और अधिक शब्दायमान कर देती हैं । तिग्म का अर्थ है, पैना, प्रचण्ड, प्रबल, प्रखर अति उष्ण, उत्तेजक आदि । देवी के भभकते क्रोध की भीम गर्जना से इस रणवाद्य की ध्वनि और अधिक भयंकरी हो उठती है तथा दिशाओं को थरथरा देने वाला नाद शत्रुओं  के मन में भय उत्पन्न कर देता है । इस प्रकार स्तुतिकार ने देवी को ‘तिग्मकरे’ अर्थात् तेजस्विनी कह कर उनके तेज की प्रखरता पर प्रकाश डाला है । वह कह उठता है कि देवताओं द्वारा मनाये जा रहे जयोल्लास से प्रतिध्वनित नाद को अपने विक्रम से और विकट बना कर रिपु को कम्पायमान करवा देने वाली हे तिग्मकरे !  हे महिषासुर का घात करने वाली, हे सुन्दर जटाधरी गिरिनन्दिनि तुम्हारी जय हो, जय हो !

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2 comments

  1. संदीप कुमार says:

    “दिङ्मकरे” के स्थान पर “तिग्मकरे” होना चाहिए। कृपया पुनः अवलोकन करें।

  2. संदीप कुमार says:

    कृपया “तिग्मकरे” का अर्थ का भी व्याख्या में उल्लेख करें।

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