महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्

श्लोक ७

Shloka 7

अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ

अपनी केवल हुंकार मात्र से धूम्रविलोचन (एक दैत्य का नाम) को आकारहीन करके सौ सौ धुंए के कणों में बदल कर रख देने वाली, युद्ध में रक्तबीज (एक दैत्य का नाम) और उसके रक्त की बूँद-बूँद से पैदा होते हुए और बीजों की बेल सदृश दिखने वाले अन्य अनेक रक्तबीजों का संहार करने वाली, शुम्भ-निशुम्भ दैत्यों की शुभ आहुति देकर महाहवन करते हुए भूत-पिशाच आदि को तृप्त करने वाली देवी, हे महिषासुर का घात करने वाली, हे सुन्दर जटाधरी गिरिजा, तुम्हारी जय हो, जय हो !

व्याख्या

q-durga`महिाषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्` के सातवें श्लोक में शुम्भ-निशुम्भ नामक दो उत्पीड़क असुर भाइयों व उनके योद्धाओं के साथ देवी के युद्ध का उल्लेख है । जगत में दैत्यों के दुराचार और उत्पीड़न के अधिक बढ़ जाने पर महाशक्ति का आविर्भाव होता है । सृष्टि के आरम्भ में मधु-कैटभ और फिर आगे चल कर महिषासुर का घात करने वाली महाशक्ति एक बार फिर मद में चूर शुम्भ-निशुम्भ नामक दानव-भाइयों के शत्रु के रूप में प्रबल हुई । असुरराज शुम्भ के अत्याचारों और त्रास को समाप्त करने के हेतु देवी का पुनः आविर्भाव हुआ । वरदान-प्राप्ति के बाद अतीव बलशाली बने इन दोनों भाइयों ने देवताओं को हरा कर स्वर्ग से उन्हें भगा दिया तो देवगण देवी की शरण में गए । तब उनकी रक्षा के लिए पार्वती के देहकोष से अम्बिका उत्पन्न हुईं, देहकोष से उत्पन्न होने के कारण वे `कौशिकी` नाम से प्रसिद्ध हुईं । अम्बिका का रूपत्रिभुवन को मोहने वाला था । वे देवताओं की रक्षा के लिए युद्ध में अग्रसर हुईं । उनके त्रिभुवन-सुन्दर रूप का वर्णन सुन कर असुरराज शुम्भ ने पहले अपने दूत के हाथों अपना प्रणय-सन्देश भेजा, किन्तु देवी ने प्रत्युत्तर में युद्ध करने के लिए कहा तो उसने क्रुद्ध हो कर अपने बलशाली सेनापति धूम्रलोचन को ससैन्य देवी से युद्ध करने के लिए भेजा । प्रस्तुत श्लोक की पहली पंक्ति में इसी धूम्रलोचन के देवी द्वारा मार दिए जाने की बात वर्णित की गई है । वह जब अपने दल-बल के साथ देवी के सम्मुख गया तब देवी की बात सुनकर क्रोध से भर उठा एवं उन्हें मारने दौड़ा, तब देवी ने हुंकार भरी और वह वहीँ उनकी हुंकार मात्र से ही भस्म हो गया । `मार्कण्डेय पुराण` में लिखा है, `हुंकारेणैवतंभस्मचकारामविकांमतः` अर्थात् हुंकार भर से ही देवी ने उसे भस्म कर दिया । यहाँ कवि इस बात का उल्लेख करते हुए कहता है कि निज हुंकृति यानि हुंकार से देवी ने धूम्रलोचन को धुंए के सौ सौ कणों में ढेर कर के रख दिया, वह आकारहीन हो गया, अर्थात् भस्मीभूत कर दिया गया (उसकी कोई आकृति न रही) । उसकी असुर सेना भी मारी गई ।

तदुपरांत चंड-मुंड नामक महा असुर भेजे गए व वे भी मारे गए तब रक्तबीज नामक बलशाली योद्धा को देवी के साथ युद्ध काने के लिए असुरराज शुम्भ ने भेजा । रक्तबीज को यह वरदान प्राप्त था कि उसके रक्त की जितनी बूँदें पृथ्वी पर गिरेंगीं, उतने असुर उनमें से और उत्पन्न हो जायेंगे । इसलिए, कवि के अनुसार युद्धभूमि में वह असुर शोणित अर्थात् रक्त के बूँद रुपी बीजों से बीजों की एक बेल-सी उत्पन्न कर देता था, जिसे यहाँ `बीजलता` कहा गया है । शोणितबीज अर्थात् रक्तबीज का नाश असम्भव प्रतीत होने पर देवी अम्बिका ने काली से कहा कि ` हे चामुण्डे ! मेरे शस्त्र के आघात के द्वारा रक्तबीज के शरीर से निकले रक्त को जल्दी-जल्दी तुम पीटी जाओ, जिससे एक बूँद भी रक्त भूमि पर गिरने न पाये ।` इस प्रकार वे काली उसके शरीर से निकलते हुए रक्त को भूमि पर गिरने से पहले ही पी जाती । फलस्वरूप कृत्रिम असुर और अधिक उत्पन्न न हुए और अंत में वास्तविक असुर रक्तबीज ही शेष रहा तथा उसका वध देवी अम्बिका ने कर दिया, बिना उसके रक्त की एक भी बूँद को भूमि पर गिराये। अतः स्तुतिकार देवी को `समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते` कह कर सम्बोधित करता है कि अपने समुद्भव से रक्तबीज के शोणित बूंदों की बीज-बेल को समर-भूमि में शोषण करने वाली हे देवी ! फिर आगे शुम्भ-निशुम्भ का वे वध करती हैं, जिसे कवि कहता है कि (उनके वध से सबका शुभ होने के कारण) इस शुभ वध की आहुति महायज्ञ में देवी ने दी तथा भूत-पिशाचों को तृप्त किया । आशय यह कि उनके वध की शुभ (सर्वहितकारी) महाहवि देवी ने दी व उन अधम पापियों की हवि से भूत-पिशाच आदि, जो शिव-पार्वती के गण हैं, वे तृप्त अर्थात तुष्ट हुए । अतः देवी को `तर्पितभूत पिशाचरते` कह कर पुकारते हुए स्तुतिकार कहता है कि हे महिषासुर का घात करने वाली सुन्दर जटाधरी गिरिजा ! तुम्हारी जय हो, जय हो !

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