महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्

श्लोक १०

Shloka 10

जय जय जाप्यजये जयशब्दपरस्तुतितत्परविश्वनुते
झणझणझिंझिमझिंकृतनूपुरशिंजितमोहितभूतपते ।
नटितनटार्धनटीनटनायकनाटननाटितनाट्यरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ

हे जये ! आप जपनीय हो, आपकी जय हो, जय हो ! जयकार करने में लीन व स्तुति करने में तत्पर विश्व द्वारा वन्दिता, झन-झन झनकते नूपुरों की ध्वनि से (रुनझुन से) भूतनाथ (महेश्वर) को मुग्ध कर देने वाली (हे देवी), और नट व नटियों के प्रमुख नायक नटेश्वर (शिव) के नृत्य से सुशोभित नाट्य देखने में तन्मय (हे देवी),  हे महिषासुर का घात करने वाली देवी, हे सुन्दर जटाधरी गिरिजा, तुम्हारी जय हो, जय हो !

व्याख्या

`महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्` के दसवें श्लोक में कवि ने स्तुति करते हुए देवी के जया एवं अर्धनटेश्वरी रूप का गान किया है । देवी अपने भक्तों एवं आश्रितों की रक्षा के लिए दैत्यों से घोर युद्ध करके उन्हें विनष्ट करती हैं । देवताओं की आर्त पुकार सुनकर, उनकी प्रार्थना से करुणा-विगलित देवी के आविर्भूत होने पर सभी देवता उनका स्तवन करते हैं और उनकी जय पुकारते हैं । युद्ध के उपरांत आसुरी शक्तियों पर देवी की विजय से चारों दिशाओं में पुनः उनका जय जयकार गूँज उठता है । देवी जया हैं, जयिनी, जयशीला हैं ।स्तुतिकार कहते हैं कि हे जये ! आप जय जय की जयध्वनि से जप्य हैं । जप से जप्य शब्द बना है । मंद मंद स्वर में किसी मन्त्र या प्रार्थना को गुनगुनाना जप है और जो जप किये जाने के योग्य नाम या प्रार्थना है, वह ‘जप्य’ कहलाती है । कवि माँ को पुकारते हुए गायन करता है जय जय जाप्यजये अर्थात् जय जय की जयध्वनि से जप्य हे जये ! संबोधन करने से ‘जया’ का रूप ‘जये’ हो गया, जैसे माता का माते तथा सीता का सीते हो जाता है । वह आगे कहता है जयशब्दपरस्तुतितत्परविश्वनुते अर्थात् जय जयकार करने में तत्पर व स्तुतिपरायण विश्व द्वारा वन्दित-पूजित हैं जो, ऐसी हे देवी । वे सब से, जो तत्पर हैं, लीन हैं परम तत्व की प्रार्थना में, माता उनके द्वारा नमस्कृत हैं । कवि के कथन का आशय यह है कि जिन्हें अपना परम कल्याण अभीष्ट है, वे सब माँ की वन्दना करते हैं, उनके पावन चरणों में नमन निवेदित करते हैं । पूरी पहली पंक्ति का अर्थ है कि हे जपे जाने के योग्य हे जया, हे विश्ववन्द्या और प्रार्थना-परायण विश्व द्वारा नमस्कृत हे देवी !

आगे दूसरी पंक्ति में देवी को पुकारते हुए कवि कहता है कि हे अपने नूपुरों की झन झन झंकार से भगवान भूतनाथ को मुग्ध करने वाली देवी ! भगवान भूतभावन उनके नूपुरों की झनकार से शिंजितमोहित हैं अर्थात् देवी की पायल की झंकार पर अनुरक्त हैं, मनोमुग्ध हैं । इस तरह ‘अपने नूपुरों की झंकार में भगवान भूतनाथ को अनुरक्त करने वाली, आह्लाद से उन्हें आप्लावित करने वाली हे देवी’ यह संबोधन किया है ।

तीसरी पंक्ति में कवि ने व्यक्त किया है कि शिवा और शिव अविभाज्य हैं, उनमें परम ऐक्य है । एक ही तत्व के वे दो रूप हैं, जो एक दूसरे के पूरक हैं । देवी नर्तन करती हैं तब उनके झन झन बजते हुए नूपुरों की झंकार पर, उनके पायलों की रुनझुन पर भगवान शिव रीझते हैं ।भगवती शिवा की प्रसन्नता शिव को प्रमुदित करती है । देवी स्वयं भगवान शिव के नटराज स्वरूप का नटार्ध रूप हैं । सस्वर (गानसहित) अभिनीत किये जाने वाले नृत्य-नाट्य में नट-नटी में प्रमुख व उनके नायक अर्धनारीश्वर भगवान शिव नृत्यरत   हैं । और शिव के नृत्य से सुशोभित नाट्य देखने में देवी सानन्द तन्मय हो उठी हैं, अत: उन्हें नाट्यरते कह कर पुकारा ।

इस प्रकार कवि स्तुति करता हुआ देवी के प्रति निवेदन करता है कि स्तवन-समुत्सुक समस्त संसार के द्वारा वन्दित एवं जय घोष से निनादित, पूजित, हे शिवमोहिनी, हे अर्धनारीश्वर शिव नर्त्तन-युक्त नाट्याभिनय में तल्लीन हे देवी, तुम्हारी जय हो । हे महिषासुर का घात करने वाली देवी, हे सुन्दर जटाधरी गिरिजा, तुम्हारी जय हो, जय हो !

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