महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्

श्लोक ११

Shloka 11

अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ

सुन्दर मनोहर कांतिमय रूप के साथ साथ सुन्दर मन से संयुत और रात्रि के आश्रय अर्थात् चन्द्रमा जैसी उज्जवल मुख-मंडल की आभा से युक्त हे देवी, काले,मतवाले भंवरों के सदृश, अपितु उनसे भी अधिक गहरे काले और मतवाले-मनोरम तथा चंचल नेत्रों वाली , हे महिषासुर का घात करने वाली देवी, हे सुन्दर जटाधरी गिरिजा, तुम्हारी जय हो, जय हो !

व्याख्या

durga`महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्` के ग्यारहवें श्लोक में कवि देवी के आंतरिक और बाह्य सौंदर्य का गुणगान करता है । देवी की देह रमणीक कांति से देदीप्यमान हैं । दैत्यों का अंत करने वाली देवी को त्रिदेवों का महातेज व अन्य देवताओं का तेज भी प्राप्त हुआ था । इन सभी के सम्मिलित तेज से देवी का प्रादुर्भाव हुआ था । उनकी रूप-कांति मनोहर है । अतः उन्हें `मनोहरकान्तियुते` कहा है । देवी फूल-सी मनोहर और फूल-सी कोमलांगी भी हैं । इतना ही नहीं, उनका मन भी फूल-सा सुन्दर और सुकोमल है । `सुमन` शब्द का अर्थ है फूल, और इस शब्द की प्रत्येक आवृत्ति प्रस्तुत श्लोक में फूल की एक नई तथा भिन्न विशेषता को बताती है । फूल में जैसे सुगंध और पराग होता है, वैसे ही देवी में अनुपम आकर्षण एवं लावण्य है । कोमलांगी होने पर भी उनका युद्ध-कौशल प्रचण्ड है । अपने भक्तों पर आने वाली विपदा को वे विनष्ट कर देती हैं । उनका मन इतना सुकुमार है कि शरण में आने वाली वैरी-वधुओं को भी वे उनका अभीष्ट प्रदान करती हैं तथा उनके योद्धा-पतियों को अभयदान दे कर उनका संहार वे नहीं करतीं । करुणावरुणालया देवी की शरणापन्न हो कर शत्रु-पत्नियां भी सौभाग्यवती रहती हैं । `सुमन` अर्थात् सुन्दर मन से संयुत`देवी सुरों पर वरदानों की वर्षा करती हैं व उन्हें आश्वासन देती हैं कि जब भी वे आर्त्त हो कर सहायतार्थ देवी को पुकारेंगे, तो वे अवश्य उनकी रक्षा करेंगीं । इस प्रकार देवी को `अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते` पुकारना सर्वथा समीचीन है ।

आगे कवि देवी के चंद्रोज्जवल मुख-मंडल की आभा के विषय में कहता है कि रात्रि उनकी आभा से `श्रितरजनी` हो गई है, अर्थात् आच्छादित है जो रजनी, वह श्रितरजनी है । रजनी यानि रात्रि,परिव्याप्त है उनके मुख-मंडल के `कर` अर्थात् किरण से । `वक्त्र` का अर्थ है, मुख और `वृत्त` है मंडल । `करवक्त्रवृता` का अर्थ हुआ मुख-मंडल की किरण या मुख-मंडल का प्रकाश । `रजनी` शब्द की चार बार आवृत्ति हुई है, अतः उतनी ही विशेषताएं लेनी होंगीं । रात्रि में शांति एवं निस्तब्धता होती है, रात्रि तारों की झिलमिल ज्योति से दीप्त होती है, रात्रि का एक अपना अद्भुत और रहस्य्मय सौंदर्य होता है तथा रात्रि सभी जीवों का श्रम दूर कर के उन्हें विश्रांति प्रदान करती है । देवी की दीप्ति से न केवल रात आच्छादित है, अपितु देवी के दिव्य सौंदर्य में भी रजनी के गुण समाहित हैं । देवी को इस स्तोत्र में `हासरते` कहा गया है । वे दैत्यों के अपूर्व बल से अप्रभावित है, अतः मंद मुस्कान उनके आनन (मुख) की शोभा बढाती है, वे निःशंक हैं, रात ही की भांति शांत एवं रहस्य्मयी हैं । तारकद्युति की भांति उनके दिव्य आभूषण उनकी देह पर झिलमिला रहे हैं, जिनसे देवी का स्वरूप और भी देदीप्यमान हो उठा है । रण में रक्षा के हेतु अग्रसर हुई देवी के कारण देवता अपना श्रम व भय भूल कर, आश्वस्त हो कर विश्रांति पा रहे हैं । अतः देवी को `श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते` कह कर पुकारा है ।

अगली पंक्ति देवी के नेत्र-सौंदर्य को रेखांकित करती है । उनके नेत्रों में कवि को काले, मतवाले और चंचल भ्रमरों की मनोरम्यता दिखाई देती है । भ्रमर की ही भांति देवी के नयन काले हैं, भ्रमर पर जैसे पुष्प के पराग या मधु का उन्माद छाया होता है, उसी प्रकार देवी की आंखें युद्ध के उन्माद से मतवाली हो रही हैं । भ्रमर जैसे फूल-फूल पर मंडराता है, उनके मकरंद का पान करने के लिए, वैसे ही देवी एक-एक दैत्य को मार कर उनके रक्त की प्यासी हो रही हैं । उनके रक्त-पान का मद भ्रमर के रस-पान के मद को बहुत पीछे छोड़ देता है, अतएव वे `भ्रमराधिपति` हैं और `भ्रमराधिपते` कह कर युद्धोन्मत देवी को सम्बोधित करते हुए कहा है कि हे महिषासुर का घात करने वाली, सुन्दर जटाधरी, हे गिरिजा , तुम्हारी जय हो, जय हो !

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