कालिय-दमन

कालिय-दमन कविता के भाव स्वतःस्फूर्त्त होने पर भी कथाप्रवाह की सततता व सरसता के हेतु किये गए शब्द-चयन के लिए मैं भक्त एवं विद्वान लेखक श्री सुदर्शनसिंह `चक्र` की चिर ऋणी रहूंगी, जिनकी पुस्तक नंदनन्दन मेरे लिए प्रेरणा का अजस्र स्रोत रही है, जिससे न केवल कथा के प्रसंग एवं मेरे भाव ही, अपितु मेरा शब्द-प्रयोग भी प्रभावित है ।

ग्वालबालों ने अपने-अपने छींके
लटकाए कदम्ब तरु पर पास ही के
महाकदम्ब की छाँव थी सुखकर
बैठ गए गौ-वृषभ सब सिमटकर
श्रीदामा लाये थे रत्न-जटित गेंद लाल
कुछ काल खेले कान्हा संग ग्वालबाल
धरा पर ख़ुशी के मारे न पड़ते पाँव थे
बारी बारी सब दे रहे अपना दांव थे
अपनी आई बारी तो वे बिगड़ गए
दांव न अपना देने पर वे अड़ गए

बिगाड़ा सब खेल, श्रीदामा तुनका
“समझता है अपने को बड़े कुल का
खेल में छोटा कौन, है कौन बड़ा ?
जानबूझ कर बढा रहा है झगड़ा”
फुलाये मुंह श्याम चढ़ गए कदम्ब की ड़ाल
“कैसे न दोगे दांव ?” सखा के नेत्र हुए लाल
तब तिलमिलाते सखा को अंगूठा दिखाया
वहीँ से बैठे बैठे सखा को चिढाया
चुप होने वाले थे श्रीदामा कब ?
कान्हा ने अपना दाँव चलाया तब

गेंद का तो केवल बहाना था
यमुना को प्रदूषण से बचाना था
काली हृद यमुना के भीतर
सपरिवार रहता था विषधर
कमर से अपना पटुका कसे
कूदे कृष्ण जमुना में झट से
पहुंचे काली हृद के अन्दर
लहरों ने देखा दृश्य अति सुन्दर
सीधे पहुंचे कमलनयन
जहाँ कालिय करे शयन

नाग-पत्नियां विस्फारित नयन से
देख अनुरक्त हुईं सब मन से
मोहन से बोलीं मनुहार करतीं
फुफकार नहीं, पुचकार करतीं
” रे बालक ! तूं आया कहाँ से ?
पाश में कहीं न तुझको फांसे
इससे पहले क़ि स्वामी जागें
हम तेरे सुकुमार पग लागें
तूं शीघ्र हो चल भाग खड़ा
हो न जाये कहीं अनर्थ बड़ा

श्याम कहाँ थे मानने वाले
सर्प की पूंछ पर पैर दे डाले
यमुना जल को शुद्ध करना था
प्रदूषण से उसे मुक्त करना था
हुआ आक्रांत महासर्प चीत्कार उठा
शतैक्शीर्ष हो क्रोधाविष्ट फूत्कार उठा
फण निज एक सौ एक उठा कर
श्याम के मर्म में दंश लगा कर
उन्हें किया कुपित हो कुंडलबध्ध
पर श्याम भी तो थे पूरे सन्नद्ध

निज देह को कृष्ण ने स्थूल किया
त्रस्त हो दूर कालिय कूद लिया
प्रत्याक्रमण उसे असाध्य हुआ
अपनी रक्षा को वह बाध्य हुआ
लहरें उठीं उत्ताल यों जमना जल में
हुआ जैसे सागर-मंथन हृद-तल में
जिसे शतैक फणों पर गर्व बड़ा था
भयभीत वही सम्मुख खर्व खड़ा था
झुका कर दुष्ट का विषैला माथा
कृष्ण ने कालिय नाग को नाथा

कालिय के शोणित की फूटीं
फुहारें शत-शत फटते फणों से
पद पखारे कान्हा के, मस्तक-
मणियों ने निज ज्योतिर्कणों से
नागिनों ने सत्वर नमन किया
मिलकर उनका स्तवन किया
कालिंदी छोड़ कर जाने का
आदेश कृष्ण ने तुरंत दिया
शीश पर उसके चरण-चिह्न अपने
अंकित कर कृतार्थ किया कृष्ण ने

तिरते आये तब सतह के ऊपर
सस्मित खड़े हुए सर्प-मस्तक पर
ता थेई ता थेई तो कभी द्राम् द्राम्
मस्तक पर नर्तन किया अविराम
ब्रज के कान्हा नवनीत-चुरैया
बने अब कालिय-नाग-नथैया
पा कर कृष्ण-करुणालय-दया
सकुटुम्ब कालिय ह्रद छोड़ गया
समुल्लसित हुई समस्त सृष्टि
सुरों ने गगन से की पुष्प-वृष्टि ।







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