शिवसंकल्पसूक्त

श्लोक २

Shloka 2 Analysis

येन कर्मण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः ।
यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।।

अन्वय

येन अपसः मनीषिणः यज्ञे धीराः विदथेषु कर्माणि कृण्वन्ति यत् अपूर्वं प्रजानां अंतः यक्षं तत् मे मनः शिवसंकल्पं अस्तु ।

सरल भावार्थ

जिस मन से कर्मनिष्ठ एवं स्थिरमना प्रज्ञावान जन यज्ञ आदि कर्म और गंभीर व साहसी लोग विज्ञान आदि से संबद्ध कर्म सम्पादित करते हैं, जो अपूर्व है व सब के अंतःकरण में मिश्रित है अर्थात् मिला हुआ है, विद्यमान है, ऐसा हमारा मन शुभ-कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो !

व्याख्या

शिवसंकल्पसूक्त के दूसरे मन्त्र में ऋषिगण सबसे पहले यह बात कहते हैं कि मन से ही यज्ञ आदि कर्मों का सम्पादन होता है । शुद्ध मन ही यज्ञ आदि सत्कार्यों का करने वाला है । यही कारण है कि वैदिक ऋषि ईश्वर का आवाह्न करके उन्हें अपने ह्रदय में प्रविष्ट होने की प्रार्थना करते हैं, जिससे उन्हें दिव्य ऊर्जा प्राप्त हो और वे निष्पाप, निष्कलुष रहें । तैत्तिरीयोपनिषद् के दशम अनुवाक् में कहा गया है कि त्रिशंकु नामक ऋषि ने परमात्मा को प्राप्त होकर अपना अनुभव व्यक्त किया था । त्रिशंकु के वचनानुसार अपने अंतःकरण में परमात्मा की भावना करना भी उसकी प्राप्ति का साधन है । दसवें अनुवाक् में यही बात बताई गई है ।

अहं वृक्षस्य रेरिवा । कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव । उर्ध्वपवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि । द्रविणं सवर्चसम् । सुमेधा अमृतोक्षितः। इति त्रिशङ्कोर्वेदनुवचनम् ।

319600_445532862161827_1572123368_nइसका भावार्थ यह है कि मैं ही प्रवाहरूप से अनादिकाल से चलते हुए इस जन्म-मृत्यु रूप संसारवृक्ष का उच्छेद करने वाला हूँ । यह मेरा अंतिम जन्म है और इसके बाद मेरा पुनः जन्म नहीं होने वाला है । मेरी कीर्ति पर्वत-शिखर की भांति उन्नत और विशाल है । अन्नोत्पादक शक्ति से युक्त सूर्य में जैसे उत्तम अमृत का निवास है, उसी प्रकार मैं भी रोग-दोष आदि से पूर्णतया मुक्त हूं, अमृत-स्वरूप हूँ । मैं सुप्रकाशित धन का भंडार हूँ, परमानंद रूप अमृत में निमग्न एवं श्रेष्ठ धारणा युक्त बुद्धि से सम्पन्न हूं । इस प्रकार त्रिशंकु मुनि के यह वचन हैं । तात्पर्य यह कि मनुष्य के संकल्प में यह अपूर्व और अद्भुत शक्ति है कि वह जिस प्रकार की भावना करता है, वैसा ही बन जाता है ।

तैत्तिरीयोपनिषद् के चतुर्थ अनुवाक् में उन मन्त्रों का वर्णन किया गया है, जिनमें कहा गया है कि किस प्रकार अपने मन को अधिकाधिक शुद्ध बनाने के लिए आचार्य को हवन करना चाहिए । एक छोटा-सा उदाहरण प्रस्तुत है ।

स मा भग प्रविश स्वाहा । तस्मिन् सहस्रशाखे निभगाहं त्वयि मृजे स्वाहा ।

अर्थात् इस उद्देश्य से मंत्रोच्चारण कर के स्वाहा शब्द के साथ अग्नि में आहुति डालनी चाहिए कि हे भगवन् ! आपके उस दिव्य रूप में मैं प्रविष्ट हो जाऊं। इसके बाद मंत्रोच्चार कर के स्वाहा शब्द के साथ अग्नि में अगली आहुति डालनी चाहिए इस उद्देश्य के साथ कि आप का दिव्य स्वरूप मुझ में प्रविष्ट हो जाये, मेरे मन में आ जाये। हजार शाखाओं वाले आपके दिव्य रूप में ध्यान-मग्न हो कर मैं स्वयं को परिशुद्ध बना लूं । इस अनुवाक् के अनुसार आचार्य को अपना मन अधिक से अधिक शुद्ध बनाने के हेतु इस प्रकार अग्नि में आहुतियां देते हुए स्वाहा शब्द के उच्चारण के साथ याग-कर्म करना चाहिए । वस्तुतः धीर-गंभीर प्रतिभाशाली लोग विज्ञान आदि के कर्म, नवीन खोजें आदि स्वस्थ और सधे हुए मन से करते हैं । वैदिक विज्ञान एवं वैदिक गणित का ज्ञान आज के युग में भी प्रासंगिक है तथा प्रत्येक युग की चुनौती व कसौटी पर खरा उतरा है । हमारे तत्कालीन ऋषि-मुनियों की खोजों को ही आज नए नाम दे कर, अपने आविष्कार बता कर पुनः संसार के सामने लाया जा रहा है । वे खोजें चाहे चिकित्सा के क्षेत्र की हों या मनोविज्ञान के क्षेत्र की, यान बनाने की कला हो या वास्तु-कला हो, साहित्य, कला, दर्शन, ज्योतिष, गणित आदि सभी क्षेत्रों को हमारे मनीषियों ने समृद्ध किया है । इस मन्त्र के अनुसार ज्ञान-विज्ञानं के ऐसे सभी कर्मों के पीछे मन की दृढ संकल्प-शक्ति वर्तमान होती है, तब ही यह सब संभव होता है ।

शिवसंकल्पसूक्त के दूसरे सूक्त में कहा है कि मन सब के शरीर में विद्यमान है । पातंजलि योगसूत्र के अनुसार सभी को भौतिक अस्तित्व के रूप में शरीर तथा मानसिक अस्तित्व के रूप में मन मिला हुआ है । मन शरीर से सूक्ष्म है । कठोपनिषद् के अनुसार मन इन्द्रियों से परे है, उनसे उत्कृष्ट है:

इन्द्रियेभ्यः परं मनः ।

इस मन्त्र में यह बात कही गई है कि सभी श्रेष्ठ कर्मों को इसी मन की स्वस्थ व शुद्ध अवस्था में किया जा सकता है । यही मन गृहस्थ को कर्मठ बनाता है एवं उसे नीति से जीविकोपार्जन की बुद्धि देता है । सन्यासी को भी यही मन विषयों से विमुख रखता है, जिससे वह सद्चिन्तन में रत रहे, विकारों की उत्पत्ति एवं उपद्रव से वह बचा रहे । तब ही सन्यासी तपस्या, संध्या, पूजा आदि सत्कर्मों का करने वाला बन सकता है । यजुर्वेद में मन के नियंत्रक देवता को `मनस्पत` कहा गया है । मन की शुद्ध व शांत स्थिति ही स्वस्थ चिंतन एवं नवोन्मेष के हेतु नवीन क्षितिजों का उद्घाटन करती है । समस्त समाज के लिए सबसे पहले मन का निर्विकार होना आवश्यक है । अतः ऋषि परमात्मा से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हमारा मन शुभ-कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो !

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