शिवमहिम्नःस्तोत्रम्

श्लोक १०

Shloka 10 Analysis

तवैश्वर्यं यत्नाद्युपरि विरंचिर्हरिरध:
परिच्छेत्तुं यातावनलमनलस्कन्धवपुष: ।
ततो भक्तिश्रद्धाभरगुरुगॄणद्भ्यां गिरीश यत्
स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति ।। १०।।

तवैश्वर्यं यत्नाद्युपरि विरंचिर्हरिरध:
तवैश्वर्यं = तव + ऐश्वर्यम्
तव = आपका
ऐश्वर्यम् = भगवत्ता , तेजोमूर्ति, विभूति
यत्नाद्युपरि = यत्नाद् + उपरि
यत्नाद् = प्रयत्नपूर्वक
उपरि = ऊपर की ओर, ऊपर की दिशा में
विरंचिर्हरिरध: = विरंचि: + हरि: + अध:
विरंचि: = ब्रह्मा
हरि: = विष्णु
अध: = नीचे
परिच्छेत्तुं यातावनलमनलस्कन्धवपुष:
परिच्छेत्तुं = पार पाने के लिये
यातावनलमनलस्कन्धवपुष: = यातौ + अनलम् + अनलस्कन्धवपुष:
यातौ = दोनों गये
अनलम् = अक्षम रहे (अन् + अलम् = अन् = नहीं, अलम् = सक्षम)
अनलस्कन्धवपुष: = अग्निस्तम्भ जैसे ज्योतिपुंजमय देहधारी
ततो भक्तिश्रद्धाभरगुरुगॄणद्भ्यां गिरीश यत्
ततो = तत्पश्चात्
भक्तिश्रद्धाभरगुरुगॠणद्भ्यां = भक्ति + श्रद्धा + भर + गुरु + गॄणद् +भ्याम्
भक्ति = आराधना
श्रद्धा = आस्था
भर = अतिरेक, आधिक्य (अधिकता)
गुरु = प्रशस्त, आकार में विस्तृत
गॄणद् = स्तुति करते हुए
गॄणद् + भ्याम् = स्तुति करते हुए दोनों
गिरीश = हे गिरिपति, हे कैलाशपति
यत् = जो, जिस ( तेजोलिंग ) को
स्वयं तस्थे ताभ्याम् तव किमनुवृत्तिर्न फलति
स्वयम् = ख़ुद ही
तस्थे = स्थिर हो गये
तव = आपका
किमनुवृत्तिर्न = किम् + अनुवृत्ति: + न
किम् = क्या
अनुवृत्ति: = (शरणागत होकर) अनुसरण करना
= नहीं
फलति = फलता है

अन्वय

गिरीश ! अनलस्कन्धवपुष: तव यद् ऐश्वर्यम् परिच्छेत्तुम् विरंचि: उपरि हरि: अध: यत्नाद् यातौ अनलम् तत्: भक्तिश्रद्धाभरगुरुगॄणाद्भ्याम् ताभ्याम् स्वयं तस्थे । तव अनुवृत्ति: किम् न फलति ?

भावार्थ

हे कैलाशपति ! अग्निस्तम्भ के समान आपके जिस भव्य तेजोमय लिंग (प्रकाशपुंज सा देदीप्यमान लिंग ) को देखकर उसके अर्थात् आपकी भगवत्ता ( परमैश्वर्य ) के ओर-छोर का सन्धान पाने के लिये (स्तब्ध) ब्रह्मा (अधिकाधक ) ऊपर व विष्णु ( निम्नातिनिम्न ) नीचे की दिशा में प्रयत्नपूर्वक गये, ( तब भी ) उसकी ( आपके ऐश्वर्य की ) थाह पाने में अक्षम रहे । तब श्रद्धा और भक्ति के अतिरेक से भरे हुए, आपकी प्रशस्त स्तुति करने वाले उन दोनों के सम्मुख आप स्वयं आकर स्थिर हो गये (प्रकट हो गये)। ( शरणागत होकर ) आपके अनुसरण करने का क्या फल नहीं मिलता ? अर्थात् अवश्यमेव मिलता है ।

व्याख्या

शिवमहिम्न:स्तोत्रम् के दसवें श्लोक में स्तुतिगायक गन्धर्वराज परात्पर भगवान शिव के शरणापन्न जनों की सौभाग्यातिशयता को रेखांकित करते हुए बताते हैं कि शिव-शरणागति प्राप्त करने वालों के सभी अभीष्ट सिद्ध होते हैं । शिवकृपा जीव को शोधित करती है ।

स्तुतिकार ब्रह्माजी एवं विष्णुजी के मध्य हुए एक बार के संघर्ष की वार्ता वर्णित करते हुए शिव-शरणागति की अनिर्वचनीय महिमा का गान करते हैं । इससे सम्बद्ध उपाख्यान शिवसबंधी पुराणों में प्राप्त होता है । कथा है कि एक बार जब प्रलय उपस्थित हुआ तब ब्रह्माजी साम्य अवस्था को प्राप्त थे तथा नारायण ( हरि ) प्रलयार्णव में शयन कर रहे थे । दोनों देव परमेश्वर सदाशिव की माया से मोहित थे । नारायण को देख कर रजोगुण के उद्रेक से ब्रह्माजी ने उन्हें उठा कर प्रश्न किया कि तुम कौन हो ? सतोगुणयुक्त विष्णुजी ने मधुर हास के साथ उन्हें “वत्स” कह कर संबोधित करते हुए उनसे बात करने का उपक्रम किया । इस पर माया से मोहभाव को प्रााप्त हुुए ब्रह्माजी हरी से बोले कि मुझ अजन्मा, विश्वात्मा , विधाता को तुम “वत्स” कह कर क्यों सम्बोधित कर रहे हो, जैसे गुरु शिष्य को करता है ? तुम मोहयुक्त होकर मुझ पितामह से इस प्रकार क्यों बोल रहे हो ? नारायण मुस्कुराते हुए मधुर वाणी में ब्रह्माजी से कहा कि तुमने मुझ शाश्वत परमेश्वर के अंग से ही अवतार ग्रहण किया है तथा विश्व की उत्पत्ति के कारणस्वरूप मुझ ऐश्वर्यसंपन्न, अच्युत की माया को ही अब भूल रहे हो । यह सब मेरी माया द्वारा ही तो रचा गया है । हे चारमुख वाले ब्रह्मन् ! सृष्टि का कर्त्ता, पालक, संहारक व देवताओं का स्वामी मैं ही हूं । मैं ही परम तत्व, परम ज्योति, परम समर्थ परमात्मा हूं । आप ब्रह्मा सहित अनेक ब्रह्माण्ड मेरी माया के प्रभाव से ही विरचित हैं । यह सब कह- सुन कर मायावशात्शत्रुता-भाव को प्राप्त उन दोनों में परस्पर विवाद बढ़ता गया व रजोगुण की वृद्धि से प्रलय-सागर में वे भीषण संग्राम करने लगे । उसी समय एक महान् दीप्तिमान, अग्निस्तम्भ के समान तेजोराशिमय लिंग दोनों के समक्ष प्रकट हुआ । यह सन्दर्भ है इस दसवें श्लोक का ।

प्रस्तुत श्लोक में स्तुतिकार पुष्पदंत अब इसके आगे तेजोलिंग के प्रकट होने पर देवद्वय ( दो देव ) किस स्थिति को प्राप्त हुए व क्या घटित हुआ, इस बात को आलोकित करते हैं । अग्निस्तम्भ के समान अर्थात् आग के खम्भे के समान या दूसरे शब्दों में सहस्रों अग्निज्वालाओं से व्याप्त उस तेजोमय लिंग को देखकर वे दोनों स्तब्ध रह गए । शिव-विषयक पुराणों में प्राप्त कथानुसार वह लिंग सैकड़ों कालाग्नि के सदृश, क्षय तथा वृद्धि से रहित एवं आदि-मध्य-अंत से हीन था, जिसे देख कर विस्मय-विमुग्ध दोनों अवाक् रह गए और अपना संघर्ष छोड़ कर विष्णुजी ब्रह्माजी से कहने लगे कि हमें अग्निस्फूर्त्त इस लिंग का पता लगाना चाहिए । एतदर्थ मैं इस अनुपम अग्निस्तम्भ के नीचे जाता हूं एवं आप इसके ऊपर जाइये । और उपाख्यान में आगे लिखा है कि तब हंसरूप में ब्रह्माजी मनरूपी वायु के वेग से उड़ कर ऊपर की ओर गए । वे सभी ओर से पंखों से युक्त हो गए थे ।

आगे की कथानुसार उधर नारायण ने जो रूप धारण किया वह मेरुपर्वत तुल्य ऊंची देहवाले कृष्णवराह ( काले वराह ) का था , जो विशाल थूथनवाला व प्रलयकालीन सूर्य के समान प्रकाशमान था , यही नहीं वह भीषण शब्द भी कर रहा था । ऐसे सर्वथा अपराजेय ( काले वराह ) का रूप धारण करके विष्णुजी उस अग्निस्तम्भ सदृश लिंग के नीचे के ओर गए और इस प्रकार एक हजार वर्ष तक वे वेगपूर्वक नीचे की ओर जाते रहे, किन्तु वराहरूप विष्णु इस लिंग के मूल का अल्पांश भी नहीं देख सके । दूसरी ओर ब्रह्माजी भी पूरे प्रयास के साथ शीघ्रतापूर्वक उस लिंग का अंत जानने के लिए ऊपर व और अधिक ऊपर जाते रहे । ( यहां वर्णित उपाख्यान गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्रीलिंगमहापुराणांक के सत्रहवें अध्याय से से लिया गया है । )

दसवें श्लोक में शिव को “गिरीश” कह कर संबोधित करते हुए गायक कहते हैं कि हे कैलाशपति ! अग्निस्तम्भ के समान महान् दीप्तिमान आपके भव्यतेजोमय लिंग अथवा मूर्त्ति के आदि-अन्त का सन्धान करने के लिये विरंचि यानि ब्रह्मा ऊपर की दिशा में तथा हरि नीचे की दिशा में प्रयत्नपूर्वक जो गये तो वे दोनों उसका पार पाने में अक्षम रहे । ब्रह्माजी दूरातिदूर ऊपर की दिशा में व षडैश्वर्यवान् हरि निम्नातिनिम्न नीचे की दिशा में यत्नपूर्वक जाकर भी उसके ओर-छोर का पता लगाने में सक्षम न हुए । इस प्रकार कहा गया कि दोनों अग्निखम्भ की भाँति परम दीप्तिमान उस लिंग के ऊपर व नीचे की दिशाओं में प्रयत्नपूर्वक सुदूर तक गये । किन्तु अहं के मद में डूबे उनके प्रयास यथेष्ट न सिद्ध हुए । यहाँ दो बातें द्रष्टव्य है । पहली यह कि गिरि + ईश से बने “गिरीश” शब्द में गिरि से अभिप्राय कैलाशगिरि अथवा कैलाश-पर्वत से है । एतदर्थ इसका सम्यक् अर्थ है कैलाशपति । दूसरी बात देखने योग्य यह है कि यहां ऊपर व नीचे को दिशा क्यों कहा, यह जिज्ञासा का विषय बन सकता है । तो इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार होगा । हम दशों दिशाएं  शब्द बहुधा पढते हैं । यह जानने योग्य है कि दश दिशाएं कौन सी हैं । पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण – यह चार दिशाएं हम भली भाँति जानते हैं । इनके अतिरिक्त चारों दिशाओं के चार कोण भी हैं – पूर्व और दक्षिण के बीच वाला कोण दक्षिण-पूर्व या आग्नेय कोण कहलाता है, दक्षिण और पश्चिम के बीच वाला कोण दक्षिण-पश्चिम या नैऋत्य कहलाता है । उसी तरह पश्चिम और उत्तर के बीच के कोण को उत्तर-पश्चिम या वायव्य कोण कहते हैं तथा उत्तर और पूर्व के बीच वाले कोण को ईशान कोण कहते हैं । इस प्रकार चार दिशाएं व चार कोण मिलाकर हुए आठ । अब इसके अलावा एक दिशा हुई ऊपर और अन्य दिशा हुई नीचे । तो कुल मिलाकर इस तरह हो गईं दश दिशाएं ।

जैसा कि ऊपर बताया गया कि देवद्वय ( दोनों देव ) शिव के परमैश्वर्य, दूसरे शब्दों में उनके परम तेजोमय लिंग अथवा विभूति का पार पाने में असमर्थ रहे । वे हठात् यत्न-परायण होकर ऊपर और नीचे जाते रहे । उनके सम्मिलित दिव्य प्रयास दुराग्रह मात्र बन कर रह गये, जिनके निष्फल होने पर उनका कर्त्तृत्वाभिमान जाता रहा । तब उनमें परात्पर भगवान शिव की भगवत्ता का बोध अवतरित हुआ । गन्धर्वराज कहते हैं कि सर्वसमर्थ आपके प्रति तब दोनों देव श्रद्धा एवं भक्ति के अतिरेक से भर गये तथा भावाभिभूत हो कर उन्होंने अभीष्ट स्तुतियों द्वारा का स्तवन किया । हे गिरीश ! इस प्रकार वे आपके शरणपन्न हुए एवं मुक्तकण्ठ से आपकी स्तुति करते में समाहित चित्त हुए उन दोनों के सम्मुख आप स्वयं आकर स्थिर हो गये, अर्थात् प्रकट हो गए । आपने उन्हें अपने शुद्ध स्वरूप का दर्शन कराया । लब्ध-दर्शन विरंचि व हरि आपकी कृपा का आश्रय ग्रहण करके धन्य हुए । यही तो आपकी शरण में आने वालों का सौभाग्यातिशय है । आपका अनुसरण करना, आपकी कृपा का अवलम्बन ग्रहण करना क्या फलीभूत नहीं होता ? अर्थात् अवश्य होता है । त्रैलोक्य में जो कुछ भी सुदुर्लभ और सुरदुर्लभ है वह शिवाराधक को सहज ही सुलभ है, यहाँ तक कि मोक्ष भी ।

ऊपर श्लोक की तीसरी पंक्ति में एक लंबा संधियुक्त शब्द आया है भक्तिश्रद्धाभरगुरुुुुगॄणद् भ्याम् । यह समझने योग्य है । भक्तिश्रद्धाभर का अर्थ है भक्ति व श्रद्धा का आधिक्य । अन्य शब्द जो इसमें जुड़ा है, वह है गुरुगॄणद्भ्याम् । यहां गुरु शब्द विस्तार का वाचक है । गुरु का प्रसिद्ध व प्रचलित अर्थ है शिक्षा-दीक्षा देने वाला शिक्षक या आचार्य । इसके अलावा कतिपय अन्य अर्थ भी हैं, जो अधिकता, भार व विस्तार के वाचक हैं , जैसे गुरुत्वाकर्षण को ही लिया जाये । गुरुत्वाकर्षण ( गुरु + त्व+ आकर्षण ) अर्थात् भारीपन का खिंचाव या आकर्षण, यहाँ यह भार का द्योतक है । गरुत्मान व गरुड़ शब्द भी इसीकी संगत से बने हैं । प्रस्तुत श्लोक में गुरु का अर्थ निकलता है प्रशस्त । यह विस्तार का वाचक है । स्तुति के साथ जुड़ कर यह स्तुति के विस्तृत होने का, लंबी होने का अर्थ ध्वनित करता है । संधि-विच्छेद करने पर अगला शब्द आता है गॄणद्भ्याम् । गॄ का अर्थ है स्तुति करना और इसका गॄणद्भ्याम् जो रूप बना उससे “स्तुति करते हुए दोनों”, यह अर्थ निकलता है । कुल मिला कर भक्तिश्रद्धाभरगुरुगॄणद्भ्यां से व्यक्त होता है, श्रद्धा- भक्ति के अतिरेक से प्रशस्त स्तुति करते हुए उन दोनों ( के सम्मुख ) । इस एक शब्द से प्रकट होता है शिव के प्रति भक्ति व श्रद्धा के उत्कर्ष से देवद्वय का प्रशस्त स्तुतिगान करना, प्रकारांतर से मुक्तकण्ठ से स्तवन करना ।

दसवेें श्लोक के भाव सेे यह सत्य प्रकाशित होता है कि जिस प्रकार ब्रह्मा व विष्णु के लिये परमेश्वर शिव के तेजोलिंग का आदि-अन्त अपरिमेय और अपरिकल्पनीय था, उसी प्रकार जीवमात्र पर उनकी करुणा भी अननुमेय ( जिसका अनुमान न लगाया जा सके ) और असमापेेय ( जो कभी समाप्त न हो ) है । श्रीलिंगमहापुराण में वर्णित कथा के अनुसार ब्रह्मा व विष्णु का विवाद अत्यंत मंगलकारी सिद्ध हुआ, क्योंकि इसे समाप्त करने के निमित्त शिव स्वयं वहां प्रकट हुए । उसी समय से लोकों में शिवलिंग के पूजन की प्रसिद्धि व्याप्त हो गई ।

श्लोक ९ अनुक्रमणिका श्लोक ११

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2 comments

  1. Dr Mahesh Sharma says:

    Thank you very much for such an elaborate description of Shinmahimna stotra., but sorry I couldn’t find description after 10 th Shloka .
    I will be highly obliged if you can help me by providing descriptions of rest all shlokas in Hindi
    Om naman shivay
    God bless you
    🙏🏻

    • Kiran Bhatia says:

      Thank you so much. I am sorry for the delay in publishing the next shlok. You will find it in a day or two. Om namo Shivaay.
      इति शुभम् ।

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