शिवमहिम्नःस्तोत्रम्

श्लोक ११

Shloka 11 Analysis

अयत्नादापाद्य त्रिभुवनमवैरं व्यतिकरं
दशास्यो यद्बाहूनभृत रणकण्डूपरवशान् ।
शिर: पद्मश्रेणीरचितचरणाम्भोरुहबले:
स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम् ।। ११ ।।

अयत्नादापाद्य त्रिभुवनमवैर व्यतिकरं
अयत्नादापाद्य = अयत्नाद् + आपाद्य
अयत्नाद् = अनायास
आपाद्य = पा कर
त्रिभुवनमवैरम् = त्रिभुवनम् + अवैरम्
त्रिभुवनम् = तीनों लोक
अवैरम् = वैररहित ( वैरीरहित )
व्यतिकरं = मिला कर ( पूरी तरह )
दशास्यो यद्बाहूनभृत रणकण्डूपरवशान्
दशास्यो = दशास्य: ( = दशमुख )
यद्बाहूनभृत = यद् + बाहून् + अभृत
यद् = जो
बाहून् = भुजाओं को
अभृत = धारण किया
रणकण्डूपरवशान् = रणकण्डू + परवशान्
रणकण्डू = युद्ध के लिये खुजली ( हो रही हो जिनमें )
परवशान् = ( युद्ध की तीव्रेच्छा ) के अधीन
शिर: पद्मश्रेणीरचितचरणाम्भोरुहबले:
शिर: = मस्तक , शीश
पद्मश्रेणीरचितचरणाम्भोरुहबले = पद्मश्रेणीरचित + चरणाम्भोरुह + बले:
पद्मश्रेणीरचित = कमलों की पंक्ति बना कर
चरणाम्भोरुह = चरण + अम्भ: + रुहम्
चरण = पाद, पैर
अम्भ: = जल
रुहम् = उगनेवाला
अम्भोरुहम् = कमल
चरणाम्भोरुह = चरणकमल, वे चरण जो कमल जैसे हों
बलेः = बलि का, अर्पण का, भक्ति का मस्तकरूपी कमलों की क़तार को ( आपके ) कमलवत् चरणों में अर्पण करने का
स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम्
स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर = स्थिरायाः + त्वद् + भक्ते: + त्रिपुरहर
स्थिरायाः = दृढीभूत
त्वद् = आपकी
भक्ते: = भक्ति का
त्रिपुरहर = ( हे ) त्रिपुरारी
विस्फूर्जितमिदम् = विस्फूर्जितम् + इदम्
विस्फूर्जितम् = फल, परिणाम, प्रताप ( है )
इदम् = यह

अन्वय

त्रिपुरहर ! शिर:पद्मश्रेणीरचितचरणाम्भोरुहबले: स्थिराया: त्वद्भक्ते: इदम् विस्फूर्जितम् यद् दशास्य: त्रिभुवनम् अयत्नाद् अवैरव्यतिकरम् आपाद्य रणकण्डूपरवशान् बाहून् अभृत ।

भावार्थ

हे त्रिपुरान्तक ! ( रावण द्वारा अपने ) मस्तकरूपी कमलों की क़तार को आपके कमलवत् चरणों में अर्पण करके की गई ( उसकी ) सुदृढ़ भक्ति का यह फल ( प्रताप ) है कि दशमुख ( रावण ) ने त्रिलोकी को सहज ही में ( अनायास ) पूरी तरह शत्रुत्वरहित ( शत्रुरहित ) बना कर ऐसी भुजाओं को धारण किया, जो युद्ध करने की इच्छा के वशीभूत होकर सदा खुजलाती रहतीं थीं, अर्थात् युद्ध के लिए सदैव विकल रहती थीं ।

व्याख्या

शिवमहिम्न:स्तोत्रम् के ग्यारहवें श्लोक में स्तुतिगायक पुष्पदन्त दशग्रीव रावण के अतुलनीय पराक्रम का उदाहरण देकर बताते हैं कि भगवान भूतभावन के भक्त कैसे निर्भय और निष्कण्टक होकर जीवनयापन करते हैं । राक्षसाधिप रावण दैत्य सुमाली की पुत्री कैकसी (उसका अन्य नाम कैशिकी भी है ) से उत्पन्न था, अतः मातृकुल से राक्षस किन्तु पितृकुल से महर्षि पुलस्त्य का पौत्र तथा विश्रवा ऋषि का औरस पुत्र होने से मुनिकुमार था । राक्षसाधिप रावण अपने बलवीर्य से देवों, दैत्यों, असुरों और अन्य राक्षसों को पराजित कर उनका नियन्ता बना हुआ था । वह यथावसर इन पर कृपा भी करता था और इन्हें दण्ड भी देता और उद्दण्डता से उनका उपहास भी करता था । प्रवंचनापटु और प्रबल पराक्रमी रावण युद्धकला से संपन्न तथा मायायुद्ध करने वाला राक्षस था । किन्तु साथ ही राक्षसशार्दूल रावण उच्च कोटि का विद्वान, वेदपाठी एवं धार्मिक तथा परम नैष्ठिक शिवोपासक भी था । उसने रोमहर्षक कठिन तप किया था । उसके महाप्रतापी होने के पीछे उसका उग्र तप तो था ही साथ ही अपने स्वयं के प्रति निष्ठुर होकर की गई उसकी शिवपूजा भी थी । महादेव का अर्चन करके उसने अमित यश का अर्जन किया था । स्कन्दपुराण में रावण विषयक उपाख्यान वर्णित है कि रावण ने परम वैराग्य में स्थित होकर, अपने जीवन के प्रति ममता का त्याग करके एक सहस्र वर्षों तक घोर तपस्या करते हुए अपना मस्तक शिवलिंग की पूजा करते हुए समर्पित कर दिया । इस प्रकार अन्य बहुत से शिरों को भी काट कर उसने भगवान शिव की पूजा के हेतु समर्पित कर दिये ।

एवं शिरास्य बहूनि येन समर्पितान्येव शिवार्चनार्थे ।
स्कन्दपुराण

अर्थात् इस तरह बहुत से शिर उसने शिवार्चनार्थ समर्पित कर दिये । रावण का दिग्विजयपरक पराक्रम उपासना-सम्भूत तथा वरदानाश्रित था ।

प्रस्तुत श्लोक में दशकण्ठ की इसी अर्चना की बात कही गई है । स्तुतिकार कहते हैं कि हे पुरमथन ! आपकी पूजा के लिए दशानन ने अपने मस्तकरूपी कमलों की कतार आपके सम्मुख लगा दी थी, दूसरे शब्दों में आपके चरणकमलों में अपनी मस्तक-माल समर्पित कर दी । कहने का तात्पर्य यह है कि पूजन में प्रयुक्त होने वाले कमलपुष्पों के स्थान पर अपने शीश उसने महादेव के चरणकमलों में अर्पित कर दिये । आपको इस हृदयहारी पूजन से तुष्ट करके उसने आपका कृपाप्रसाद अर्जित किया । उसके बलवीर्य में आपका ही का तेज उद्भासित हो रहा था । हे प्रभो , हे पुरमथन ! आपकी इसी प्रसन्नता का यह प्रताप है कि उसे समस्त विश्व को पराजित करने में सक्षम बनाने वाला भयंकर भुजबल प्राप्त हुआ । यही नहीं, उसने अपने अमित विक्रम से तीनों लोकों को अनायास जीत लिया व कहीं ऐसा कोई शत्रु उसका शेष न रहा जो अविजित रहा हो । स्तुतिकार का कहना है कि दशग्रीव रावण की बलिष्ठ भुजाएं सदैव युद्ध करने के लिए खुजलाती रहती थीं अर्थात् तीव्र युद्धेच्छा के कारण, युद्ध-लालसा तुष्ट करने हेतु व्यग्र रहती थीं । वह अपने अति विक्रम को पुनः पुनः प्रकट करने के लिए लालायित रहता था । हे त्रिपुर के संहारक ! समूची त्रिलोकी को रावण ने सहज ही में शत्रुत्वरहित बना दिया था अर्थात् शत्रुशून्य बना कर रख दिया था । कहीं कोई उसकी ललकार का सामना करने में समर्थ न होने के कारण एवं उससे शीघ्र ही पराजय स्वीकार कर लेने के कारण उसकी युद्ध कर के शत्रु को क्रूरता से परास्त करने की क्षुधा शांत न होती थी । अतः श्लोक में कहा है कि उसकी दुधर्ष व दुर्जेय भुजाएं युद्ध करने के लिए खुजलाती रहतीं थीं अर्थात् अधीर रहती थीं । जैसे खुजली चलने पर व्यक्ति अधीर और अवश हो जाता है व खुजली जहां जहां चलती है वहीँ वहीँ खरोंचे बिना नहीं रह सकता और खुजला कर ही सुख पाता है, वही स्थिति महाभयंकर चरित्र वाले दशानन की थी ( क्योंकि मनुष्य के सिवा अन्य किसी भी योनि के जीव से उसे अवध्यत्व का वरदान प्राप्त था और मनुष्य तो स्वयं ही जरा, रोग व आधि-व्याधि से पीड़ित रहने के कारण निर्बल होने से उसे मार नहीं सकते, ऐसा उसे विश्वास था ) । और इस अमित पराक्रम के पीछे हे पुरमथन ! आपकी कृपा ही प्रवर्त्तमान रही । आपकी अनुकम्पा के प्रचुर प्रसाद के फलस्वरूप उसका साहस तथा बाहुबल बहुगुणित हो गया था । उसकी बलिष्ठ भुजाएं उसके वश में न होकर कुछ कर डालना चाहती थीं । यह आपकी दृढ़ भक्ति की परिणति थी कि सहज ही वह पूर्णतः शत्रुत्वरहित अर्थात् शत्रुरहित होकर निष्कंटक राज्यश्री का भोग कर रहा था ।

वाल्मीकि रामायण ‘ में रावण के विषय में लिखा गया यह श्लोक ध्यातव्य है –

देवगन्धर्वभूतानामृषीणां च महात्मनाम् ।
अजेय समरे घोरं व्यात्ताननमिवान्तकम् ।।

र्थात् देवता, गन्धर्व, भूत, ऋषि और महात्मा भी उसे जीतने में असमर्थ थे । समरभूमि में वह मुंह फैला कर खड़े हुए यमराज की भांति भयानक जानकारी पड़ता था ।

इस प्रकार पुष्पदन्त ग्यारहवें श्लोक में अवढरदानी भगवान शिव की कृपा-प्रसाद के प्रताप को रूपायित करते हैं ।

श्लोक १० अनुक्रमणिका

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