शिवमहिम्नःस्तोत्रम्

श्लोक १७

Shloka 17 Analysis

वियद्व्यापी तारागणगुणितफेनोद्गमरुचि:
प्रवाहो वारां य: पृषतलघुदृष्ट: शिरसि ते ।
जगद्द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमि-
त्यनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपु: ।। १७ ।।

वियद्व्यापी तारागणगुणितफेनोद्गमरुचि:
वियद्व्यापी वियत् + व्यापी
वियत् = आकाश, अंतरिक्ष (में)
व्यापी = छिटके हुए, फैले हुए
तारागणगुणितफेनोद्गमरुचि: तारागण + गुणित + फेन +उद्गम + रुचि:
तारागण = तारक-समूह
गुणित = (से) बहुगुणित, प्रचुर मात्रा में
फेन = बुलबुले, झागमय जलराशि
उद्ग़म = बढ़ी हुई, अभिवृद्धि को प्राप्त, संपन्न
रुचि: = शोभा से, आभा से
प्रवाहो वारां य: पृषतलघुदृष्ट: शिरसि ते
प्रवाह: = बहाव, धारा
वाराम् = जल का
य: = जो
पृषतलघुदृष्ट पृषत् + लघु + दृष्ट:
पृषत् = जल की बूंद
लघु = नन्ही, सूक्ष्म, तुच्छ
दृष्ट: = दिखाई देती है
शिरसि = सिर पर
ते = आपके
जगद्द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमि-त्यनेनैवोन्नेयं
जगद्द्वीपाकारम् जगत् + द्वीप + आकारम्
जगत् = पृथ्वी
द्वीप = टापू
आकारम् = रूप, आकृति
जलधिवलयम् जलधि + वलयम्
जलधि = समुद्र
वलयम् = वृत्त, परिधि
तेन = उसके द्वारा
कृतमि-त्यनेनैवोन्नेयं कृतम्+ इति + अनेन + एव + उन्नेयम्
कृतम् = किया गया
इति = इस तरह
अनेन = इससे, इस बात से
एव = ही
उन्नेयम् = जाना जा सकता है
कृतमि-त्यनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपु:
कृतमि-त्यनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपु: कृतम् + इ + ति + अनेन + एव + उन्नेयम्
कृतम् = किया गया
इति = इस तरह
अनेन = इससे, इस बात से
एव = ही
उन्नेयम् = जाना जा सकता है
धृतमहिम = महिमाशाली, महिमा-युक्त
दिव्यम् = दैवी, लोकोत्तर, भव्य
तव = आपकी
वपु: = देह, काया

अन्वय

वियत् व्यापी (च) तारागण गुणित उद्गम रुचि: फेन वाराम् य: प्रवाह: ते शिरसि लघु पृषत् दृष्ट: तेन जगत् जलधिवलयम् द्वीप आकारम् कृतम् अनेन एव तव दिव्यम् वपु: धृतमहिम इति उन्नेयम् ।

भावार्थ

पूरे नभ में फैला हुआ एवं ताराओं की द्युति से झिलमिलाती बुदबुदमयी फेनराशि से युक्त, आकाश के उस फेनिल-उज्ज्वल जल का (आकाशगंगा का) प्रवाह, जिसने सागर के रूप में पूरी पृथ्वी को वलयित करके अर्थात् घेर कर उसे (पृथ्वी को) एक द्वीप के आकार का बना दिया है अर्थात् पानी के बीच में एक द्वीप जैसी लगती है पृथ्वी, वह फेनयुक्त जलप्रवाह (आकाशजल)आपके शिर पर (केवल) नन्ही-सी बूंद जैसा दिखता है । गगनगंगा के इस अथाह जलप्रवाह अथवा जलराशि का आपके शिर पर नन्ही-सी (तुच्छ) बूंद के समान दीख पड़ने से ही जाना जा सकता है कि आपका दिव्य श्रीशरीर कैसी लोकोत्तर महिमा से मण्डित है !

व्याख्या

शिवमहिम्न:स्तोत्रम् के १७वें श्लोक में गन्धर्वराज पुष्पदंत अपने परमाराध्य भगवान गंगाधर की स्तुति करते हुए उनके श्रीविग्रह (दिव्य वपु) की भव्य महिमा के गुणानुवाद का गायन करते हैं व उनके अप्रतिम रूप के सर्वतोमुख विस्तार की एक छवि प्रस्तुत करते हैं । उनका अभिप्राय यह है कि महादेव के श्रीशरीर के पावन प्रसार की गरिमा अपरिमेय है तो साथ ही अननुमेय भी । इस तथ्य को स्पष्ट करने हेतु वे नेत्रपटल के सम्मुख एक व्योमव्यापी विराट शब्द-प्रतिमा उत्कीर्ण कर देते हैं । उनके अनुसार महादेव की श्रीदेह इतनी विराट एवं महिमाशालिनी है, जिसकी कल्पना करना किंचित् भी संभव या सुकर नहीं । स्तुतिगायक अंतरिक्ष में व्याप्त आकाशगंगा का संक्षिप्त चित्रण करते हैं । वे कहते हैं कि तारक किरणों की टिमटिमाती आभा जब आकाशगंगा की बुदबुद-बहुला झाग पर झिलमिल करती है, तब व्योमव्यापी फेनवारि का वह प्रवाह अर्थात् आकाशगंगा का प्रवाह असंख्यगुनी आभा से भास्वर हो उठता है । कवि के शब्दों में कहें तो यह सौन्दर्य व यह द्युति तारागणगुणितफेनोद्गमरुचि: से संपन्न है ।

पुण्यतोया गंगा नदी को पुराणों में ब्रह्मद्नव कहा गया है । यह प्राणधारा, यह द्रव अन्तरिक्ष में विद्यमान रहता है । स्तुतिकार के अनुसार आकाशव्यापिनी गंगा फेन-बहुल ऊर्मियों से तरंगायित है, और यह फेन अथवा झाग बुलबुलों से भरी होती है । पयफेन अथवा बुदबुदरूपिणी जलराशि अन्तरिक्ष में विलसती गंगा का बोध कराती है । यह बुदबुदमय जल अपनेआप में जीवनी-शक्ति या ऊर्जा समेटे हुए है । इस तरह आकाशगंगा के फेन-संकुल सलिल का प्रवाह उठते-फूटते बुदबुदों से विलुलित है । आकाशजल के इस पारदर्शी प्रवाह पर तारकमाला की स्फुटोज्ज्वल (स्फुट+उज्ज्वल) आभा जब झिलमिल करती है, उस समय आकाशगंगा राशि-राशि किरणद्युति से कान्तिमती हो उठती है । यह आकाशगंगा ही भूलोक पर गंगा बन कर लहराती है । ब्रह्माण्ड की अलौकिक पवित्रता व गन्धवती धरा की पार्थिवता की मिलन-लीला को लपेटती लहराती गंगा का एक नाम गगनसिन्धु भी है । वाराहपुराण में गंगा शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में पुराण का यह कथन है – गाम् गता अर्थात् पृथ्वी की ओर गई है जो ।

गन्धर्वराज स्वर्गगंगा की महिमा को अपने प्रगल्भ स्वर में गाते हैं तथा कहते हैं कि आभाभरी नभचारिणी गगनगंगा के प्रवाह का जल सागररूप से पृथ्वी को चारों ओर से इस प्रकार घेरता है कि इससे परिवलयित पृथ्वी द्वीप जैसी प्रतीत होती है जगत् द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतम् । जलधि सागर को कहते हैं तथा वलय से अभिप्रेत है वृत्त । (वलय शब्द बहुधा समास के अंत में प्रयुक्त होता है, जैसे भ्रूवलय, लतावलय, दिग्वलय आदि ।) विद्वान व भक्त लेखक श्री सुदर्शन सिंह ‘चक्र’ अपनी पुस्तक भगवान वामन  में लिखते हैं – “लेकिन ग्रह नक्षत्रादि जहां तक पार्थिव द्रव्य हैं, पुराण उस पूरे विस्तार को पृथ्वी ही कहते हैं ।” यहाँ यह ध्यातव्य है कि स्तुतिगायक गन्धर्वराज हैं । गन्धर्व देवयोनि है । वे महादेव के परम नैष्ठिक भक्त तो हैं ही, साथ ही विचक्षण बुद्धिमत्ता से युक्त विद्या-विशारद भी हैं । उनके द्वारा संकेतित जगत् को केवल हमारी पृथ्वी (ग्रह) तक ही सीमित रखना एक महत् प्रयोजन को सिद्ध नहीं करता । अवश्य ही उनका आशय अनल्प (= जो अल्प न हो, अर्थात् बड़ा) है । अनादि काल से कोटि-कोटि बृहदाकार ब्रह्माण्ड अनन्त अन्तरिक्ष के रहस्यमय क्रोड़ (गोद) में क्रियारत व क्रीड़ारत हैं । आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी अपने निबन्ध केतु-दर्शन में जगत् द्वीपाकारं जलधिवलयम् से कुछ मिलती-जुलती बात कहते हैं । आचार्यजी के अनुसार—

विराट शून्य को अगर समुद्र समझें तो उनमें कोटि-कोटि नक्षत्रपुंज कई द्वीप-पुंजों के समान हैं । हमारा यह नक्षत्र-जगत एक द्वीपपुंज है ।

स्तुतिकार जगत् को सागर से संवृत्त द्वीप की प्रतिमा या मूरत रूप में देख रहे हैं । दूसरे शब्दों में हमारा जगत (जो पार्थिव द्रव्य की क्रीड़ा-भूमि है) भी अनन्त आकाश से, प्रकारान्तर से आकाशरूपी महाजलधि से घिरा हुआ है तथा उसकी आकृति भासती है अन्तरिक्ष अथवा व्योम में एक द्वीप जैसी । इस बात से यह परिलक्षित होता है कि गन्धर्वराज का आशय विराट से संबंध रखता है । यही कारण है कि वे अपने द्वारा वर्णित बुदबुद-बहुल फेनसंकुल वारिप्रवाह को वे वियद्व्यापी बताते हैं, जिसकी तरल झिलमिल द्युति, तेजपुंज तारों के प्रकाश के उस पर प्रतिबिम्बित तथा प्रतिफलित होने से तारागणगुणित हो उठती है, दूसरे शब्दों में कहें तो असंख्यगुनी अभिवृद्धि को प्राप्त होती है । इस तरह यह आकाशीय अम्बुप्रवाह अलौकिक है । पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार राजा सगर के वंशज राजर्षि भगीरथ के अथक प्रयासों से देवापगा (देव+ आपगा अर्थात् देवनदी) भूलोक पर पधारीं । (इन्हीं राजा सगर के नाम से समुद्र को सागर कहा जाता है, क्योंकि इनके १००वें अश्वमेध यज्ञ का अश्व इन्द्र ने छुपा दिया था व इनके ६० हज़ार पुत्रों ने, अश्व के कहीं पर न दिखाई देने पर धरा के भीतर यज्ञीय अश्व को खोजने के हेतु पृथ्वी को खोद डाला था, जिससे समुद्र की सीमाएँ बढ़ गईं थीं, अत: समुद्र को सगर के नाम से सागर भी कहा जाने लगा ।) कल्याण में प्रकाशित लेख ‘संस्कृत वांगमय में भगवती गंगा’ में लेखक डा. गिरिजाशंकरजी शास्त्री ने शंकराचार्यजी द्वारा रचित स्तुति के एक श्लोक को उद्धृत किया है, जिसका निम्नलिखित अंश सूचित करता है कि गंगा ब्रह्माण्ड को तोड़ कर आती हुई महादेव के जटाजूट को शोभित करती है ।

ब्रह्माण्डं खण्डयन्ती हरशिरसि जटावल्लिमुल्लासयन्ती

अगली पंक्ति में भगवान गंगाधर से स्तुतिगायक कहते हैं कि आपके शिर पर आभा से भास्वर नभगंगा का चमक-चटुल प्रवाह एक नन्हे-से बिन्दु सा दृश्यमान होता है, दूसरे शब्दों में बड़ा तुच्छ दिखाई देता है, जिसकी स्थिति नगण्यप्राय दिखती है । जो विष्णुपादाब्जसम्भूता सुरसरिता समूची सृष्टि को बहा ले जाने में सक्षम है, वह सूक्ष्म जलकण के सदृश भासती है आपके जटाशोभित शीश पर । केवल एक इसी बात से सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि लोकोत्तर गुणों से समन्वित आपका श्रीशरीर कितना भव्य, कितना विराट है तथा इसकी महिमा कितनी अपार और अथाह है । इसीलिये स्तोत्र के आरम्भ में पुष्पदन्त ने कहा है अतीत: पन्थानं तव च महिमा । पुराणों में गंगा-अवतरण की कथा वर्णित है कि राजर्षि भगीरथ की अक्लान्त एवं अत्युग्र तपस्या तथा प्रबल उद्योग के फलस्वरूप स्वर्गसरिता ने पृथ्वीलोक पर आना स्वीकार किया और देवापगा के प्रचण्ड वेग को धारण करने के लिये भगीरथ ने भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न किया । अतएव ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को जब पापनाशिनी, पुण्यसलिला माता मकरवाहिनी अपने विनाशकारी वेग के साथ भू पर उतरने लगीं, तब शिव ने उन्हें धारण करने के लिये अपनी जटाओं को उन्मुक्त किया तथा प्रबल विनाशकारी वेग से अवतरित होती सुरस्रोतस्विनी को अपने जटामण्डल में बद्ध कर लिया । परम शिवभक्त दशग्रीव रावण ने इसका बड़ा ही सुन्दर चित्रण किया है । उनके शब्दों में ,

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि।

(अर्थात् कड़ाह रूपी जटा में क्षिप्र गति से घूमती हुई सुरसरिता की चंचल-चटुल लहर-लताओं से श्रीशिव का शीश शोभायमान है ।) तत्पश्चात् कपिल मुनि की कोपाग्नि में भस्मीभूत अपने पूर्वजों की मुक्तिहेतु उनकी दग्धदेहों को बहा ले जाने के अर्थ भगीरथ ने शिव से गंगा को जटामुक्त करने की विनती की, तब धूर्जटि ने गंगा को मार्ग देने के लिये अपने जटिल केश की एक अलक (बालों की लट) किंचित् खोल दी, जिससे प्रचण्ड वेगवती देवनदी की कल्लोल करती तरंगलोला धारा फूट निकली । गंगा का एक नाम अलकनन्दा भी इसी कारण से है । नन्दा का अर्थ है पुत्री । अलक से उद्भूता गंगा अलकपुत्री, प्रकारान्तर से अलकनन्दा कहलायी । भगीरथ के पीछे-पीछे भूलोक के मार्ग पर तब कुलाँचे मारती हुई महापगा बहने लगी ।

सगरसन्ततिसन्तरणेच्छया प्रचलिताsतिजवेन हिमाचलात् ।

(अर्थात् सगर की सन्तानों को तारने की इच्छा से गंगा अति वेग से हिमालय से निकल पड़ीं ।) गंगा के भगवान शंकर की जटाओं से निकलने के कारण इसे लोक में जटाशंकरी कह कर भी पुकारा जाता है । गंगा की एक दूसरी तरुणमद में मत्त धारा पथावरोध फोड़ती भूगर्भपथ से पृथ्वी के भीतर प्रविष्ट हो गई । स्वर्ग, पृथ्वी व पाताल के तीन पथों होकर बहती हुई गंगा का एक नाम त्रिपथगा भी है ।

श्लोक की अन्तिम पंक्ति में कवि विश्वबीज महादेव के विराट धृतमहिम वपु के महैश्वर्य का यशोगान करते हैं ।शैवागमों में शिव को ही शून्य तथा शून्य को ही शिव कहा गया है, जिसे शैव-ग्रन्थ परम शिव  या पराशिव कह कर पुकारते हैं । इस श्लोक में स्तुतिकार कहते हैं कि भगवान विभु के दिव्य देह की, उनके अविरल विशाल वपु की लोकोत्तर महिमा का अनुमान मात्र इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके शिर पर ब्रह्माण्डव्यापिनी गंगा एक नन्ही बूंद के समान भासती है, पृषतलघुदृष्ट: । पृषत का अर्थ है बूंद, जल या किसी भी अन्य तरल पदार्थ की । और लघु यानि नन्ही तथा दृष्ट उसे कहते हैं जो दिखाई दे । बूंद के लघु दिखाई देने से अभिप्राय है कि गिरीश-शिर पर विलसती व वहाँ से निरवबाध भीषण-धार हो कर गरजती, बहती विबुधनदी किसी जलकण के समान नगण्य-सी, तुच्छ-सी प्रतीत होती है भगवान महाकाल के शीश पर, जबकि वह अन्तरिक्ष के परमाणुओं की पवित्र प्रवाहधारा अपने अंकपाश में समेटे हुए है । वपु से तात्पर्य उनके श्रीविग्रह से, उनके स्वरूप से है । कवि का कथन है कि नन्ही बूंद-सी सोहती है आकाशगंगा जिनके सिर पर, उन विराट का विभूतिवान वपु कितनी अलौकिक महिमा से मण्डित है । कैसी महिमाशालिनी हैं उनकी गंगाधरी जटाएं ! क्या ही दिव्य छटा है करुणावतार के कर्पूरगौर श्रीअंगों की ! उनके वपु की महिमा तो यह है कि ब्रह्मा और विष्णु भी उनकी तेजोमूर्त्ति का ओर-छोर न ढूँढ पाये । अत्यंत विराट है शिव का स्वरूप । उग्र भी है किन्तु क्रूर नहीं । प्रलयंकर हैं प्रभु किन्तु पीड़क नहीं । वे दृश्य नहीं, दृष्टा हैं । वे सर्व-आश्चर्य भी हैं एवं सर्व-आश्रय भी । जिसकी एक बूँद ही में डूब सकता है सकल विश्व, उस सरितांवरा को संहार के देवता अपने सिर पर धारण किये हुए हैं । ऐसी अद्भुत महिमाशालिनी है महेश्वर महाकाल की श्रीमूर्ति ।

श्लोक १६ अनुक्रमणिका

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4 comments

  1. S k Nath says:

    श्लोक १७ की व्याख्या के लिए कोटि कोटि नमन एवं धन्यवाद । इसी श्रृंखला में आगे के श्र्लोकों की प्रतीक्षा में हूं ।

    • Kiran Bhatia says:

      नमस्कार व आभार । अगला श्लोक यथाशीघ्र प्रकाशित करने की चेष्टा रहेगी । ।। ॐ नम: शिवाय ।।

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