शिवमहिम्नःस्तोत्रम्

श्लोक १९

Shloka 19 Analysis

हरिस्ते साहस्रं कमलबलिमाधाय पदयो-
र्यदेकोने तस्मिन् निजमुदरहरन्नेत्रकमलम् ।
गतो भक्त्योद्रेक: परिणतिमसौ चक्रवपुषा
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम् ॥ १९ ।।

हरिस्ते साहस्रं कमलबलिमाधाय पदयो-
हरिस्ते हरि: + ते
हरि: = भगवान विष्णु
ते = आपके
साहस्त्रम् = एक हजार
कमलबलिमाधाय कमलबलिम् + आधाय
कमलबलिम् = कमल-पुष्पों की भेंट
आधाय = चढ़ा कर (चढ़ाने का संकल्प करके)
पदयो: = चरणों में
पदयो-र्यदेकोने तस्मिन् निजमुदरहरन्नेत्रकमलम् ।
पदयो-र्यदेकोने पदयो: + यत् + एक: + ऊने
पदयो: = चरणों में (पहली पंक्ति में पदयो: है, उसका विसर्ग दूसरी पंक्ति में र् बन गया है)
यत् = जो
एक: = एक
ऊने = (संख्या में) कम हो जाने पर
तस्मिन् = उसमें
निजमुदरहरन्नेत्रकमलम् निजम् + उदहरत् + नेत्रकमलम्
निजम् = अपने
उदहरत् = (चढ़ाने के लिये) निकाल लिया
नेत्रकमलम् = कमल जैसे नयन को, नयन रूपी कमल को
गतो भक्त्योद्रेक: परिणतिमसौ चक्रवपुषा
गत: = गया
भक्त्योद्रेक: भक्ति + उद्रेक:
भक्ति = भक्ति-भावना (का)
उद्रेक = आवेग, अतिरेक
परिणतिमसौ परिणतिम् + असौ
परिणतिम् = बदल
असौ = वही
चक्रवपुषा = सुदर्शन चक्र के रूप में
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम्
त्रयाणाम् = तीनों (लोकों) की
रक्षायै = रक्षा के लिये
त्रिपुरहर = हे त्रिपुरारि
जागर्ति = जागता रहता है, सावधान रहता है
जगताम् = (तीनों) लोकों की

अन्वय

त्रिपुरहर ! हरि: ते पदयो: साह्स्रम् कमलबलिम् आधाय तस्मिन् एक: ऊने यत् निज नेत्रकमलम् उदहरत्, असौ भक्ति उद्रेक: चक्रवपुषा परिणतिम् गत: त्रयाणाम् जगताम् रक्षायै जागर्ति ।

भावार्थ

हे त्रिपुरारि ! भगवान विष्णु ने आपके चरणों में एक हज़ार कमल-पुष्पों को भेंट करने का अथवा चढ़ाने का संकल्प किया, उनमें (कमल-पुष्पों) से एक (कमल) कम हो जाने पर उन्होंने अपना नेत्र-रूपी कमल निकाल कर चढ़ा दिया, भक्ति का वह उद्दाम आवेग सुदर्शन चक्र के रूप में परिणत हो गया, जो तीनों लोकों की रक्षा करने के हेतु सावधान रहता है, तत्पर रहता है । दूसरे शब्दों में विष्णुजी की अपने प्रति भक्ति के अतिरेक से प्रसन्न हो कर महादेव ने श्रीहरि को सुदर्शन चक्र प्रदान किया । और इसी चक्र से तीनों लोकों की अधर्म और आसुरी शक्तियों से रक्षा करने में वे कभी नहीं चूकते अर्थात् वे सदैव सतर्क रहते हैं ।

व्याख्या

शिवमहिम्न:स्तोत्रम् के १९वें श्लोक में स्तुतिगायक गन्धर्वराज पुष्पदन्त हरि को शिव-भक्त चित्रित करके हरि और हर की परस्पर प्रीति-प्रशंसाभाव को प्रकाश में लाते हैं । वरद त्रिपुरारी श्रीहरि को अमोघ आयुध— सुदर्शन चक्र प्रदान करते हैं, जो तीनों लोकों की रक्षा के लिये सदैव तत्पर रहता है । इस वर्णन से जहां शिव के इस जगत् के प्रति सचिन्तमय व करुणामय रूप के दर्शन होते हैं, वहीं साथ में विष्णु व शंकर के प्रेमी-प्रेमास्पद रूप, आराधक-आराध्य रूप पर भी प्रकाश-प्रक्षेपण होता है । संकल्प-दृढ़ता तथा गहन व गाढ़ भक्तिभाव में कैसी शक्ति निहित है, इसकी झलक यह श्लोक देता है ।

पुराणों की कथा के अनुसार सुदर्शन चक्र विष्णुजी को शिवजी से प्राप्त हुआ । यह चक्र-दान उनकी भक्ति-भावातिशयता से प्रसन्न हो कर हर ने उन्हें त्रिलोकी की रक्षा हेतु किया । विष्णुजी जगत् के संपालक, संरक्षक हैं । उन पर त्रिभुवन में सबके लालन-पालन-पोषण का गुरु दायित्व है । उनके द्वारा चक्र को धारण करने में चक्र की सार्थकता एवं उसके महान् प्रयोजन की सिद्धि निहित है । वे ही दुर्दान्त दैत्यों के त्रास व आतंक बढ़ जाने पर आर्त्तजनों की रक्षार्थ दुष्टदलन करते हैं । पुराणों में प्राप्त चक्रदान का उपाख्यान संक्षेप में इस प्रकार है ।

लोक में दैत्य-शक्ति प्रबल होने पर आसुरी-आतंक से त्रस्त देवताओं ने भगवान विष्णु की शरण ली । आर्त्तों के दुःखहर्ता श्रीहरि ने शरण में आये हुए सुरों को उनके संकट-हरण का परम आश्वासन दिया । इस कार्य के लिये विष्णुदेव ने भगवान शंकर की अर्चा कर उन्हें प्रसन्न करने का संकल्प लिया व दृढ़परिकर हो कर उसमें जुट गये । एतदर्थ कैलाश के समीप जाकर शिवलिंग स्थापित करके उन्होंने शिवसहस्रनाम से अर्थात् भगवान शिव के एक हज़ार नामों के स्तवन से उनका पूजन-अर्चन आरम्भ किया, जिसके लिये एक सहस्र कमल-पुष्प भी उन्होंने अपने निकट रख लिये । वे महादेव के एक-एक नाम के साथ एकनिष्ठ हो कर उन्हें एक-एक कमल-पुष्प अर्पित करते जा रहे थे । इस पूजा के नियम के अनुसार साधक पूजा पूर्ण होने के पहले उठ नहीं सकता और न हि किसी से वार्ता कर सकता है । उस समय भगवान त्रिपुरारी ने अपनी अर्चना में संलग्न विष्णुजी के संकल्प की दृढ़ता और उनके प्रेम की प्रगाढ़ता की परीक्षा करने का मन बनाया । अतएव एकाग्रचित्त से पूजन करते हुए हरि के पास रखे हुए पुष्पों में से एक कमलपुष्प उठा लिया । वहाँ शिवार्चन में दत्तचित्त विष्णुजी ने पूजा के संपन्न होने से बस कुछ ही पहले अन्तिम नाम के साथ चढ़ाने के लिए एक पुष्प को कम पाया तो क्षणार्ध के लिये वे सोच में पड़ गये । बीच में से उठ कर जा नहीं सकते थे । तत्क्षण अविलम्ब एक विचार कहीं से सहसा उनके मन में कौंधा तथा तुरन्त ही उन्होंने अपना कमल जैसा सुन्दर एक नेत्र निकाल कर शिवजी के अन्तिम नाम के साथ उन पर चढ़ा दिया । वस्तुत: उनके मानस में यह त्वरित स्फुरणा हुई कि वे कमल समान अपने सुन्दर नेत्रों के कारण कमलनयन, पुण्डरीकाक्ष, राजीवलोचन, पद्मलोचन प्रभृति नामों से भी पुकारे जाते हैं, अतएव एक कमल के अलभ्य अथवा अदृश्य होने पर वे अपना कमल सदृश नेत्र भी तो आराध्य को अर्पित कर सकते हैं । उनकी भक्ति व समर्पण की पराकाष्ठा थी कि भगवान इन्दुमौलि तत्क्षण वहाँ पर प्रकट हो गये व सब कुछ पूर्ववत् कर दिया । विष्णुजी के अटल संकल्प और अटूट निष्ठा से, उनकी भक्ति-भावना के उद्दाम आवेग से भगवान शंकर उन पर प्रसन्न हुए । सत्य व धर्म की रक्षा के लिये सृष्टि के संरक्षक श्रीहरि को परमोदार देवाधिदेव ने तब सुदर्शन चक्र प्रदान किया ।

ऊपर वर्णित इसी कथा का सन्दर्भ देते हुए स्तुतिकार अपने आराध्य को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे त्रिपुरान्तक ! आपके चरणों में पूजन के साथ एक हज़ार कमलपुष्पों को भेंट करने का या अर्पित करने का संकल्प लिये हुए विष्णुजी ने एक कमल के पुष्प को कम पाकर अपने नेत्ररूपी कमल को निकाल कर जो रख दिया, यह तो उनकी शिव-भक्ति की सचमुच ही चरम सीमा थी । उनका वह कृत्य अकल्पनीय था । उसके पीछे उनकी भक्ति व प्रीति की अतिशयता के अतिरिक्त उनका सुदृढ़ संकल्प भी अबाध गति से कार्यरत था । इस चेतना के भासित होते ही कि उनके अपने नयन भी सरोज-सदृश हैं, किंकर्तव्यविमूढ़ हुए बिना तुरन्त ही कमलनयन हरि ने निज नेत्रकमलम् निकाल कर भेंट कर दिया आपके चरणों में निजमुदहरन्नेत्रकमलम् । भक्ति का वही उन्मुक्त उछाल श्रीहरि के अर्थ शिव-प्रदत्त सुदर्शन चक्र के रूप में बदल गया, जो सदा ही सतर्क रहता है जगत् की रक्षा के लिए ।

हरि के शिवार्चन व उनकी शिव-भक्ति का वर्णन करने वाली पौराणिक कथाओं का प्रयोजन हर व हरि में किसी को छोट-बड़ा बताना नहीं होता, अपितु (संभवतया) अपने आराध्य के गुणों को अतिरेक के साथ कहने का उनका शील (स्वभाव) होता है । पुराणकार शिव व विष्णु की अभिन्नता से अनभिज्ञ नहीं हैं । यह और बात है कि कोटि-कोटि जन निज भावानुसार तो कभी-कभी निज परम्परानुसार अपने-अपने इष्टदेव परमेश्वर के किसी रूप को मान लेते हैं और उस इष्टदेव की अपनी पद्धति के अनुसार पूजा-अर्चा करते हैं, किन्तु ईश्वर के अन्य रूपों के प्रति वे भावनाशून्य हों, ऐसा सामान्यतः देखने में नहीं आता । इस तरह हर व हरि की परस्पर प्रेम-प्रशंसा हमारे पुराणों की विशेषता है । गोस्वामी तुलसीदास के परमाराध्य रघुनाथजी रामचरितमानस में पुरारी के प्रेम में निमग्न हो कर कहते हैं शिव समान मोहि प्रिय न दूजा । वे महादेव के लिये कहते हैं सेवक स्वामि सखा समय पी के अर्थात् शिवजी सीतापति राम के सेवक, स्वामी और सखा हैं । स्कन्द पुराण, जो कि मूलत: एक शैव पुराण है, भगवान विष्णु की महिमा व प्रशंसा का मुक्त कण्ठ से गायन करता है । इस पुराण के वैष्णव खण्ड के अलावा अन्य खंडों में भी विष्णुजी की चर्चा बराबर आई है तथा उन्हें व भगवान शिव को समान श्रेणी में रखा गया है । उदाहरणार्थ,

यो विष्णु: स शिवो ज्ञेय: य: शिवो विष्णुरेव स: ।
—  महेश्वर-खण्ड  —

अर्थात् जो विष्णु हैं उन्हीं को शिव जानना चाहिये और जो शिव हैं उन्हें विष्णु ही मानना चाहिये । इतना ही नहीं, इस पुराण के कौमारिका खण्ड में तो ब्रह्मा, विष्णु व महेश तीनों को समान रूप से श्रेष्ठ बताया गया है । एक ही परम शक्ति के यह तीनों रूप हैं, जो कार्य की दृष्टि से तीन कर किये जाते हैं तथा कार्य के पूर्ण हो जाने पर तीनों पुन: एक रूप में समाविष्ट हो जाते हैं ।

प्रस्तुत श्लोक के वर्णन के अनुसार ( जो कि एक प्रचलित कथा भी है) स्पष्ट है कि हरि की भक्ति एवं प्रीति की प्रगाढता व संकल्प-दृढ़ता की परीक्षा हेतु भगवान त्रिपुरमथन ने पुष्पराशि से एक पुष्प को उठा कर उसे अदृश्य कर दिया । अब प्रश्न यह उठता है कि क्या कैलाशविहारी को विदित न था कि हरि का भक्तिभाव कितना उत्कट है और संकल्प कितना अटूट । इस विषय पर स्वामी महेशानन्द गिरि जी का बड़ा सुन्दर कथन है कि “परमेश्वर को तो पता रहता है कि दूसरे का बाह्य व अन्तर भाव कैसा है । उनको किसी की निष्ठा जानने के लिये परीक्षा की ज़रूरत नहीं है । परन्तु लोग मर्यादा समझें, इसके लिये लीला करने की आवश्यकता होती है ।” सच तो यह है कि शिवजी की यह निष्ठुरता की उनकी नाट्य-लीला थी। लीला करते हुए परमेश्वर भविष्य में होने वाली घटनाओं को अपने तरीक़े से घटा लेते हैं । श्रीराम स्वर्णमृग के छल को जानते थे । अवतार ले कर जो कुछ भी कृत्य किये जाते हैं प्रभु द्वारा वे सब उनकी लीला के अलावा और क्या हैं ? लीला सदा सोद्देश्य होती है । लीलाधर अपनी लीला प्रकट करके जगत् को विभिन्न घटनाओं के पीछे छिपे सत्य का, नीति का बोध कराते हैं, उन रहस्यों को उद्घाटित करते हैं, जिनका भावबोध जीवन-मूल्यों को रेखांकित करता है । प्रस्तुत कथा हमें बोध कराती है कि अपने आराध्य के प्रति मन प्रेम से छलकता हो, ऐसी भक्ति स्तुत्य है, क्योंकि ऐसी भावना फल-प्राप्ति की कामना से आगे निकल जाती है । फलाकांक्षी भक्त अपने संकल्प में अपरिहार्य विघ्न आने पर उसे छोड़ देता है । किन्तु बद्धसंकल्प व्यक्ति विघ्न से दूर न जा कर सर्व प्रकारेण विघ्न को दूर करने के उद्योग पर अडिग रहता है । आज के मनुष्य में बहुश: यह पाया गया है कि संकल्प का धनी नहीं है । तात्पर्य यहां नेत्र निकाल कर देने से नहीं है, अपितु लिये गये संकल्प पर सुदृढ़ता से टिके रहने का है ।

प्रस्तुत श्लोक में इसके आगे कवि बताते हैं कि श्रीहरि की भक्ति व प्रेम की प्रगाढता चक्रवपुषा में अर्थात् चक्ररूप में परिणत हो गई । उनके कथन का अभिप्राय है कि हरि की भक्ति के उद्दाम आवेग ने भगवान शिव को प्रसन्न कर दिया व प्रेम-परवश वे तत्काल वहाँ प्रकट हो गये तथा सृष्टि के संरक्षक श्रीहरि को उन्होंने सुदर्शन चक्र प्रदान किया । श्रीविष्णु इसे प्राप्त कर चक्रधर अथवा चक्रधारी कहलाये । केवल कहलाये ही नहीं, अपितु जगत् की रक्षा करने में कभी प्रमाद न करने वाले वे विष्णु चक्र पा कर कृतकृत्य हुए । इस तरह सुदर्शन चक्र भी सार्थक-प्रयोजन हुआ । सत्य व धर्म की रक्षा हेतु, तीनों लोकों की रक्षा हेतु त्रयाणाम् रक्षायै सुदर्शन चक्र सदा हरि के हाथ में रहता है, सावधान व सतर्क रहता है । हम पौराणिक आख्यानों में पढ़ते हैं कि उनके हाथ की तर्जनी अंगुलि पर शोभायमान चक्र सदा तत्पर रहा धर्म के शत्रुओं का शिरोच्छेद करने में । सतत सक्रिय व सावधान रहते हुए आर्त्तजनों को परित्राण दिया, शरण में आये लोगों के सुख का संवर्धन किया सतोगुण के अधिष्ठाता उन महिमामय देव नारायण ने ।

सुदर्शन चक्र के विषय में कतिपय तथ्यों को जानना समीचीन होगा । पहली बात तो यह है कि हरि के आयुध सचेतन हैं, वे जड़ नहीं । सुदर्शन चक्र की भाँति श्रीविष्णु की कौमोदकी गदा भी जड़ न हो कर चेतन है, ठीक रामबाण की तरह, जो सदा अचूक होते हैं । वे सुदर्शन चक्र को अपनी तर्जनी (पहली उँगली) पर धारण करते हैं । विष्णुजी अथवा उनके अवतार श्रीकृष्ण सुदर्शन चक्र का शत्रुओं पर प्रक्षेपण नहीं करते अर्थात् उसे फेंकते नहीं हैं (जैसा कि अल्प श्रद्धा वाले अथवा अल्प जानकारी वाले आधुनिक व्यक्ति समझते हैं), अपितु वे चक्र को चलाते हैं या उसे भेजते हैं शत्रु रूपी लक्ष्य की ओर । विद्वान लेखक श्री सुदर्शनसिंह चक्र का चक्र के विषय में कथन द्रष्टव्य है । उनके अनुसार “चक्रपाणि के करों का सहस्रार महाचक्र सुदर्शन भक्त के द्रष्टिपथ में सौम्य:तेजा है । वैसे वह प्रचण्ड प्रलयाग्नि ज्वालावृत्त रहा करता है । महाकाल भी काँपता है उनके अदम्य तेज को देख कर ।” जब इसे चलाया जाता है तब यह तीव्रगामी अमोघ आयुध तत्क्षण सक्रिय हो कर प्रचण्ड वेग से भीषण अग्नि प्रज्ज्वलित करता हुआ, भय उपजाता हुआ शत्रु की ओर निर्बाध गति से बढ़ता है तथा पापात्मा का वध करके पुन: हरि की तर्जनी पर जाकर अवस्थित हो जाता है । लक्षित व्यक्ति के भाग खड़े होने पर चक्र उसका पीछा करता है । इससे बचने के लिये शत्रु को तीनों लोकों में भी कहीं किसी की शरण नहीं मिलती । पौराणिक आख्यानों में ऋषि दुर्वासा की कथा आती है कि विष्णु-भक्त राजा अम्बरीश के अपमान करने के अपराध में विष्णुजी का सुदर्शन चक्र उन क्रोधी ऋषि की ओर चल पड़ता है और अपनी रक्षार्थ जहां-जहां वे भागते जाते हैं, वहाँ-वहां चक्र भी उनका पीछा करता है । तब ब्रह्मलोक, शिवलोक में कहीं भी पीछे पड़े हुए चक्र से बचने के लिये दुर्वासाजी को शरण नहीं मिलती । अन्त में विष्णुलोक जाने पर व हरि के कहने पर धर्मप्राण राजा से क्षमा-याचना करते हैं तथा राजा के द्वारा भगवान विष्णु से विनय करने पर कि वे चक्र को वापिस अपने पास लौटा लें, महर्षि की रक्षा होती है । हरि के आज्ञाकारी व परम कर्त्तव्यपरायण होने के पश्चात् भी सुदर्शन चक्र को एक बार अभिमान हो जाता है व श्रीकृष्ण कैसे चक्र का दर्पभंग करते हैं, यह हनुमत्-कथाओं में पढ़ने को मिलता है ।

स्तुतिगायक अन्त में कहते हैं कि हरि की भक्ति का वह उद्दाम आवेग भक्त्योद्रेक: शिवजी की प्रसन्नता से चक्ररूप में परिणत हो जाता है अर्थात् वरद प्रभु चक्रदान करते हैं तथा वह चक्र तीनों लोकों की रक्षा के लिये सदैव जागृत रहता है । कहने का तात्पर्य यह है कि त्रिलोकी के संरक्षण के गुरुत्तम दायित्व के वहन में चक्र हरि के हाथ में सतत सक्रिय व सावधान रह कर अपनी सार्थकता सिद्ध करता है ।

शिवलीला-कथा के परिप्रेक्ष्य में यह कहना अप्रासंगिक न होगा कि सर्वेश्वर की लीलाओं में गुंथी हुईं यह चरित-कथाएं उस सरोवर के समान होती हैं, जहां से संस्कृति की सदानीरा बहती है । मूलधारा से जब हमारा जुड़ाव होता है तब पौराणिक कथाओं की अनेक बातें बोधगम्य हो जाती हैं, जो जड़ से कट कर व श्रद्धा से हट कर पढ़ने से अटपटी लगती हैं । अपनी संस्कृति के ज्ञान से उसके प्रति हमारी गौरव-भावना अंकुरित और कुसुमित होती है । यह अकारण नहीं कि अंग्रेजों ने हमारी सांस्कृतिक-चेतना व धार्मिक आस्था पर प्रहार कर हमें वैचारिक व मानसिक रूप से पंगु व अविश्वासु बनाया । फलत: अपनी जड़ों से कट कर आज हम अपनी अस्मिता (पहचान) को खो बैठे हैं और स्वयं अपने से ही अपरिचित हो गये हैं ।

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