शिवमहिम्नःस्तोत्रम्

श्लोक २५

Shloka 25 Analysis

मन: प्रत्यक्चित्ते सविधमवधायात्तमरुत:
प्रहृष्यद्रोमाण: प्रमदसलिलोत्संगितदृश: ।
यदालोक्याह्लादं ह्रद इव निमज्यामृतमये
दधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत् किल भवान् ॥ २५ ॥

मन: प्रत्यक्चित्ते सविधमवधायात्तमरुत:
मन: = मन
प्रत्यक् = भीतर की ओर, (अन्तर्मुख)
चित्ते = चित्त में
प्रत्यक्चित्ते = हृदयाकाश में, अन्तरात्मा में
सविधमवधायात्तमरुत: सविधम् + अवधाय + आत्त + मरुत:
सविधम् = शास्त्रविहित विधि से
अवधाय = (मन को) एकाग्र करके
आत्त = खींचा हुआ, लिया हुआ
मरुत: = वायु, प्राण
आत्तमरुत: = प्राणायाम करते हए
प्रहृष्यद्रोमाण: प्रमदसलिलोत्संगितदृश:
प्रहृष्यद्रोमाण: प्रहृष्यद् + रोमाण:
प्रहृष्यद् = पुलकित, हर्षातिरेक से रोमांचित
रोमाण: = रोमावलि से युक्त
प्रमदसलिलोत्संगितदृश: प्रमद + सलिल: + उत्संगित + दृश:
प्रमद = हर्ष (के)
सलिल: = पानी
प्रमदसलिल: = आनन्दाश्रु
उत्संगित = से युक्त
दृश: = नेत्र
यदालोक्याह्लादं ह्रद इव निमज्यामृतमये
यदालोक्याह्लादं यत् + आलोक्य + आह्लादम्
यत् = जिस (किसी भी तत्व को)
आलोक्य = देख कर, साक्षात्कार करके
आह्लादम् = आनन्द
ह्रदे = सरोवर में
इव = के समान
निमज्यामृतमये निमज्य + अमृतमये
निमज्य = गोता लगाये हुए-से
अमृतमये = अमृतमय (सरोवर) में
दधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत् किल भवान्
दधत्यन्तस्तत्त्वं दधति + अन्त: + तत्त्वम्
दधति = धारण करते हैं, प्राप्त करते हैं
अन्त: = (अपने) अन्तर में
तत्त्वम् = परमानन्द तत्व को
किमपि किम् + अपि
किम् = जिस किसी
अपि = भी
यमिनस्तत् यमिन: + तत्
यमिन: = योगीगण, यम-नियम से युक्त संन्यासी
तत् = वह (परमानन्द तत्व)
किल = निस्सन्देह
भवान् = आप (ही हैं)

अन्वय

यमिन: सविधम् आत्तमरुत: मन: प्रत्यक् चित्ते अवधाय यत् किम् अपि तत्त्वम् आलोक्य प्रहृष्यद् रोमाण: प्रमदसलिल उत्संगित दृश: अमृतमये ह्रदे निमज्य इव अन्त: आह्लादम् दधति तत् किल भवान् ।

भावार्थ

संन्यासीगण शास्त्रोक्त विधि से वायु को खींचकर अर्थात् प्राणायाम करते हुए अन्तराकाश में मन को एकाग्र करके, जिस किसी भी (अनिर्वचनीय) तत्व का साक्षात्कार करके रोमांचित एवं आनन्दाश्रुपूर्ण नेत्रों से युक्त हो जाते हैं (नेत्रों से हर्ष के आंसू झरते हैं) और अमृतमय सरोवर में मानो डुबकी लगाई हो, इस तरह अपने भीतर ही भीतर परमानन्द को (अन्त: आह्लाद को) धारण करते हैं, वह (परमतत्व) निस्सन्देह आप ही हैं ।

व्याख्या

शिवमहिम्न:स्तोत्रम् के २५वें श्लोक में स्तोत्रगायक गन्धर्वराज पुष्पदन्त यमनियम-परायण योगियों को, भक्तों को ध्यान से प्राप्त होने वाले परम आनन्द का परिचय देते हैं, साथ ही साथ आनन्दाश्रु से प्रपूरित नेत्रों की ओर ध्यान खींच कर करके भक्तिभाव की उत्कटता को भी रेखांकित करते हैं । उनका कथन है कि योगीगण भावोत्कर्ष की उच्चतम अवस्था में परम आनन्द को इस प्रकार धारण करते हैं, जैसे अमृतमय सरोवर में उन्होंने गोता लगा लिया हो । यही परमानन्द, यही निरतिशय सुख निश्चित रूप से हे महादेव ! आप ही हैं । आप ही सच्चिदानन्द तत्व हैं जिसका दर्शन यमिन: अपने अन्त:करण में करते हैं ।

स्तोत्र का पहला पाद अथवा पहली पंक्ति है मन: प्रत्यक्चित्ते सविधमवधायात्तमरुत: । स्तोत्र के अन्तिम पाद में यमिन: शब्द आता है, जो कि कर्तृत्वबोधक है । यमिन: यमी का बहुवचन है । यमी से अभिप्रेत है वह, जो संयमी या संयम-नियमप्रवण हो अर्थात् संन्यासी, योगी । यम शब्द संयम व नियम दोनों में है । अतएव यमी से योगी एवं संन्यासी अर्थ विवक्षित होता है ।
महर्षि पतंजलि के योगदर्शन में, समाधिपाद के अन्तर्गत योग के आठ अंगों में से दो अंग यम व नियम बताये गये हैं । योग के आठ अंग इस प्रकार उन्होंने बताये हैं —

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावंगानि ॥

पातंजलयोगप्रदीप ग्रन्थ में लिखा है कि “ यम-नियम के बिना कोई अभ्यासी योग का अधिकारी नहीं हो सकता ।” योगी,संन्यासी इनका दृढ़ता से पालन करते हैं । भगवान पतंजलि के अनुसार यम पाँच हैं—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह । उनके शब्दों में—

अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा: ॥

यम की ही भाँति नियम भी योग के आठ अंगों में से एक अंग है । नियम नामक इस अंग के अन्तर्गत आते हैं वे विहित कर्त्तव्य, जो यम की भाँति अनिवार्य तो नहीं होते, परन्तु पालनकर्ता के चित्त को निर्मल करते हैं । मन के स्वच्छ होने से एकाग्रता बढ़ती है और इन्द्रियां बहिर्मुख से अन्तर्मुख हो जाती हैं । नियमों का उद्देश्य है मन के संकेन्द्रीयकरण का समुचित अभ्यास करना । पातंजलयोगप्रदीप ग्रन्थ के अनुसार नियमों का संबंध केवल व्यक्तिगत शरीर, इन्द्रियों तथा अन्त:करण के साथ होता है, इसलिये इनके यथार्थ पालन से व्यक्ति का जीवन राजसी, तामसी, विक्षेप और आवरणरूप मलों से धुलकर सात्त्विक, पवित्र और दिव्य बन जाता है । महर्षि पतंजलि ने पाँच नियम बताये हैं — शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वरप्रणिधान । इस प्रकार के यम-नियमनिष्ठ सन्यासियों के लिये यहां  यमिन: शब्द प्रयुक्त हुआ है ।

संन्यासी अथवा यमी सर्वकर्फमलत्यागी होते हैं, क्योंकि किसी भी प्रकार का फल इनकी दृष्टि में हेय होता है । इनका श्रेय है भगवद्साक्षात्कार अथवा परमपद । पहली पंक्ति में इन्हीं योगियों के साधन-मार्ग पर प्रकाश-प्रक्षेपण किया गया है । साधना का मार्ग विघ्न-संकुल होता है तथा पग पग पर स्खलन की संभावनाएं दृढ़तर होती हैं । विषय-विदूषित मन प्रत्यक् चित्त नहीं हो सकता है । मन: प्रत्यक्चित्ते में प्रत्यक् शब्द से अन्तर यानि भीतर का बोध होता है ।और चित्त से अन्तराकाश या हृदयाकाश की अभिव्यंजना होती है । चित्ते शब्द व्याकरण की दृष्टि से सप्तमी विभक्ति का एकवचन है, जो कि स्थलसूचक है तथा चित्त में का भाव देता है । क्योंकि प्रश्न यह उठता है कि बहिर्विषयों से हटकर, अन्तर्मुख होकर मन कहाँ स्थित हो ? तो उसका उत्तर है कि अन्तराकाश अथवा अन्तरात्मा में स्थिर हो ! यह अन्तरात्मा ही आश्रयस्थली है । इसके आगे कवि संन्यासी को सविधमवधायात्तमरुत: कहते हैं । सविधम् आत्तमरुत: का अर्थ है विधिसहित, प्रकारसहित प्राणायाम करने वाले । प्राणायाम में आसन मुख्य विधि है । अतएव सविधि प्राणायाम करने से तात्पर्य है आसनसहित प्राणायाम करना । यह बात योगशास्त्र में कही गई है कि योगी योगयोग्य आसन पर गुरु द्वारा उपदिष्ट प्रकार से प्राणायाम करे । शास्त्र  कहते हैं कि पर्वत से निकले धातुओं का मल जैसे अग्नि से जल जाता है, वैसे प्राणायाम से आन्तरिक पाप जल जाते हैं ।

यथा पर्वतधातूनां दोषान् हरति पावक: ।  एवंमन्तरगतं पापं प्राणायामेन दह्यते  ॥  —अत्रिस्मृति—

 गीता में आसनमात्मानम् कहा गया है अर्थात् आसन अपना हो । दूसरे के आसन पर बैठ कर योग न करे । आसन पवित्र स्थान पर हो, शुद्ध हो । योगी शीश व ग्रीवा सम रखे व सुखपूर्वक बैठे । गुरु अथवा शास्त्रों द्वारा बतायी गई विधि शास्त्रोक्त या शास्त्रविहित विधि कहलाती है । कवि के अनुसार यमनियमयुक्त यमी शास्त्रविहित विधि के साथ आत्तमरुत: होकर अर्थात् आसनादि विधि के साथ प्राणायाम करते हुए मन को प्रत्याहृत करके (नियंत्रित करके) हृदयाकाश में ध्यान करने वाला होता है । अवधाय से ध्यान करने का अर्थ लक्षित होता है । इसका मूल शब्द अवधानम् है, जिसका अर्थ है ध्यान, एकाग्रता, सावधानी ।

इस प्रकार श्लोक के प्रथम पाद अथवा पहली पंक्ति में परमतत्व के साक्षात्कार में संलग्न संन्यासी अथवा योगी का वर्णन मिलता है । इसमें ययमनियमप्रवण योगी सविधि प्राणायाम करते हुए मन को अन्तरात्मा में स्थिर करता हुआ, अन्तर्मुख होकर चित्त की एकाग्रता का संपादन करता है । यह पंक्ति योगदर्शन के यम-नियम, प्राणायाम, ध्यान आदि पर प्रकाश-प्रक्षेपण करती है ।

प्रस्तुत श्लोक के द्वितीय पाद अथवा दूसरी पंक्ति में भक्तिभावना परिलक्षित होती है । यहां भक्तिभाव के उत्कर्ष के फलस्वरूप योगी की भावोत्कटता के दर्शन होते हैं । नियमनिष्ठ योगी अपनी अन्तरात्मा में मन को एकाग्र करता हुआ अपूर्व तन्मयता में खो जाता है । अपने परमाराध्य (परम आराध्य) के मनोहर पावन रूप के दर्शन वह अपने हृदयाकाश में करता है । भगवद्दर्शन चर्म-चक्षुओं से कदापि संभव नहीं हैं । उनकी प्रवृत्ति बाहर की ओर है । उसके लिये मन की आंखें चाहिएं । अतिशय विरक्त, वासनाविमुख व एकाग्रचित्त हुए योगी में मलिनता का लेश भी नहीं रहता है । चित्त में शुद्धि का अद्भुत संचार होता है । ऐसे जीव को भगवान शिव कृपा करके स्वयं शोधित करते हैं । वे स्वयंप्रकाश हैं । योगी सर्वकर्मफलत्यागी होता है । फलाकांक्षा छोड़ते हुंए शुद्ध भाव से वह कर्त्तव्य कर्मों का संपादन करता है तथा जब वह शिवप्रीति का अधिकारी बन जाता है तब करुणावरुणालय प्रभु उसके सब बन्धन तोड़ देते हैं । शिव और जीव के बीच का ब्रह्मावरण (ब्रह्म आवरण) हट जाता है, जिससे योगी अपने अन्तर में परमात्मा का साक्षात्कार करके धन्य हो उठता है । अनिर्वचनीय आनन्द से प्रपूरित इस हर्षातिरेक व रोमांचक अवस्था को कवि ने प्रहृष्यद्रोमाण: (प्रहृष्यद् रोमाण:) कह कर अभिव्यंजित किया है । प्रहृष्य से हर्ष की अतिशयता विवक्षित होती है व रोमाण: से रोमोद्गम की स्थिति । योगी का रोम-रोम उत्थित होकर पुलक प्रकट करता है । आनन्ददातिरेक और अपूर्व अहोभाव से भरा हुआ वह उत्कट प्रेम की इस उन्नत अवस्था में रोमांचित हो उठता है उसके नेत्र वाष्प-गद्गद हो जाते हैं । इसी भाव को व्यक्त किया गया है प्रमदसलिलोत्संगितदृश: कह कर। प्रमद का अर्थ है आनन्द, हर्ष । सलिल जल को कहते हैं । प्रमदसलिल का अर्थ है आनन्द के अश्रु । दृश:  से अभिप्रेत है नेत्रों वाला । कवि का कथन है कि वह आनन्दाश्रु से युक्त नेत्रों वाला हो जाता है । भाव यह है कि योगी के नेत्र प्रेमाश्रु-पूरित हो उठते हैं । उसने ऐसे तत्व को पा लिया है, जिसे वाणी व्यक्त नहीं कर सकती ।

प्रस्तुत श्लोक का तृतीय पाद अथवा तीसरी पंक्ति ज्ञानपरक है । यहां ज्ञान की बात कही गई है । भगवान शिव स्वयं ज्ञानस्वरूप हैं । कवि ने पहले बताया कि प्रेम के उत्कर्ष की अवस्था में आनन्द के अतिरेक से आप्लावित और रोमांचित हो जाता है योगी और भावाश्रुओं से भर उठते हैं उसके नेत्र । इस निरूपण को आगे बढ़ाते हुए वे कहते हैं यदावलोक्याह्लादम् (यत् आलोक्य आह्लादम्) किसी तत्व का अवलोकन अथवा दर्शन करके योगी को इतना अन्त: आह्लादम् अर्थात् आन्तरिक हर्ष या आनन्द मिलता है मानो अमृतमय सरोवर में उसने गोता लगा लिया हो ह्रद इव निमज्यामृतमये (ह्रद इव निमज्जय अमृतमये)। उसका यह आह्लाद अथवा आनन्द वाणी से व्यक्त नहीं किया जा सकता । तो प्रश्न यह उठता है कि वह तत्व वस्तुत: है क्या और क्या है उसका रहस्य ? अब चौथी व अंतिम पंक्ति में इसका उत्तर मिलता है ।

श्लोक के चतुर्थ पाद अथवा चौथी पंक्ति में शिवदर्शन व शिवकृपा को रेखांकित किया गया है । स्तोत्र के गायक गन्धर्वराज कहते हैं कि योगी किमपि (किम् अपि) अर्थात्  जिस किसी भी तत्व का साक्षात्कार करके अपने अन्तर में अनिर्वचनीय आनन्द को प्राप्त करता है, वह परम तत्व हे प्रभो ! निस्संदेह आप ही हैं तत् किल भवान् । शिव ही परमपद, परम तत्व, परमानन्द हैं । शिव की कृपा का अवतरण होने पर जीव व ब्रह्म के बीच का आवरण भंग हो जाता है तथा स्वयंप्रकाश परम तत्व भासित हो उठता है । शिवदर्शन रूपी अमृतमय सरोवर में गोता लगा कर योगी स्वयं भी शिवमय हो जाता है । दूसरे शब्दों में शिवानन्द से वह सांगोपांग भीग जाता है । भगवान शिव न केवल कृपा-सिन्धु हैं अपितु असीम और अनंत आनन्द के वे अजस्त्र स्रोत भी हैं । अन्तरात्मा में उनके दर्शन से योगी निरतिशय सुख को प्राप्त होता है । इसीको कहा है कि योगी अन्त:आह्लाद को धारण करता है । ध्यातव्य (ध्यान देने योग्य बात) है कि उसे प्राप्त यह परम आनन्द बाह्य सुखों से सर्वथा व सर्वधा विलक्षण है । यह ब्रह्मानन्द है, जीवन्मुक्ति है । ब्रह्म में लीन होने का आत्यंतिक सुख है ब्रह्मानन्द । जीवन का यही श्रेय है, जिसे पाने के बाद कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता । पूर्णतया तन्मय व प्रेममय योगी इस साक्षात्कार अथवा दर्शन से अवाक् रह जाता है । वाणी से अगोचर जिस किसी अन्त:आह्लाद को वह धारण करता है, हे प्रभो ! वह सच्चिदानन्द तत्व वस्तुत: आप ही हैं । इस अन्त:आह्लादम् को वाक् (वाणी) अथवा अन्य किसी भी इन्द्रिय द्वारा कदापि व्यक्त नहीं किया जा सकता है । अन्तर के उल्लास से सर्वथा अनभिज्ञ इन्द्रियां वास्तव में बहिर्मुखी होती हैं । तत् किल भवान् में तत् का अर्थ है वह और इससे अभिप्रेत है वह परमानन्द तत्व, किल निश्चयात्मकता का सूचक है, जिसका अर्थ है सचमुच ही, निश्चित ही । भवान् का अर्थ है आप । तीनों का मिला कर अर्थ है निश्चित ही वह परम आनन्द , वह परम पद, निरतिशय सुख आप ही हैं ।

भगवान शिव सदानन्द के विशाल निर्झर हैं । उनकी अहैतुकी कृपा से परम आनन्द का अखण्ड स्रोत फूटता है ।

श्लोक २४ अनुक्रमणिका श्लोक २६

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2 comments

  1. S Singh says:

    Respected Madam, Namaste I am very very greatful and obliged by your help to read Shiva Mahimna Strotam.

    Today I am no able to get the shlok from number 26 to 43. Madam please help me I can see only till sholok number 25

    Humble request to you.

    Regards,
    S Singh

    • Kiran Bhatia says:

      Shree S. Singhji, namaste. Shortly we are going to publish shlok number 26 and 27. You could not see because we have published upto shlok number 26 only. Thank you so much.

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