शिवमहिम्नःस्तोत्रम्

दो शब्द

An Overview

vyaa2856066_1642655702_n

शिवमहिम्नःस्तोत्रम् गंधर्वराज पुष्पदंत द्वारा रचित स्तोत्र है, जिसमें भगवान शिव की अपार, अनिर्वचनीय महिमा का गान किया गया है । इस स्तोत्र की रचना के साथ एक सुन्दर कथा अनुस्यूत है । काशी में चित्ररथ नामक एक राजा हुए, जो परम नैष्ठिक शिवभक्त थे । वे प्रतिदिन शिवपूजन करते हुए अपने राजोद्यान से लाये हुए सुन्दर पुष्प भगवान इन्दुमौलि को अर्पित करते थे । एक बार गंधर्वराज पुष्पदंत, जो आकाशमार्ग से उस ओर विचरण कर रहे थे, की दृष्टि रंग-बिरंगी फूलों से शोभायमान राजोद्यान पर पड़ी तथा वे उद्यान की अपूर्व सौंदर्य-सुषमा देख कर मुग्ध रह गए । गन्धर्व योनि मनुष्येतर एक दिव्य योनि है । गन्धर्व स्वर्गलोक के दिव्य गायक एवं संगीतकार होते हैं, जो देवराज इंद्र की सभा में गायन-वादन करते हैं । इनके पास देवों की ही भांति अनेक दिव्य शक्तियां होती हैं । पुष्पदंत सबसे अदृश्य रहते हुए, रात्रि के समय उद्यान से पुष्प ले जाया करते थे और इस तरह पुष्पों की कमी होने लगी । राजा को पूजनार्थ पर्याप्त पुष्प लब्ध न होते थे । इस प्रकार लुप्त हो जाने का रहस्य किसी की समझ में न आया । कोई चोरी करता हुआ न देखा गया, न पाया गया । तब उनके चतुर व नीतिकुशल मंत्री ने उन्हें चोर को रंगे हाथों पकड़ लेने की युक्ति सुझाई और अन्ततः राजोद्यान में चारों ओर पवित्र शिव-निर्माल्य को बिखेर दिया गया ।

शिवनिर्माल्य का अर्थ है शिवपूजन करते समय शिवलिंग पर चढ़ाए गए बिल्वपत्र एवं पुष्पादि, जो अत्यंत पवित्र होते हैं तथा अगले दिन वहां से उठा दिए जाते हैं । इनका अनादर करने वाला पाप का भागी बनता है । उद्यान-पथ पर शिवनिर्माल्य बिखरे होने की बात से अनभिज्ञ, गंधर्वराज का पैर अदृश्य रह कर वहां आते हुए गलती से पवित्र शिव-निर्माल्य पर पड़ गया और अनजाने में ही सही, किन्तु यह पाप उनसे हो गया, फलतः भगवान शिव के वे रोष -भाजन बने । परिणामस्वरूप पुष्पदंत अपने महिमामय गन्धर्व-पद व गौरव से भ्रष्ट हुए और तत्काल उनकी अदृश्य रहने की दिव्य शक्ति भी जाती रही, जिससे अब वे सभी को दृष्टिगोचर हो गए । उस समय अपने अपराध का बोध होने पर संताप व पश्चाताप से अभिभूत हुए गंधर्वराज ने बड़े ही आर्त्त स्वर में भगवान शिव की अपार महिमा का गुणानुवाद गाते हुए उनका स्तवन किया । किंकरवश्य (अपने किंकर के वश में रहने वाले) भगवान शंकर भक्त की पुकार सुन कर द्रवित हो गए तथा उन्होंने गंधर्वराज को क्षमादान दिया व अपनी समस्त दिव्य शक्तियों सहित पुष्पदंत को पुनः गन्धर्व-पद की प्राप्ति हुई । गंधर्वराज पुष्पदंत द्वारा विरचित यही स्तोत्र शिवमहिम्नःस्तोत्र है । महिम्न: वस्तुतः महिमन् शब्द की षष्ठी विभक्ति का एकवचन का रूप है । अकारणकरुणावरुणालय भगवान शिव के चरणकमलों में अपनी प्रणति निवेदन करते हुए स्तुतिकार ने इस दिव्य स्तोत्र को शिवमहिम्न:स्तोत्रम्  के नाम से अभिहित किया है । शिवमहिम्न:स्तोत्रम् का शाब्दिक अर्थ है ‘भगवान शिव की महिमा का स्तोत्र’ और इसका गहन अर्थ है स्तुतिगायक की दृष्टि में उसके परमाराध्य की अपरम्पार महिमा का स्तवन-गान,  जिस अनिर्वचनीय दिव्यता का कोई ओर-छोर न पा कर वह इस लम्बी व दिव्य स्तुति को गाते हुए अन्त में कह उठता है कि आपके तत्व को मैं नहीं जान पाया महेश्वर ! आप जैसे हो और जिस रूप में हो, आपको नमन है । “तव तत्त्वं न जानामि किदृशोsसि महेश्वर । यादृशोsसि महादेव तादृशाय नमों नम: ।।”

शिवमहिम्नःस्तोत्रम् की अपनी महिमा भी अपार है । इसका पाठ अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है । इस स्तोत्र के विषय में यह बात प्रसिद्ध है कि श्री रामकृष्ण परमहंस ने इस इस स्तोत्र के कुछ श्लोकों का पाठ किया था और तुरंत ही वे समाधि में चले गए । भगवान महेश्वर को प्रसन्न करने वाले इस स्तोत्र की महिमा अवर्णनीय है । स्तोत्र में ४३ श्लोक हैं, जिनका अपनी अल्प मति से व्याख्या करने का मेरा यह बालोचित प्रयास है । सुधी पाठकों को इससे कुछ आनंद-लाभ हो, ऐसी मेरी आकांक्षा है ।

इति श्रीशिवार्पणमस्तु ।

मूल पाठ एवं अन्वय अनुक्रमणिका पहला श्लोक

Separator-fancy

8 comments

  1. चन्दन ऋषिवंशी says:

    बहुत ही सुंदर और लाभकारी कार्य कर रही हैं आप आदरणीया! आपके श्रम और ज्ञान को मेरा प्रणाम 🙏

    • Kiran Bhatia says:

      धन्यवाद । कृपा भगवान चन्द्रमौलि की है, जो मेरे सदृश अल्पज्ञ अथवा अज्ञ जन को भी यह गौरव अपने नाम करने का प्रसाद दे रहे हैं । इति शुभम् ।

  2. S k Nath says:

    शत कोटि प्रणाम। दीर्घ समय से शब्दों की व्याख्या को ज्ञात करने के लिए आतुर था। मेरे सबके परम दयालु भगवान् भोलेनाथ ने यह इच्छा आपके द्वारा पूर्ण की । नमन पूर्वक धन्यवाद ।

    • Kiran Bhatia says:

      आपको साभार नमस्कार । मुझ वचन-दरिद्र को कृपया इतना मान न दें । भगवान बम भोलेनाथ के कृपा-कण से सिंचित है यह प्रयास …इसमें मेरा कुछ श्रेय नहीं । इति शुभम् ।

      • S k Nath says:

        श्रृध्देय डा. किरण जी , पुनः शत शत नमन । आशा ही नहीं वरण विश्वास है कि अब तक श्लोक १६ से आगे वाले श्लोकों की व्याख्या हो गई होगी। मैं अधीर हृदय से इसकी प्रतीक्षा कर रहा हूं। कृपया इस हर्षमय पल की सूचना यथाशीघ्र दें ।कष्ट एवं धृष्टता के लिए क्षमा प्रार्थी हूं।

        • Kiran Bhatia says:

          आदरणीय एस.के.नाथजी,नमस्कार । यथाशीघ्र श्लोक एक-एक करके प्रकाशित कर दिये जायेंगे साथ ही सूचना भी मिल जायेगी । अभी १०-१२ दिन का समय लग जायेगा । पाठ-परायण पाठकों की जिज्ञासा न तो धृष्टता है और न हमारे लिये कष्ट ही । अपरिहार्य कारणों से प्रकाशन में विलम्ब को कृपया अन्यथा न लें । आगे की व्यवस्था क्षिप्र हो, इस पर पर हमारा ध्यान है । धन्यवाद । इति शुभम् ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *