शिवमहिम्नःस्तोत्रम्

काशीराज के उद्यान से सुंदर-सुगन्धित पुष्प प्रतिदिन चुरा कर ले जाने वाले गन्धर्वराज, शिव-निर्माल्य पर पैर पड़ जाने से, शिवकोप के भागी बन कर गन्धर्व-पद से भ्रष्ट हो जाते हैं व अपनी भूल का ज्ञान होने पर बड़े आर्त्त भाव से भगवान शिव का स्तवन -गायन करते हैं, जिसके फलस्वरूप वे क्षमा के साथ-साथ अपना पद-गौरव भी पुन:प्राप्त करते हैं । ४३ श्लोकों से सजी, गन्धर्वराज पुष्पदंत द्वारा रचित यही स्तुति वस्तुत: ‘शिवमहिम्न:स्तोत्रम्’ हैं ।

क. मूल पाठ एवं अन्वय
ख. दो शब्द
श्लोक १ महिम्नः पारन्ते परमविदुषो यद्यसदृशी …
श्लोक २ अतीतः पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयो …
श्लोक ३ मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवतस्तव …
श्लोक ४ तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत् …