श्रीहनुमानचालीसा

चौपाई ३५

Chaupai 35 Analysis

और देवता चित्त न धरई ।
हनुमत सेई सर्ब सुख करई ॥ ३५ ॥

और देवता चित्त न धरई
और देवता = कोई अन्य देवता
चित्त न धरई = मन में न रखो
हनुमत सेई सर्ब सुख करई
हनुमत सेई = हनुमानजी की सेवा-पूजा करके
सर्ब = सब
सुख करई = सुखों को पा लो ।

भावार्थ

किसी और देवता को मन में न रखें । हनुमानजी की सेवा अर्थात् उपासना करके सब सुख पायें ।

व्याख्या

बजरंग बली रामजी के एकनिष्ठ सेवक भक्त हैं । उनकी कृपा से जीव को रामजी की अविचल भक्ति मिलती है, जिससे उसका परम कल्याण होता है । अन्य देवता प्रसन्न होने पर भोग-ऐश्वर्य, पुत्र-पौत्रादि सुख तथा स्वस्थ और दीर्घ (लम्बे) जीवन का वरदान दे सकते हैं, किन्तु श्रीरामचंद्र के चरणों की भक्ति देना उनके भी वश की बात नहीं है । यह सौभाग्य तो जीव को केवल हनुमान ही प्रदान कर सकते हैं । अत: तुलसीदासजी धर्मशील जनों से कहते हैं कि वे किसी और देवता को अपने मन में न रखें, न बसायें । केवल हनुमान की पूजा, उपासना करें और सब सुख पा लें । यहां एक शंका खड़ी हो सकती है कि क्या अन्य देवों के प्रति गोस्वामीजी के मन में आदरभाव न था । इसका उत्तर यह है कि भारतीय संस्कृति व परंपरा के महान् उपासक तुलसीदासजी सब देवों के प्रति आदरभाव रखते थे । रामचरितमानस  के मंगलाचरण में वे देवी सरस्वती तथा मंगलमूर्ति गणपति की वंदना करते हैं । शिवजी व माता पार्वती के साथ साथ महर्षि वाल्मीकि की वंदना भी यहां करते हैं । अत: ऊपर कही गई शंका सही नहीं है । देवताओं पूजा-वंदना करना मनुष्य का कर्तव्य है । वे इस चौपाई में चित्त न धरई लिख कर केवल हनुमानजी को ही चित्त में बैठाने की बात करते हैं, क्योंकि उनको समर्पित की हुई भक्ति वे आगे श्रीराम को समर्पित कर देते हैं, स्वयं अपने पास कब रखते हैं वे वानरवीर । उनकी पूजा भगवान श्रीराम के चरणों में भक्त को ले जाती है, सरलता और सहजता के साथ । रघुनाथजी के चरण ही जीव के परम कल्याण का साधन हैं । इस प्रकार हनुमानजी के सेई सर्व सुख करई बात सार्थक होती है । उनके सेवन अर्थात् पूजन से लोक और परलोक दोनों सुधरते हैं ।

चौपाई ३४ अनुक्रमणिका चौपाइ ३६

Separator-fancy

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *