शिवमहिम्नःस्तोत्रम्

श्लोक २२

Shloka 22 Analysis

प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं
गतं रोहिद्भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा ।
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुम्
त्रसन्तं तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभस: ।। २२ ।।

प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं
प्रजानाथं = ब्रह्मा को
नाथ = हे स्वामि ! प्रभो !
प्रसभमभिकं प्रसभम् + अभिकम्
प्रसभम् = बलपूर्वक
अभिकम् = अतीव कामुकता से युक्त
स्वाम् = अपनी
दुहितरम् = पुत्री को
गतं रोहिद्भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा
गतम् = गये हुए
रोहिद्भूतां रोहित् + भूताम्
रोहित् = हरिणी
भूतामं = बनी हुई
रिरमयिषुमृष्यस्य रिरमयिषुम् + ऋष्यस्य
रिरमयिषुम् = रमण की इच्छा से (भोगने के लिये)
ऋष्यस्य = हिरन के
वपुषा = शरीर से
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुम्
धनुष्पाणेर्यातं धनुष्पाणे: + यातम्
धनुष्पाणे: = हाथ में स्थित धनुष से छूटा हुआ
यातम् = चले जाने पर
दिवमपि दिवम् + अपि
दिवम् = आकाश में
अपि = भी, (तथापि)
सपत्राकृतममुम् सपत्राकृतम् + अमुम्
सपत्राकृतम् = पुंखयुक्त बाण के शरीर में घुस जाने से अत्यंत पीड़ित
अमुम् = उनको (ब्रह्मा को)
त्रसन्तं तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभस:
त्रसन्तम् = भयभीत, त्रस्त (ब्रह्मा को)
तेऽद्यापि ते + अद्य + अपि
ते = आपका
अद्य = आज
अपि = भी
त्यजति = छोड़ता
= नहीं (है)
मृगव्याधरभस: = शिकारी के समान उत्साही बाण

अन्वय

(हे) नाथ स्वां दुहितरं रोहिद्भूतां ऋष्यस्य वपुषा प्रसभम् रिरमयिषुम् गतम् अभिकम् प्रजानाथम् दिवम् यातम् अपि ते धनुष्पाणे: मृगव्याधरभस: सपत्राकृतम् त्रसन्तम् अमुम् अद्य अपि न त्यजति ।

भावार्थ

हे प्रभो ! अपनी पुत्री के (लज्जा से) हरिणी बन जाने पर, हरिण का शरीर धारण कर उसके साथ बलपूर्वक रमण करने की इच्छा से गये हुए कामातुर प्रजेश्वर को, द्युलोक में चले जाने पर भी, आपके हाथ में स्थित धनुष से छूटा हुआ, शिकारी के समान (मारने के लिये) उत्साही बाण, तीक्ष्ण तीर की तीव्र पीड़ा से संतप्त एवं भय-त्रस्त उनको (ब्रह्मा को) आज भी छोड़ता नहीं है ।

व्याख्या

शिवमहिम्न:स्तोत्रम् के २२वें श्लोक में भी पिछले कतिपय श्लोकों की भाँति एक पौराणिक कथा गुँथी हुई है । इस कथा का संबंध पुराणों की अधिज्योतिष कथाओं से है, जिसमें स्तुतिकार दो नक्षत्रों की स्थितियों का दिग्दर्शन करते है । यही आकाशीय परिदृश्य कथा में रूपायित हो कर व्यक्त हुआ है इस श्लोक में । यहाँ संदेश स्पष्ट है कि अकरणीय कर्म के करने पर कुफल की प्राप्ति अपरिहार्य है । काम में निविष्टचित्त प्राणी भगवान कामारि के कोप का भाजन बनता है, चाहे वह कोई भी हो । सृष्टि के आरम्भ से ही यह होता आया है कि प्रलयंकर प्रभु के निकट कोई भी अपराधी अदण्ड्य नहीं होता और आज भी रुद्र का उग्र कोप दुष्कृत करने वाले को छोड़ता नहीं है । पुराण, उपनिषद इस तथ्य का प्रतिपादन करते हैं तथा अपने प्रतिपाद्य विषय का वर्णन वे बहुधा कथासूत्र में पिरो कर, रूपक में ढाल कर करते हैं । रूपक अलंकार से सज्जित प्रस्तुत श्लोक मे न केवल दो तारक-समूहों की स्थिति का उल्लेख ही मिलता है, अपितु उनकी स्थिति से संयत व सदाचारपरायण जीवन जीने का और ऐसा न कर पाने की स्थिति में पापाचार के फलस्वरूप अनंगमोचन भाललोचन भगवान के कोपभाजन बनने का व अपने विनाश का कारण स्वयं बनने का सन्देश भी मिलता है ।

सबसे पहले प्रस्तुत श्लोक में दी गई घटना पर दृष्टिपात करना युक्तियुक्त होगा । यहां प्रसंग है प्रजेश्वर (ब्रह्मा) के अपनी दुहिता पर अभिकम् अर्थात् कामार्त्त होने पर उस पुत्री का (उनसे अपनी रक्षा के लिये) मृगी का रूप ले लेना —रोहिद्भूताम् तथा उससे प्रसभम् अर्थात् बलपूर्वक उसके साथ रमण करने के मदन-मनोरथ से युक्त हुए ब्रह्मा का मृगरूप धारण कर लेना तथा अपनी पुत्री के पीछे उनका जाना । रमयिषुमृष्यस्य वपुषा (रमयिषुम् + ऋष्यस्य = रमयिषुमृष्यस्य) में रमयिषुम् का अर्थ है रमण करने की इच्छा से । ऋष्यस्य शब्द में ऋष्य का अर्थ मृग अथवा हिरन होता है तथा ऋष्यस्य रूप इसका बना षष्ठी विभक्ति के एकवचन के कारण । वपुषा यानि वपु (शरीर) से । प्रजानाथ शब्द प्रजेश्वर (ब्रह्मा) के लिये प्रयुक्त हुआ है । इससे जो घटना प्रकाश में आती है, वह यह है कि प्रजाओं के स्वामी अथवा प्रजाओं के उत्पत्तिकर्त्ता ब्रह्माजी (सृष्टि करने के उपरान्त) जब अपनी ही पुत्री पर मुग्ध हो गये, तो लज्जावश वह हरिणी बन कर वहाँ से दूर दौड़ पड़ी । अब उसे भोगने की आकांक्षा बलवती होने पर लोककर्ता ने तदनुरूप हरिण का वपु धारण कर लिया बलपूर्वक उसे भोगने के लिये और वे उसके पीछे हो लिये । वे कामार्त्त हुए । मनोजन्माविकार ने उनका चित्त चंचल कर दिया । यह वर्णन दिया है पहली दो पंक्तियों में ।

सृष्टिकर्ता सीमातिक्रमण कर गये थे । स्वपुत्री के लिये उनकी प्रमत्तता भगवान कामारि के कोप का कारण बनी । क्रोधाविष्ट कपर्दी कार्मुक (धनुष) हाथ में थामे कामुक ब्रह्मा को दण्डित करने वहां पर प्रकट हुए और अपना अमोघ बाण ब्रह्मा पर चला दिया । तदुपरान्त जो हुआ, उसकी वार्ता आगे बतायी है । श्लोक की अन्तिम दो पंक्तियों में स्तुतिकार कहते हैं कि हे नाथ ! हाथ में धनुष धारण किये हुए आपके हाथ से छूटा हुआ मृगव्याधरभस: अर्थात् शिकारी के समान क्रूर उत्साह से भरा हुआ बाण, ब्रह्मा के शरीर में पुंखसहित ( पुंख का अर्थ है बाण का पंख वाला भाग) घुस गया तथा तीक्ष्ण बाण की असह्य पीड़ा से वे वेदना-व्याकुल हो गये । उनके द्युलोक में चले जाने पर भी भयकम्पित ब्रह्मा को आपका वह बाण आज तक भी छोड़ता नहीं है । इसे तनिक विस्तार के साथ इस तरह समझा जा सकता है कि शिव-बाण बहेलिये अथवा व्याध (शिकारी) की तरह ब्रह्मा का जीवनान्त करने पर उद्यत था । उसमें अभिघात करने की भीषण उत्सुकता थी, जिसे कवि ने मृगव्याधरभस: कह कर व्यक्त किया । मृगव्याध का अर्थ अहेरी (शिकारी अथवा बहेलिया) है और रभस: शब्द से बोध होता है उत्साहित या उद्यत होने का । मृगव्याधरभस: अर्थात् जो शिकारी अथवा अहेरी की तरह मारने पर उद्यत व उत्सुक है, हिंसक है , वह । यहाँ क्रुद्ध शिवजी को अहेरी (शिकारी) की उपमा दी गई है, जो धनुष धारण किये हुए हैं । एक और शब्द यहाँ उल्लेखनीय है, वह है सपत्राकृतममुम् (सपत्राकृतम् + अमुम्) । इसमें सपत्राकृतम् का अर्थ है शरीर में पुंख सहित बाण के घुस जाने से उत्पन्न घोर पीड़ा से युक्त कर दिया गया तथा अमुम् का अर्थ है उसे या उन्हें और त्रसन्तम् यानि भय-त्रस्त अथवा भय-कम्पित । तात्पर्य यह कि आकाश में चले जाने पर भी शिकारी के समान धनुर्धारी शिव के हाथ से छूटा हुआ अचूक बाण, अपने तीक्ष्णता-जन्य तीव्र आघात से पीड़ित और भयभीत उन ब्रह्माजी को आज तक भी छोड़ता नहीं है — अद्यापि त्यजति न । आज भी नहीं छोड़ता है यह कहने से कवि का भाव यह है कि आज भी स्थिति वही की वही है, आज भी वह पैना बाण प्रजेश्वर के पीछे है और उन्हें छोड़ता नहीं है । लक्षाधिक वर्षों से पहले की यह घटना आज भी नभ में घटित हो रही है ।

२२ वें श्लोक में लब्ध वर्णन आकाश-मण्डल के देदीप्यमान पिण्डों से संबंध रखता हुआ विद्वानों द्वारा माना गया है । पौराणिक ग्रन्थों में अनेक प्रकार की लीला-कथाएं लब्ध होती हैं । इनमें आत्मा, परमात्मा तथा देवताओं से संबंधित आख्यानों के अतिरिक्त ज्योतिष से संबंधित कथाएँ भी महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं । यह बात और है कि इन कथाओं को हृदयंगम करना कुछ कठिन है । क्योंकि ज्योतिष-शास्त्र का न्यूनाधिक ज्ञान इसके लिये अपेक्षित है । (ज्ञातव्य है कि प्रजापति दक्ष की कथा भी इसी तरह की एक कथा है, जिसमें उनकी सत्ताइस पुत्रियों का विवाह चंद्रमा से होता है व दक्षशाप वश चंद्रदेव रोगी होते हैं और बाद में रोगमुक्त भी ।) प्रस्तुत श्लोक के विषय में यह बात ख्यात है कि ख-मण्डल (आकाश-मण्डल) के दो नक्षत्रों —मृगशिरा और आर्द्रा की स्थितियों पर यह रूपक प्रकाश डालता है । चन्द्रपथ में आने वाले तारापुंज नक्षत्र कहलाते हैं, जिनकी संख्या सत्ताइस है । नभ-मण्डल में मृगशिरा पाँचवाँ तथा आर्द्रा छठा नक्षत्र है । अतएव आर्द्रा मृगशिरा नक्षत्र के पीछे चलता है व विश्व की रचना-काल से आज तक नक्षत्रों की स्थिति का यह अभिराम क्रम अविराम गति से चल रहा है । आकाश में देखने से मृगशिरा नक्षत्र के तारे कुछ इस तरह झुके हुए से दिखाई पड़ते हैं कि मृग के (दो सींगों सहित) सिर जैसी उनकी आकृति लगती है । अत: इस नक्षत्र को मृगशिरा के नाम से अभिहित किया गया । इसके बाद अथवा इसके पीछे स्थिति है आर्द्रा नक्षत्र की । यह बाण की तरह दिखता है । आर्द्रा नक्षत्र को वैदिक संस्कृत में मृगव्याध कहा गया है । ऊपर आकाश का अवलोकन करने पर जब ये दो नक्षत्र दृष्टिगोचर होते हैं, तो जान पड़ता है कि हिरण के पीछे एक पैना बाण लगा हुआ है । वैदिक ज्योतिष के अनुसार भगवान शिव का रुद्र रूप इस नक्षत्र का अधिदेवता है । अतएव मृगशिरा में प्रजेश्वर (प्रजानाथ) तथा उसके पीछे-पीछे आने वाले आर्द्रा नक्षत्र में रुद्र के अचूक बाण की कल्पना इस श्लोक में की गई । कवि का यह कहना कि तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभस: अर्थात् वह (उन्हें) आज तक भी छोड़ता नहीं है, इस बात का परिचायक है कि भयकम्पित शिकार के भागने की व उस पर घात लगाये हुए उत्साही बाण के पीछा करने की यह घटना निरन्तर नभ में आज भी नयनगोचर होती है । इस आकाशीय परिदृश्य को शिव तथा ब्रह्मा के रूपक से रोचक व बोधगम्य बनाया गया है । यह शिवलीला आज तक लोक में अगणित वर्षों से अनवरत व अविश्रान्त चल रही है । इन दोनों देवों के निरन्तर इस प्रकार द्युलोक में होने के कारण यह प्रश्न अथवा संशय नहीं उठना चाहिये कि वे दोनों विश्व में अन्य स्थानों पर उस काल में नहीं हैं । ऐसा इसलिये कि देवता अपने सर्व रूपों से सर्वकाल में सर्वत्र व्याप्त रहते हैं । उनके एक स्थान पर होने का अर्थ यह नहीं है कि वे उस एक स्थान पर ही वर्तमान हैं और अन्यत्र वे नहीं हैं । सर्वत्र उनकी गति सर्वकाल में अबाध है ।

प्रस्तुत श्लोक मे काम-विकार के कारण शिवजी द्वारा ब्रह्माजी के दण्डित होने के भाव को प्रकाशित किया गया है । एतदर्थ यह समीचीन होगा कि काम की उत्पत्ति विषयक आख्यान को संक्षिप्त में जान लिया जाये । पुराणों की कथा में आता है कि कामदेव ब्रह्माजी के मानस से उत्पन्न हुए । कामदेव अपनी उत्पत्ति के साथ ही ब्रह्माजी से सर्वजयी होने का श्रेष्ठ वरदान पा गये । शिवपुराण के अनुसार लोककर्त्ता ब्रह्माजी ने अपने मानसपुत्रों को उत्पन्न करने के उपरान्त एक सुन्दर रूप वाली श्रेष्ठ युवती को भी उत्पन्न किया । उसे देख कर प्रसन्न प्रजानाथ के मन में अभिलाषा का उदय हुआ । उसी काल एक अत्यन्त अद्भुत एवं मनोहर मानस-पुरुष (यही कामदेव थे) उत्पन्न हुआ, जो पुष्पबाणों से युक्त था तथा जिसके हाथ में पुष्प-धनुष सुशोभित था । उस पुरुष के द्वारा अपने अभिमान योग्य स्थान तथा करणीय कर्म के बारे में पूछने पर सृष्टा ने उससे कहा कि तुम गुप्त रूप से सब प्राणियों में प्रविष्ट हो कर उनके सुख का कारण बनते हुए सनातनी सृष्टि करो । तुम्हारे समान कोई देवता पराक्रमी न होगा व तुम्हारे लिये सभी स्थान हैं । तुम अपने पुष्पशर से सभी प्राणियों का मर्म भेदने में और सबको उन्मत्त करने में सफल रहोगे । सभी लोकों में सबसे सुन्दर रूप वाला होने से उसे काम कहा गया । इसके अलावा जन्म लेते ही सबका मन मथ डालने के कारण वह मनोहर पुरुष मन्मथ कहलाया व दर्पयुक्त होने के कारण कन्दर्प एवं सभी को मदोन्मत्त कर देने के कारण मदन पुकारा गया । ब्रह्माजी से प्राप्त सर्वव्याप्तित्व के वर से उद्धत बने हुए कामदेव ने अपने को सौंपे गये कर्म की परीक्षा हेतु अपने पुष्पबाण से सर्वप्रथम सृष्टा को ही मोहित कर दिया । कोमल कुशल काम को उत्पन्न करने के उपरान्त काम पर उनका नियन्त्रण न रहा । फलत: वेदों के वक्ता, जितेन्द्रिय ब्रह्माजी कुत्सित भाव से युक्त तथा उन्मत्त इन्द्रियों वाले हो गये तथा अनुरागपूर्वक अपनी दुहिता (पुत्री) की अभिलाषा करने लगे । यहाँ प्रदत्त कथा के अनुसार प्रजेश्वर के मानसपुत्र धर्म पिता की यह दुर्दशा देख कर खिन्न हो गये तथा उन्होंने तब भगवान शिव का स्मरण किया व शिवजी वहाँ प्रकट हो गये व उन्होंने ब्रह्माजी की मर्मभेदी भर्त्सना की । कथा आगे क्रमश: और विस्तार पाती है । किन्तु यहाँ इसके एक अंश को उद्धृत करने का आशय केवल इतना भर है कि पाठक सृष्टिकर्ता के काममोहित होने के प्रसंग के पीछे निहित कारणभूत घटना से विज्ञ हों ।

ब्रह्माजी सृष्टा हैं । दैनिक जीवन में भी देखने को मिलता है कि यदि कोई सृजनधर्मी सच्चा कलाकार अपनी अनुपम व सुन्दर कृति अथवा रचना पर यदि अतीव मुग्ध हो जाये व उसे मात्र निहारता ही रह जाये या बार-बार बावला हो कर नेत्रों से और मन से उसका सेवन अथवा भोग ही करता रह जाये तो उसका यह अहंकार उसे उन्मत्त कर देगा तथा उसकी नवसृजन की क्षमता कुण्ठित हो रहेगी । किसी भी कलाकार की रचना उसकी अपनी मानसपुत्री है, जिससे मुग्ध व मदान्ध हो कर वह अपने मार्ग से भटक सकता है । तब वह एक प्रकार से मृग ही है । भक्त और ज्ञानी कवि चंचल मन की उपमा प्राय: मृग से देते हैं । इसी प्रकार ध्यान में लीन योगपरायण साधक आज्ञाचक्र में ज्योति का दर्शन करके, उसमें मोहित होकर वहीं ठहर जाये, तो उन्नति न कर पायेगा तथा परमात्मतत्व से दूर रह जायेगा । कामनाओं में बने रहने से जीव का कल्याण नहीं होता । कोटि-कोटि ब्रह्माण्डों की रचना करने वाले भगवान सदाशिव ने ब्रह्मा को सृष्टिकर्त्ता का कार्य सौंपा ।इसीसे वे प्रजेश, प्रजानाथ कहलाये । किन्तु शिव की शक्ति भगवती आद्या की माया से वे भी अछूते न रह सके । लोकसृष्टा होने का दर्प उठा । उन ज्ञानी कमलोद्भव में कामना का प्रस्फोट हुआ और विगलित-विवेक विधाता को दण्डित करके सर्वलोकमहेश्वर ने अन्तत: उनके हित का साधन किया । उनका तो स्वरूप ही कामारि है —-काम को दग्ध करके परम कल्याण प्रदान करने वाला । इसी तरह किसी का भी दुराचरण त्रिलोचन की दृष्टि में अक्षम्य है । यह लीलाविशारद प्रभु की लीला का सन्देश है । सच ही कहा है,

जहां काम तहं राम नहीं ।
श्लोक २१ अनुक्रमणिका

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