शिवमहिम्नःस्तोत्रम्

श्लोक २१

Shloka 21 Analysis

क्रियादक्षो दक्ष: क्रतुपतिरधीशस्तनुभृता-
मृषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्या: सुरगणा: ।
क्रतुभ्रंशस्त्वत्त: क्रतुफलविधानव्यसनिनो
ध्रुवं कर्तु: श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखा: ।। २१ ।।

क्रियादक्षो दक्ष: क्रतुपतिरधीशस्तनुभृता-म्
क्रियादक्षो = यज्ञादि कृत्यों नें सुनिपुण
दक्ष: = दक्ष नामक प्रजापति
क्रतुपतिरधीशस्तनुभृता-म् क्रतुपति: + अधीश: + तनुभृताम्
क्रतुपति: = यजमान, यज्ञ के अनुष्ठाता
अधीश: = स्वामी
तनुभृताम् = (सभी) देहधारियों के
मृषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्या: सुरगणा:
मृषीणामार्त्विज्यं म् + ऋषीणाम् + आर्त्विज्यम्
म् = पहली पंक्ति के अंतिम शब्द से जुड़ा हुआ आर्त्विज्यम्
ऋषीणाम् = ऋषियों के
आर्त्विज्यम् = पौरोहित्य, पुरोहितत्व
शरणद = (हे) शरणदाता (प्रभो !)
सदस्या: = यज्ञ-समाज या सभा में बैठने वाले, सभासद्
सुरगणा: = (ब्रह्मा, विष्णु व अन्य) देवगण
क्रतुभ्रंशस्त्वत्त: क्रतुफलविधानव्यसनिनो
क्रतुभ्रंशस्त्वत्त: क्रतुफलविधानव्यसनिनो क्रतुभ्रंश: + त्वत्त: क्रतुभ्रंश: + यज्ञनाश (हुआ)
त्वत्त: = आपसे
क्रतुफलविधानव्यसनिनो क्रतुफल + विधान + व्यसनिन:
क्रतुफल = यज्ञ का फल
विधान = व्यवस्था या नियोजन (करने में)
व्यसनिन: = तत्पर, संलग्न
ध्रुवं कर्तु: श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखा:
ध्रुवम् = निश्चित ही
कर्तु: = (यज्ञ)कर्ता के
श्रद्धाविधुरमभिचाराय श्रद्धाविधुरम् + अभिचाराय
श्रद्धाविधुरम् = श्रद्धाविहीन (भाव से किये जाने वाले)
अभिचाराय = अमंगलकारी (होते हैं)
हि = क्योंकि
मखा: = यज्ञ, यज्ञविषयक कृत्य

अन्वय

(हे) शरणद ! (यस्मिन् क्रतौ) क्रियादक्ष: तनुभृत्ताम् अधीश: दक्ष: क्रतुपति: ऋषीणाम् आर्त्विज्यम् सुरगणा: सदस्या: (तत्र अपि) क्रतुफलविधानव्यसनिन: त्वत्: क्रतुभ्रंश: (जात:) । ध्रुवम् हि कर्तु: श्रद्धाविधुरम् मखा: अभिचाराय (भवन्ति)

भावार्थ

हे शरणदाता प्रभो ! जिस यज्ञ में सब देहधारियों के स्वामी तथा यज्ञ-यागादि कर्मों में पूरी तरह प्रवीण प्रजापति दक्ष यजमान हुए, ऋषिगण पुरोहित रहे और जिस यज्ञ में देवतागण स्वयं उपस्थित रहे, उस यज्ञ का आपके द्वारा, जो यज्ञफल प्रदान करने में सदा तत्पर रहते हैं, विनाश कर दिया गया । निश्चय ही कर्ता द्वारा बिना श्रद्धा के किये गये यज्ञ अमंगलकारी सिद्ध होते हैं ।

व्याख्या

पिछले श्लोक में गन्धर्वराज पुष्पदन्त ने भगवान भूतभावन को यज्ञफल प्रदान करने में तत्पर बताया । अब वे इस श्लोक में बता रहे हैं कि यज्ञफल प्रदाता शिव स्वयं उस यज्ञ को नष्ट कर देते हैं, जिसे यजमान श्रद्धारहित हो कर, वैदिक विधानों को न मान कर अनादर के साथ करता है । इस प्रकार का यज्ञ यजमान के लिये केवल अकल्याण का वाहक होता है । कुटिल आशय के साथ किया हुआ धार्मिक कृत्य भी मंगल का विधान कैसे कर सकता है ?
श्रद्धा से रहित हो कर किये जाने वाले यज्ञ याजक के हेतु केवल अमंगलकारी ही होते हैं । इसके लिये स्तुतिगायक प्रजापति दक्ष के यज्ञ-ध्वंस का उदाहरण देते हैं, जिसकी कथा सर्वविदित है ।

संक्षेप में कथा इस प्रकार है । एक बार भगवान शिव की प्रिय पत्नी सती, जो दाक्षायणी अर्थात् दक्ष की पुत्री थीं, अपने पिता द्वारा किये जाने वाले भव्य यज्ञ में अनिमंत्रित ही चली गयीं । प्रजापति दक्ष व शिवजी के बीच वैमनस्य होने के कारण उनके पिता दक्ष ने शिवजी को नहीं बुलाया था । बड़े धूमधाम से आयोजित होने वाले इस यज्ञ में सभी सुरगण, सम्मान्य ऋषिगण सब सादर आमंत्रित थे, केवल शिवजी को ही न बुला कर उनका अपमान किया गया था । यह कृत्य वैदिक विधान के प्रतिकूल भी था और कुटिल भी । सती के बिन बुलाये वहाँ पहुँचने पर उनके पिता ने उनके साथ रुक्ष व्यवहार करते हुए शिवजी के प्रति दुर्वचन कहे । वहाँ सब देवताओं के यज्ञभाग के बीच शिवजी का यज्ञभाग न देख कर वे क्रुद्ध हुईं व पिता के व्यवहार की कठोर भर्त्सना करते हुए वहीं योगाग्नि में सती ने अपना देह-त्याग कर दिया । इस पर उनके साथ आये हुए शिवगणों ने यज्ञ में विध्वंस मचा दिया । शिवजी को जब यह वृतान्त ज्ञात हुआ तो क्रोध में उन्होंने अपनी जटा के बाल को पटक दिया, जिससे महाभयानक वीरभद्र प्रकट हुए व उन्होंने अन्य गणों के साथ यज्ञसभा में सर्वनाशलीला मचाई और दक्ष का सिर काट कर यज्ञकुण्ड में फेंक दिया । (ग्रन्थ-भेद से कहीं शिव द्वारा तो कहीं गणों द्वारा सिर काटना निरूपित किया गया है ।) महादेव के वहाँ पहुँचने पर त्राहि-त्राहि पुकारते शेष देवताओं ने उनकी शरण ली व क्रोध शान्त करने की आर्त स्वर में प्रार्थना की । फलत: महादेव ने शान्त हो कर दक्ष के कटे सिर के स्थान पर बकरे का सिर लगा कर उन्हें जीवित कर दिया । कहने का तात्पर्य यह है कि कुटिल आशय से आरम्भ किया गया यज्ञ, अपनी सम्पूर्ण दिव्यता व भव्यता के पश्चात् भी अन्ततोगत्वा विनाश को प्राप्त हुआ व यजमान के मरण का कारण बना ।

प्रस्तुत श्लोक की पहली व दूसरी पंक्तियों से प्रजापति दक्ष के यज्ञ की भव्यता ज्ञात होती है । दक्ष ब्रह्माजी के दस मानसपुत्रों में से एक हैं । शिवपुराण के अनुसार सृष्टिसंवर्धनहेतु चिन्तित ब्रह्माजी ने तपस्या द्वारा भगवती शिवा को प्रसन्न किया व उनसे दक्ष के घर पुत्री रूप में अवतरित होने की प्रार्थना की, ताकि आगे वे शिवजी को मोहित कर उनकी भार्या बनें, जिससे सनातनी सृष्टि सम्भव हो । पिता ब्रह्माजी से आज्ञा पाकर महाराज दक्षप्रजापति ने क्षीररसागर के तट पर तप किया तथा जगदम्बा शिवा को प्रसन्न करके अपना मनोरथ निवेदित किया, जिसे पूर्ण करने का उत्तम वर देवी ने उन्हें दिया । किन्तु दक्ष प्रजापति से एक बात और भी कही कि मेरी यह प्रतिज्ञा है कि यदि आपने मेरा कभी अनादर किया तो मैं अपना देह त्याग दूँगी । मैं सर्वथा स्वतंत्र हूँ । तदनन्तर परमपावनी शिवस्वरूपा देवी ने दक्षपत्नी वीरिणी के गर्भ में निवास किया व दसवाँ मास पूर्ण होने पर वे शुभ मुहूर्त में प्रकट हो गईं । उन्हें सती के नाम से पुकारा गया । लोकलीला का अनुसरण करती हुईं वे बड़ी हुईं और शिवजी से उनका शुभ विवाह कराया गया । इस प्रकार शिवजी दक्ष के जामाता बने । यह है प्रजापति दक्ष शिवजी के संबंध की संक्षिप्त कथा । यह अन्य पुराणों में भी प्राप्त होती है ।

प्रस्तुत श्लोक में दक्ष के यज्ञ विध्वंस का वृतान्त है और कवि कहते हैं कि श्रद्धारहित हो कर किये गये यज्ञ-याग आदि पुण्यकृत्य याजक के अमंगल का कारण बनते हैं, कवि के शब्दों में, कर्तु: श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखा: । मख: का बहुवचन है मखा: और इससे अभिप्रेत है यज्ञ एवं यज्ञसबंधी कृत्य । पिछले श्लोक में बताया गया है कि भगवान शिव यज्ञफल देने में सदा तत्पर व हितोत्सुक रहते हैं । तब क्या कारण हैं कि वह यज्ञ नष्ट हो गया या कर दिया गया, जिसके क्रतुपति: अर्थात् याजक प्रजापति दक्ष थे, जो स्वयं ही क्रियादक्ष: थे, अर्थात् यज्ञ-याग, तप-जप, समस्त उपचार सहित पूजन आदि पुण्य-कृत्यों में सुप्रवीण थे । वेदों के ज्ञाता दक्ष वैदिक कर्मकाण्ड में परम निपुण थे । उनके तेज की प्रखरता के विषय में श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णन है कि वे अपने तेज से सूर्य के समान प्रकाशमान थे तथा देवों व मुनियों से सम्मान्य थे । श्लोक में दक्ष को अधीश: तनुभृताम् कह कर उनके प्रजापति होने को भी व्यक्त किया गया है । तनुभृताम् अर्थात् तनु (देह) धारण करने वालों के अधीश अर्थात् देहधारियों के स्वामी । इस प्रकार वे प्रजाओं के स्वामी हुए । यहाँ प्रजा से तात्पर्य सन्तान से हैं । दक्ष ब्रह्माजी के दस वंशप्रवर्तक पुत्रों में से एक हैं । वे जिस यज्ञ को करने में प्रवृत्त हुए थे, उसके ऋत्विज शुचितपोनिधि, पुण्यधर्मा व परम ज्ञानी ऋषिगण थे, जिनसे किसी प्रकार की त्रुटि संभव न थी । दक्ष-यज्ञ में सभासद् स्वयं देवगण थे । कवि स्तुति करते हुए पूछते हैं कि हे शरणदायी प्रभो ! इतनी पवित्रता से परिपूर्ण यज्ञ का विनाश हुआ, वह भी आप से, जो कि यज्ञफल के दयामय प्रदाता हैं । तदनन्तर स्वयं ही उत्तर देते हुए कवि कहते हैं कि इस संपूर्ण बाह्य शुचिता के पश्चात् भी ऐसा इसलिये हुआ कि वह यज्ञ श्रीशिव के प्रति अश्रद्धा और अनादर भाव से हो रहा था । जो सात्विक न हो, ऐसे यज्ञ का विध्वंस उन्हें करना ही होता है । यज्ञ को अकुटिल और अहिंसक होना चाहिये । दक्ष का यज्ञ इसके विपरीत महादेव के अपमान के दुराशय से भरा हुआ था, अतएव उसका विनाश अवश्यम्भावी था ।

ऊपर उल्लिखित घटना के संबंध में यह ज्ञातव्य है कि दक्ष का दुराशय अपने जामाता के लिये आकस्मिक न था । इसके पीछे भी शिवलीला है, जिसकी कथा संक्षेप में इस प्रकार है । श्रीमद् भागवत् महापुराण में प्रदत्त कथा के अनुसार एक बार प्रजापतियों का यज्ञ आयोजित हुआ था, जिसमें महान् ऋषिगण और अग्नि आदि सुरगण सभासद् थे । सभा में जब प्रजापति दक्ष ने प्रवेश किया तो सभी ने अपने आसन से उठ कर खड़े हो कर दक्ष का सम्मान किया, केवल ब्रह्माजी व शिवजी नहीं उठे । दक्ष ब्रह्माजी के पुत्र होने के नाते उनसे सम्मान की अपेक्षा न रखते थे, किन्तु शिवजी का जामाता हो कर अभ्युत्थान के रूप में उन्हें आदर न देना दक्ष को शूल-सा चुभा व उनके उत्कट क्रोध का कारण बना । उनके अहंकार पर यह गहरा आघात उनके लिये असह्य था । वे महादेव के प्रतिकूल हो गये । उनके व्यवहार की कठोर भर्त्सना करते हुए तथा उन्हें देवों में अधम बताते हुए दक्ष ने रुद्र को यज्ञ से बहिष्कृत हो जाने का शाप दिया । कुछ काल के उपरान्त दक्ष को ब्रह्माजी ने प्रजापतियों का अधिपति बना दिया, जिससे कदम का गर्व और बढ़ गया । पुराण के शब्दों में,

यदाभिषिक्तो दक्षस्तु ब्रह्मणा परमेष्ठिना ।
प्रजापतीनां सर्वेषामाधिपत्ये स्मयोऽभवत् ॥

इस प्रकार प्रजापतियों के अधिपति बन कर दक्ष स्मय अर्थात् गर्व से पूरी तरह भर गये । उन्होंने भगवान शंकर को यज्ञभाग न देकर उनका तिरस्कार करते हुए एक महायज्ञ आरम्भ किया । यज्ञोत्सव में ब्रह्मर्षि, देवर्षि, पितर एवं इन्द्र प्रभृति सब सुरगण व लोकपाल समागत हुए । किंतु शिवजी को दक्ष ने आमंत्रित नहीं किया । दाक्षायणी सती निमंत्रण न पाकर पति की अनिच्छा के पश्चात् भी यज्ञ में सम्मिलित होने के हेतु माता-पिता के घर पर गईं, किन्तु देवताओं के साथ शिवजी के यज्ञभाग वहाँ न पाया , इतना ही नहीं दक्ष ने महादेव के प्रति अपमानजनक मर्मभेदी दुर्वचन कहे व शिवपत्नी होने के नाते बिन बुलाये वहाँ आने पर सती का तिरस्कार किया । अपने पति महादेव के ऐसे घोर अपमान से क्रुद्ध व क्षुब्ध सती ने यज्ञशाला में सब के देखते ही देखते स्वयं को योगाग्नि में दग्ध करके अपनी देह का त्याग कर दिया । इस प्रकार दक्ष की पुत्री बन कर जन्म लेने के पूर्व की अपनी प्रतिज्ञा का निर्वाह करते हुए भगवती शिवा ने अपनी लीला का संवरण किया । यह देख कर उनके साथ शिवजी ने जो अपने गण भेजे थे, उन सब ने वहां घोर उत्पात मचा दिया एवं सभासदों को भीषण रूप से त्रस्त कर दिया । शिवजी ने इस वृतान्त को सुन कर क्रोध में आकर अपनी जटा का केश पटका व उससे रौद्र पराक्रम वाले वीरभद्र उत्पन्न हुए, जो दूसरे रुद्र के समान ही दिखाई देते थे, भयंकर व भीषण । शिवाज्ञा पा कर अन्य गणों के साथ वीरभद्र पहले से ही विनष्ट उस यज्ञ-सभा में गये व दक्ष का सिर काट दिया । देवताओं को घायल कर दिया व वहाँ से भगा दिया । चारों ओर हाहाकार व चीत्कार मचा हुआ था । ( इसके आगे की कथानुसार शिवजी के वहाँ आने पर घायल व पीड़ित देवताओं ने भगवान आशुतोष को स्तवन से व उनकी शरण-ग्रहण से शान्त किया तथा दक्ष को पुनर्जीवन देने की आर्त प्रार्थना की । शिवजी ने बकरे का सिर दक्ष के कटे हुए सिर के स्थान पर लगा कर प्रजापति को जीवित किया । लज्जित दक्ष ने शिवजी के वास्तविक रूप को समझ कर उनका स्तवन किया तथा अपना प्रणाम व पश्चाताप शिव-चरणों में निवेदित किया ।)

पुराणों में प्राप्त उपर्युक्त कथा से स्पष्ट होता है कि दक्ष का इतने विराट स्तर पर होने वाला यज्ञ उनके भगवान शंकर के प्रति अश्रद्धा एवं अनादरयुक्त आचरण के कारण नष्ट-भ्रष्ट हो गया तथा उनका भी भयंकर अमंगल हुआ । इसी कारण शिवजी को मखान्तक, यज्ञहा, यज्ञविध्वंसक, दक्षाध्वरध्वंसक आदि नामों से भी पुकारा जाता है । वस्तुत: यज्ञ यदि यज्ञ-पुरुष के प्रति निष्ठा व भक्तिभाव से किया जाये, तब ही भक्तवरदायक भगवान भूतभावन उस यज्ञ में व्याप्त होते हैं तथा यज्ञ का सुफल याजक को प्राप्त होता है । पथ-प्रदर्शन व पथ-प्रकाशन करना उनका कार्य है ।

श्लोक २० अनुक्रमणिका

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