प्राणप्रिय

अनमनी, बुझी हुई सी
न जाने क्यों मैं बावली
रूठी हुई हूं खुद से ही
छू कर तुम्हें हवा बह गई है
सरसराती कुछ कह गई हैं ।

खुश तो नहीं हो तुम भी
हो जहां कहीं चुपचाप ही
जैसे बिना अर्थ का कोई शब्द हो
शिराओं में मंद बह रहा रक्त हो
सागर को न नदी उसकी लब्ध हो ।

अस्तित्व गंदला काई-सा
बिन देह की परछाई सा
कमल खिलने के इंतज़ार में
सूख गई सरिता तुषार में
ठिठुरीं कलियाँ कछार में ।

सवार मौन के तूफ़ान पर
भावनाएं तीव्र उफान पर
तट की रेत खोद जाती हैं
मरी मछलियाँ छोड़ जाती हैं
प्रतीक उनके गोद जाती हैं ।

अहो ! धुंध जो कुछ छंट चली
तो अब चंचल मन की तितली
मुझसे दोस्ती गाँठ रही है
पुलक के छन्द बांट रही है
रंग भी छबीले छांट रही है ।

तुम्हारे मुख पर हंसी आई है
जाड़े में धूप निकल आई है
विकल मन ने सुध पाई है
नीरभ्र नील नभ है स्वच्छ भूरा
भेद जान गई हूँ पूरा का पूरा

तुम हो गये रुष्ट जो मुझ से
भला रहूँ कैसे मैं तुष्ट खुद से
मन में अब न बेचैनी ठहरी
अब रूठे तो सुन लो खरी-खरी
रहूंगी रुष्ट मैं तो तब ख़ुद से भी ।

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