शिवमहिम्नःस्तोत्रम्

काशीराज के उद्यान से सुंदर-सुगन्धित पुष्प प्रतिदिन चुरा कर ले जाने वाले गन्धर्वराज, शिव-निर्माल्य पर पैर पड़ जाने से, शिवकोप के भागी बन कर गन्धर्व-पद से भ्रष्ट हो जाते हैं व अपनी भूल का ज्ञान होने पर बड़े आर्त्त भाव से भगवान शिव का स्तवन -गायन करते हैं, जिसके फलस्वरूप वे क्षमा के साथ-साथ अपना पद-गौरव भी पुन:प्राप्त करते हैं । ४३ श्लोकों से सजी, गन्धर्वराज पुष्पदंत द्वारा रचित यही स्तुति वस्तुत: ‘शिवमहिम्न:स्तोत्रम्’ हैं ।

क. मूल पाठ एवं अन्वय
ख. दो शब्द
श्लोक १ महिम्नः पारन्ते परमविदुषो यद्यसदृशी …
श्लोक २ अतीतः पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयो …
श्लोक ३ मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवतस्तव …
श्लोक ४ तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत् …
श्लोक ५ किमीहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनम् …
श्लोक ६ अजन्मानोलोकाः किमवयववन्तोsपि जगतामधिष्ठातारं …
श्लोक ७ त्रयी साङ्ख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति …
श्लोक ८ महोक्षः खट्वांगं परशुरजिनं भस्म फणिनः …
श्लोक ९ ध्रुवं कश्चित्सर्वंसकलमपरस्त्वध्रुवमिदं …
श्लोक १० तवैश्वर्यं यत्नाद्युपरि विरंचिर्हरिरध: …
श्लोक ११ अयत्नादापाद्य त्रिभुवनमवैरं व्यतिकरं …
श्लोक १२ अमुष्य त्वत्सेवासमधिगतसारं भुजवनं …
श्लोक १३ यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सती …
श्लोक १४ अकाण्डब्रह्माण्डक्षयचकितदेवासुरकृपा …
श्लोक १५ असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे …
श्लोक १६ मही पादाघाताद् व्रजति सहसा संशयपदम् …
श्लोक १७ वियद्व्यापी तारागणगुणितफेनोद्गमरुचि: …
श्लोक १८ रथ: क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथ …
श्लोक १९ हरिस्ते साहस्रं कमलबलिमाधाय पदयो …
श्लोक २० क्रतौ सुप्ते जाग्रत्त्वमसि फलयोगे क्रतुमतां …
श्लोक २१ क्रियादक्षो दक्ष: क्रतुपतिरधीशस्तनुभृता- …