श्रीरामरक्षास्तोत्रम्

श्लोक २, ३, ४

Shloka 2, 3, 4

( तीनों श्लोकों को मिला कर ही एक वाक्य बनता है और अपेक्षित अर्थ निष्पन्न होता है ।)

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥ २ ॥

सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम् ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥ ३ ॥

रामरक्षां पठेत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।
शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मजम् ॥ ४ ॥

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।
ध्यात्वा = ध्यान में ला कर, स्मरण करके
नीलोत्पलश्यामं राम् नील + उत्पल + श्यामम्
नील = नीले रंग (के)
उत्पल = कमल (जैसे)
श्यामम् = सांवले
रामम् = राम को
राजीवलोचनम् राजीव + लोचनम्
राजीव = कमल (जैसे)
लोचनम् = नेत्रों वाले को
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥ २ ॥
जानकीलक्ष्मणोपेतं जानकी + लक्ष्मण + उपेतम्
जानकी = सीता
लक्ष्मण = रामानुज
उपेतम् = सहित, युक्त को
जटामुकुटमण्डितम् जटामुकुटम् + मण्डितम्
जटामुकुटम् = केशों के जटारूपी मुकुट (से)
मण्डितम् = सजे हुए को
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम् ।
सासितूणधनुर्बाणपाणिं स + असि: + तूण: + धनु: + बाण: + पाणिम्
= सहित, से युक्त
असि: = खड्ग
तूण: = तरकश, निषंग
धनु: = धनुष
बाण: = तीर (से युक्त)
पाणिम् = हाथों वाले (राम) को
नक्तंचरान्तकम् नक्तम् + चर: + अन्तकम्
नक्तम् = रात्रि में
चर: = विचरण करने वालों (का), राक्षसों (का)
अन्तकम् = अंत करने वाले को
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥ ३ ॥
स्वलीलया स्व + लीलया
स्व = अपनी
लीलया = लीला से
जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं जगत् + त्रातुम् + आविर्भूतम् + अजम्
जगत्त् = जगत् की
त्रातुम् = रक्षा के लिये
आविर्भूतम् = प्रकट हुए को
अजम् = अजन्मा को
विभुम् = सर्वव्यापी को
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।
रामरक्षाम् = रामरक्षा को, राम के बल से संपन्न स्तोत्र को
पठेत्प्राज्ञ: पठेत् + प्राज्ञ:
पठेत् = पढ़े, पाठ करे
प्राज्ञ: = सुधी मनुष्य
पापघ्नीं = पापों का नाश करने वाली को (तथा)
सर्वकामदाम् = सब कामनाएँ पूर्ण करने वाली को
शिरो = शिर: = शीश, सिर को
मे = मेरे
राघव: = रघुकुल में जन्मे हुए राम
पातु = रक्षित करें, राखें
भालं = माथे को
शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मजम् ॥ ४ ॥
दशरथात्मजम् दशरथ: + आत्मज:
दशरथ: = अयोध्यापति दशरथ (के)
आत्मज: = पुत्र

अन्वय

नीलोत्पलश्यामम् राजीवलोचनम् जानकीलक्ष्मण उपेतम् जटामुकुटमण्डितम् सासितूण:धनुर्बाणपाणिम् नक्तंचरान्तकम् जगत् त्रातुम् स्वलीलया आविर्भूतम् अजम् विभुम् रामम् ध्यात्वा प्राज्ञ: पापघ्नीम् सर्वकामदाम् रामरक्षाम् पठेत् ।

भावार्थ

नीलकमल-से सांवले (वर्ण वाले), कमलनयन, सीता और लक्ष्मण के सहित, जटाओं रूपी मुकुट से सुशोभित, हाथों मे खड्ग-तरकश व धनुष-बाण के सहित, राक्षसों का अन्त करने वाले, संसार की रक्षा हेतु अपनी लीला से प्रकट होने वाले, सर्वव्यापी राम को (अपने) ध्यान में लाकर विज्ञ (जानकार) मनुष्य इस पापविनाशिनी व सब कामनाएँ पूर्ण करने वाली राम-रक्षा को पढ़े अर्थात् राम के बल से सम्पन्न इस रक्षा स्तोत्र का पाठ करे ।

व्याख्या

श्रीरामरक्षास्तोत्रम् में श्लोक दूसरा,  तीसरा और चौथा मिल कर एक पूरा वाक्य बनता है । अत: यहाँ तीनों श्लोक एक साथ लिखे गये हैं । पूरा वाक्य श्लोक संख्या २ से शुरु हो कर श्लोक संख्या ४ की पहली पंक्ति तक आ कर समाप्त हो जाता है । दूसरे, तीसरे व चौथे श्लोक में कुल मिला कर राम की विशेषताएँ बता कर कहा गया है कि ऐसे राम का ध्यान करके तब सुधी जन रामरक्षां पठेत् अर्थात् रामरक्षा का पाठ करे , जो भगवान् राम के बल से संपन्न है । इसके बाद चौथे श्लोक की दूसरी पंक्ति से अगला वाक्य बनता है, जिसमें शरीर के एक-एक अंग को लेकर रक्षा की प्रार्थना का आरम्भ हो जाता है ।

श्लोक संख्या  २ का आरम्भ  ध्यात्वा शब्द से होता है, जिसका अर्थ है ध्यान करके, स्मरण करके । राम की कुछ विशेषताएँ वर्णित करते हुए  कहा है कि ऐसे राम को ध्यात्वा अर्थात् ऐसे राम को ध्यान का विषय बना कर … , जो नीलकमल-से श्याम वर्ण के हैं, अर्थात् सांवले हैं और जिनके नयन कमल के समान हैं ( उन्हें कमलनयन, पद्मलोचन, अरविन्दाक्ष भी कहते हैं ), साथ में जिनके साथ सीताजी व लक्ष्मणजी हैं — सीतालक्ष्मणोपेतमं । साधक के ध्यान में राम की ऐसी मूरत आनी चाहिए, जिसमें राम सीता व लक्ष्मण के सहित हों । साथ ही जो जटा-मुकुट से भूषित हों अर्थात् जिनके शीश पर जटाओं का मुकुट आभूषण की भाँति सजा हो, द्युति बिखेर रहा हो, ऐसे राम का ध्यान करके …। यहां आधी बात कह कर दूसरा श्लोक पूरा हो जाता है ।

अब अगले श्लोक अर्थात् श्लोक संख्या ३  में पिछले श्लोक की अधूरी रही राम की ध्यानछवि-विषयक बात आगे बढ़ती है । यहां कहा है कि उन श्रीराम का ध्यान प्राज्ञ पुरुष करे ( ऊपर वर्णित विशिष्ठताओं के अलावा) जिनके हाथ खड्ग, तूणीर (तरकश ) व धनुष-बाण से युक्त हों — सासितूणधनुर्बाणपाणिम् । 

इसमें सासि  शब्द  स + असि से बना है, स यानि सहित तथा असि यानि  खड्ग अथवा तलवार । तूण का अर्थ तरकश (तूणीर) तथा धनुर्बाण का अर्थ कमान तथा तीर है एवं पाणि का अर्थ होता है हाथ । पूरे शब्द में श्रीराम के  लिये के यह विशेषण प्रयुक्त किया है कि वे राम, जो अपने हाथों में खड्ग, तरकश व तीर-कमान धारण किये हुए हैं । साथ ही वे नक्तंचरान्तकम्  हैं । नक्तम् रात्रि को कहते हैं, चर यानि विचरण करने वाले, घूमनेवाले । इस प्रकार नक्तंचर शब्द का अर्थ है निशाचर अथवा राक्षस, तथा अन्तकम् कहते हैं अन्त करने वाले को, मारने वाले को अतएव पूरे शब्द का अर्थ होता है राक्षसों का अन्त करने वाले, राक्षसों को मारने वाले राम । राक्षसमर्दन होने के अलावा उनकी अगली विशिष्टता यह कही है कि वे स्वलीलया अर्थात् अपनी लीला से स्वयं ही संसार की रक्षा के लिये अवतीर्ण हुए हैं —  जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं ( जगत् + त्रातुम् + आविर्भूतम् + अजम्) जिसका अर्थ है जगत् का त्राण करने के लिये  जो प्रकट हुए हैं, अवतरित हुए हैं  तथा जो अजम्  यानि अजन्मा हैं एवं  विभु हैं अर्थात् जो सर्वत्र व्याप्त हैं, सर्वसमर्थ व सर्वोपरि हैं, ऐसे भगवान् राम का साधक ध्यान करे ।

अब आगे श्लोक संख्या ४ में पिछले दो श्लोकों से कही जाती हुई आधी बात पूरी होती है । यहाँ कहा गया है कि ( ऐसी विशिष्ठताओं से युक्त ) प्रभु राम का ध्यान करके प्राज्ञ: अर्थात् सुधी पुरुष पापविनाशिनी, सर्वकामप्रदायिनी रामरक्षा का अर्थात्  प्रभु राम के बल से संपन्न इस रामरक्षा-स्तोत्र  का पाठ करे ——रामरक्षां पठेत्प्राज्ञ:  ।  यह चौथे श्लोक की पहली पंक्ति में वर्णित है ।

श्रीरामरक्षास्तोत्रम् के चौथे श्लोक की दूसरी पंक्ति से आपादमस्तक शरीर के एक-एक अंग की रक्षा की प्रार्थना आरम्भ हो जाती है  और प्रत्येक अंग में राम के भिन्न-भिन्न नाम मिलते हैं । यहां शीश से शुरु करते हुए कहा है कि राघव  राम मेरे सिर को रक्षित करें और  दशरथ-पुत्र मेरे ललाट को । महाराज रघु की वंशपरम्परा में दशरथात्मज  भी उन्हें कहते हैं । शिशु पिता की आत्मा से बनता है अत: आत्मज कहलाता है । पण्डित नित्यानन्द मिश्र अपनी पुस्तक रामरक्षासुबोधिनी में कहते हैं कि  रघुवंशियों में राम सबसे उत्तम हैं तथा शीश शरीर का सबसे उत्तम अंग है, अतएव इसकी रक्षा हेतु राम को राघव नाम से पुकारा गया है ।


इस प्रकार श्रीरामरक्षास्तोत्रम् के दूसरे, तीसरे व चौथे श्लोक की पहली पंक्ति को इकट्ठा करके एक वाक्य बनता है, जिसका पूर्ण आशय यह निकल कर आता है कि नीलकमल के समान श्यामल वर्ण, पद्मलोचन, जटाओं के मुकुट से सजे हुए, हाथों में धनुष-बाण व खड्ग-तरकश धारण किये हुए, राक्षसान्तक और अपनी लीला से अवतीर्ण होने वाले, अजन्मा और सर्वव्यापक प्रभु राम का सीताजी व लक्ष्मणजी सहित स्मरण करके सुधी मनुष्य इस सर्वकामप्रदायिनी व पापमोचनी रामरक्षा का पाठ करे । मेरे शीश की राघव रक्षा करें तथा मस्तक की रक्षा दशरथात्मज करें ।

इस श्लोकत्रय के बाद अगले श्लोकों में सांगोपांग शरीर के अन्य अवयवों की रक्षा हेतु प्रार्थना देखने को मिलती है ।

श्लोक १ अनुक्रमणिका श्लोक ५

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