महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्

श्लोक १२

Shloka 12

सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ

एक विशाल रूप से आयोजित महासत्र (महायज्ञ) की भांति ही रहे घोर युद्ध में, फूल-सी कोमल किन्तु रण-कुशल साहसी स्त्री-योद्धाओं सहित जो संग्राम में रत हैं और भील स्त्रियों ने झींगुरों के झुण्ड की भांति जिन्हें घेर रखा है, जो उत्साह और उल्लास से भरी हुई हैं और जिनके उल्लास की लालिमा से (प्रभातकालीन अरुणिमा की भांति) अतीव सुन्दर-सुकोमल कलियां पूरी तरह खिल खिल उठती हैं, ऐसी हे लावण्यमयी देवी, हे महिषासुर का घात करने वाली, हे सुन्दर जटाधरी गिरिजा, तुम्हारी जय हो, जय हो !

व्याख्या

juhiमहिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्` के बारहवें श्लोक में कवि ने दैत्यों के साथ हो रहे भगवती के युद्ध को महायज्ञ की उपमा दी है, जिसमें रण रुपी यज्ञ-कुण्ड में देवी दैत्यों की हवि देती हैं, उनके रूण्डों से उनके मुण्ड अलग करके । दैत्यों के साथ देवी का घोर युद्ध एक विशाल यज्ञ की तरह था । यज्ञों से अनिष्ट का नाश तथा शुभत्व का विस्तार होता है । असुरों के साथ देवी का युद्ध भी आसुरी शक्तियों के विनाश व मंगल के विस्तार के लिए हुआ था, अतः इसे `महाहव` कहा । दैत्यों का वध कर कर के देवी इन दैत्यों की हवि युद्ध-भूमि रूपी हवन-कुण्ड में देती रहीं, ठीक उसी तरह जैसे यज्ञ-कुण्ड में प्रज्वलित अग्नि को हवि अथवा आहुति अर्पित की जाती है । अतः कवि ने इसको महाहव कहा । `सहितमहाहव` से प्रकट होता है कि किसी के सहित वे ऐसा कर रही हैं, तब प्रश्न खड़ा होता है कि किसके सहित या किसके साथ मिल कर यह महायज्ञ वे कर रही हैं । अगले दो शब्दों में उसका उत्तर मिलता है, `मल्लमतल्लिक` तथा `मल्लितरल्लक `। `मल्ल` का प्रचलित अर्थ पहलवान या मुक्केबाज होता है, किन्तु अन्य सन्दर्भों में इससे वीर, साहसी, और योद्धा अर्थ भी अभिप्रेत है । यहाँ इसका अर्थ लिया जायेगा `रण-कुशल योद्धा `। `मल्लमतल्लिक` शब्द में `मल्ल` के अलावा एक शब्द और जुड़ा हुआ है `मतल्लिक` । संस्कृत भाषा में `मतल्लिका` शब्द का प्रयोग किया जाता है, किसी वस्तु की श्रेष्ठता बताने के लिए, जैसे `गोमतल्लिका` का अर्थ हुआ सर्वश्रेष्ठ गो यानि गाय । तदनुसार `मल्लमतल्लिक` का अर्थ हुआ, श्रेष्ठ या सर्वश्रेष्ठ योद्धा । देवी युद्ध रुपी महाहव श्रेष्ठ योद्धाओं के सहित कर रही हैं । वे श्रष्ठ योद्धा `मल्लितरल्लक` हैं, `मल्ली` से अभिप्राय जूही के फूलों से है तथा `तरल्लक` से अभिप्राय तरलदेह से है । इसका पूरा अर्थ हुआ, जूही या चमेली के फूलों सी सुकुमार देह वाली अथवा कोमलांगी । `मल्लरता` यानि योद्धाओं में रत । कुल मिला कर पहली पंक्ति में देवी को जिस प्रकार सम्बोधित किया है, उसका तात्पर्य यह है कि एक विशाल यज्ञ के समान हो रहे इस घोर युद्ध में, जूही-पुष्प-सी कोमलांगी, किन्तु साहसी वीरांगनाओं सहित संग्राम में रत हे देवी !

अगली पंक्ति में चित्रण किया है कि वन-चमेली की घुमावदार लता की भांति भीलनियां देवी को घेरे हुए हैं। स्पष्ट है कि यह भीलनियां स्थानीय प्रजाजनों की स्त्रियां हैं । असुर अपने बल के घमंड तथा वासना में अंधे हो कर निरंकुश हो गए थे और उनकी अनीति, आतंक और अत्याचारों से त्रस्त शासित जन त्राहि-त्राहि पुकार रहे थे । वे सभी इस युद्ध में उनके विरुद्ध लड़े थे । `पल्लिकमल्लिक` में पल्लिक व मल्लिक दो शब्द हैं । `पल्लिक` शब्द पल्ली से बना है, जिसका अर्थ है ग्राम या गाँव, तथा मल्लिक शब्द जूही अथवा चमेली के फूल का वाचक है । पुराने समय में ग्रामों के आस-पास वन-प्रदेश हुआ करता था । कुल मिला कर `पल्लिकमल्लिक` का अर्थ है वनमल्लिका के फूल ।`विरचितवल्लिक` यानि इन बनफूलों-सी युवतियों द्वारा रचित बेल-सा घुमावदार घेरा । वस्तुतः बनफूल (इनको देसी फूल भी कहा जाता है) पुष्कळता से पनपते तथा फैलते हैं । वन की लताएं और पुष्प-पादप अयत्नवर्धित ( बिना किसी के यत्न किये बढ़ जाने वाले) होते हैं, वे कुशल हाथों द्वारा संवर्धित नहीं होते । अतः इनकी नन्ही-नन्ही टहनियां अनिुयंत्रित रूप से बढ़ कर घेरा अथवा झाड़ी का रूप ले लेती है । इन वनों, ग्रामों में रहने वाली फूल-सी कोमल भीलनियों ने देवी के अत्यंत निकट, उन्हें घेरे हुए लता-सी रच दी है, झींगुरों के झुण्ड की भांति वे देवी के चारों ओर रण-भूमि में मंडरा रही हैं ।

अगली पंक्ति में `शितकृतफुल्ल` में `शित` यानि धारदार, जिसे पूरी धार मिली हो, यहाँ अर्थ होगा जिसे पूरा स्फुटन मिला हो । और `कृतफ़ुल्ल` यानि पूरी तरह खिली हुईं या खिलाई हुई । `तल्लजः` श्रेष्ठता दिखने वाला शब्द है, जैसे कुमारीतल्लजः यानि श्रेष्ठ कुमारी अथवा कन्या । `तल्लजपल्लव` से अभिप्राय है श्रेष्ठ अथवा अत्यंत सुन्दर कोंपलें । और `समुल्लसितारुण` है उल्लास की, उत्साह और उमंग की लालिमा । देवी में युद्ध करने का, असुरों को समाप्त करने का उत्साह कूट कूट कर भरा हुआ है । उल्लास की ऐसी लाली उनके मनोहर मुख पर छिटकी है, जिसे जिसे देख कर उनके सहायक, उनके गण आदि भी प्रसन्नता से खिल उठते हैं । यही भाव व्यक्त करते हुए कवि कहता है कि उनके समुल्लास अर्थात् अत्यधिक आनंद की अरुणिमा से सुंदरातिसुन्दर कोंपलें पूरी तरह स्फुटित हो कर खिल उठती हैं । अरुण रंग का संबंध प्रभात से है । प्रभातकालीन आकाश की लालिमा को अरुणिमा कहा जाता है । प्रभात की बेला में कलियों का स्फुटन होता है तथा वातावरण में स्फूर्ति व आनंद छाया रहता है । देवी `सद्ललिता ` अर्थात् मंगल-मंजुला हैं, लावण्यमयी हैं और उनके उल्लास की अरुणिमा ऐसी स्फूर्त्तदायिनी है, जिसमें कोमल कोंपलों का पूर्ण प्रस्फुटन होता है । इस प्रकार स्तुतिकार कहता है निज उल्लास की अरुणिमा से कोमल कलियों को जो प्रस्फुटित करती है, ऐसी हे देवी , हे महिषासुर का घात करने वाली, सुन्दर जटाधरी हे गिरिजा, तुम्हारी जय हो, जय हो !

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