महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्

श्लोक १२

Shloka 12

महितमहाहवमल्लमतल्लिकवल्लितरल्लितभल्लिरते
विरचितवल्लिकपालिकपल्लिकझिल्लिकभिल्लिकवर्गवृते ।
श्रुतकृतफुल्लसमुल्लसितारुणतल्लजपल्लवसल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

महितमहाहवमल्लमतल्लिकवल्लितरल्लितभल्लिरते
महितमहाहवमल्लमतल्लिकवल्लितरल्लितभल्लिरते महित + महाहव + मल्ल + मतल्लिक + वल्लि +तरल्लित + भल्लि + रते
महित = गौरवशाली
महाहव = महासंग्राम
मल्ल = योद्धा
मतल्लिक = श्रेष्ठ
वल्लि = घुमावदार, घूमते हुए
तरल्लित = थरथराते हुए
भल्लि = भालों का
रते = (निरीक्षण कर) प्रसन्न होने वाली हे (देवी)
विरचितवल्लिकपालिकपल्लिकझिल्लिकभिल्लिकवर्गवृते
विरचितवल्लिकपालिकपल्लिकझिल्लिकभिल्लिकवर्गवृते विरचित + वल्लिक + पालिक + पल्लिक + झिल्लिक + भिल्लिक + वर्गवृते
विरचित = निर्मित की हुई
वल्लिक = तृण-लताओं से निर्मित पर्णकुटी, पर्णशाला आदि
पालिक = वनों के पालक व संरक्षक
पल्लिक = वन्य-ग्राम
झिल्लिक = वन्य-निवासियों द्वारा बजाया जाने वाला एक वाद्य
भिल्लिक = भीलगण, भीलजन
वर्गवृते = समूह से घिरी हुई हे (देवी)
श्रुतकृतफुल्लसमुल्लसितारुणतल्लजपल्लवसल्ललिते
श्रुतकृतफुल्लसमुल्लसितारुणतल्लजपल्लवसल्ललिते श्रुत + कृत + फुल्ल + समुल्लसित + अरुण + तल्लज + पल्लव + सद् + ललिते
श्रुत = कान
कृत = किये गये, (सँवार कर) रखे गये
फुल्ल = विकसित
समुल्लसित = अत्यधिक कान्ति या चमक वाले
अरुण = प्रभातकालीन सूर्य के रंग सा लाल रंग
तल्लज = उत्तम, बढ़िया
पल्लव = पात, पत्ते, कोंपल
सद् = सुंदर व प्रिय लगने वाली
ललिते = हे मनोहारिणी, लावण्यमयी, सलोनी
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि शैलसुते
महिषासुरमर्दिनी महिषासुर + मर्दिनी
महिषासुर = यह एक असुर का नाम है ।
मर्दिनी = घात करने वाली
रम्यकपर्दिनि रम्य + कपर्दिनि
रम्य = सुन्दर, मनोहर
कपर्दिनि = जटाधरी
शैलसुते = हे पर्वत-पुत्री

अन्वय

महित महाहव मतल्लिक मल्ल वल्लि तरल्लित भल्लि रते (हे) विरचित वल्लिक पालिक पल्लिक झिल्लिक भिल्लिक वर्गवृते (हे) फुल्ल समुल्लसित अरुण तल्लज पल्लव श्रुत कृत सद् ललिते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि (जय जय हे) शैलसुते ।

भावार्थ

(दैत्यों के साथ हो रहे)  गौरवशाली महासंग्राम में श्रेष्ठ योद्धाओं के (हाथों में) घूमते हुए व थरथराते हुए भालों को देखने में तत्पर हे देवी, लताओं-पल्लवों से बनाये गये (रचे गये) वितानों ( मण्डपों) अथवा लतागृहों को रचने वाले वनपाल या वनपालिकाओं के ग्राम्य अंचलों में, झिल्लिक नाम के वन्यवाद्य बजानेवाले भील-भीलनियोंके समूह से घिरी हुई हे देवी,  तथा उदयकालीन ( रवि जैसी ) अरुणाली रंगत के पत्र-पल्लवों को, जो विकसित हैं सुचारू रूप से तथा सुकोमल भी हैं, उन्हें कानों पर (भीलनियों की भांति) लगाये हुए हे सुन्दर-सलोनी देवी , हे महिषासुर का घात करने वाली, हे सुन्दर जटाधरी गिरिजा, तुम्हारी जय हो, जय हो !

व्याख्या

महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम् के बारहवें श्लोक में स्तुतिकार ने दैत्यों के साथ हो रहे भगवती के घमासान युद्ध में स्थानीय व श्रेष्ठ भील योद्धाओं व भीलांगनाओं के संग देवी के साहचर्य व साथ की बात कही गई है ।

कवि ने देवी व दैत्यों के बीच छिड़े इस रण  को महितमहाहव  कह कर पुकारा है । महाहव शब्द  का अर्थ है महासंग्राम ।हव शब्द का कोशगत ( शब्दकोश में दिया हुआ ) अर्थ है युद्ध , संग्राम , ललकार , चुनौती आदि । दैत्यों के साथ देवी का घोर युद्ध , घमासान युद्ध चल रहा है , अत: कवि ने इसे महाहव कहा । महित अर्थात् महानता से युक्त, गौरव से संपन्न व महनीय, और इस युद्ध को महितमहाहव कहने से प्रकट होता है कि देवी किसी महाप्रयोजन से यह युद्व कर रही हैं । वस्तुत: देवी वन्यप्रदेश के साथ लगे हुए  छोटे से गाँव में रहने वाले भीलजनों के साथ मिल कर रणक्षेत्र में डटी हुई हैं । अगला शब्द है मल्लमतल्लिक मल्ल का प्रचलित अर्थ पहलवान या मुक्केबाज होता है, किन्तु अन्य सन्दर्भों में इससे वीर, साहसी, और योद्धा अर्थ भी अभिप्रेत है । यहाँ इसका अर्थ होगा रणकुशल योद्धा । यहां मल्ल के अलावा एक शब्द और जुड़ा हुआ है मतल्लिक । संस्कृत भाषा में मतल्लिका  शब्द का प्रयोग किया जाता है, किसी वस्तु की श्रेष्ठता बताने के लिए, जैसे गोमतल्लिका का अर्थ हुआ सर्वश्रेष्ठ गो यानि गाय । तदनुसार मल्ल्मतल्लिक का अर्थ हुआ, श्रेष्ठ या सर्वश्रेष्ठ योद्धा । देवी यह महाहव वन्य प्रदेश से सटे छोटे से गाँव के ग्रामवासी भील-भीलनियों के साथ मिल कर रही हैं , जो श्रेष्ठ योद्धा हैं । वे श्रेष्ठ योद्धा हाथों में भाले थामे हुए हैं, जिन्हें वे जोश क व क्रोध के साथ घुमाते हैं, तब उन हिलते-काँपते-थरथराते भालों का देवी प्रसन्नता व कुशलता के साथ अवलोकन करती हैं । । अत: उन्हें पुकारा गया वल्लितरल्लितभल्लिरते, जिसका अर्थ है (हाथों में)  घूमते, लहराते, काँपते भालों को देखने में अथवा उनका निपुण निरीक्षण  करने में रत हे देवी ! वल्लि शब्द घुमाव का द्योतक है तथा तरल्लित शब्द से गतिशीलता की व्यंजना होती है, जैसे योद्धाओं के हाथों में भालों का दर्प के साथ लहराना व हुंकारते वीरों का अपने हाथों में भाले उठा कर लक्ष्य की ओर उन्हें साधने अथवा भाला फेंकने के हेतु से  गतिशील होना ।

अगली पंक्ति में वन-अंचल के उपकण्ठ (समीप के ग्राम-बस्तियों) में रहने वाले भीलों के वनजीवन की एक सुकुमार झांकी मिलती है । चित्रण किया है कि वन-चमेली की घुमावदार लताओं से भीलांगनाएं लतागृह अथवा पर्णकुटी रचती हैं । स्पष्ट है कि यह भीलनियां स्थानीय प्रजाजनों की स्त्रियां हैं ।  यही लोग वल्लिकपालिक हैं अर्थात् वन-वृक्ष-वल्लरि-वीरूधों के पालक तथा संरक्षक व संवर्धक भी हैं । यह वनवासी जन वनपदार्थों व वनौषधियों के कुशल ज्ञाता तथा प्रयोक्ता भी होते हैं । वन के घास-पत्तों-बेलों से यह भीलजन पर्णशालाओं व लता-निकुंजों का निर्माण करते हैं । झिल्लिक एक वाद्य-यंत्र है, जो वनवासी भीलों द्वारा प्रयोग में लाया जाता है । दूसरी पंक्ति के अनुसार देवी लतागृहों की रचना करने वाले एवं वन्यवाद्य बजाने वाले इन भीलोंा-भीलनियों के समूह से सस्नेह घिरी हुई सेव्यमान हो रही हैं । सेव्यमान होना यानि सेवा प्राप्त करना । अतएव कवि ने देवी को विरचितवल्लिकपालिक यानि लतागृह रचने वाले वनपालक व झिल्लिक के वादक भिल्लिक जनों के वर्ग से उनके पल्लिक अर्थात् छोटे से गांव में स्नेह घिरी हुई बता कर संबोधित किया । असुर अथवा दैत्य जन्मजात प्रकृति से ही  भयंकर , युद्धप्रिय व कलहप्रिय होते थे ।उत्तरोत्तर अपनी शक्ति बढ़ाते हुए काम तथा मद में अंधे हो कर वे निरंकुश हो गए थे । उनसे उत्पीडित जन तब त्राहि-त्राहि पुकार रहे थे । यह वन्य अंचल में रहने वाले भीलगण अपने भाले व अन्य अस्त्र-शस्त्रों के साथ देवी की सहायता में जुटे थे । इन लोगों के प्रति प्रीयमाण (प्रीतियुक्त) होती हुई देवी को अगली पंक्ति में कवि ने इन्हीं के रंग में रंगी हुई चित्रित किया है ।

इस श्लोक में कवि ने देवी के ललित चित्रण में भीलों की लोक-संस्कृति से उपादान जुटाये हैं । वनवासी लोग, विशेषकर भीलांगनाएं अरण्य में लब्ध होने वाले आरण्यक वस्तुओं, वनधातुओं से व पुष्प-पत्र-पल्लव आदि से अपने सौन्दर्य-प्रसाधन जुटाती हैं । वनधातुओं से वे अपने मुख व भुजाओं तथा अन्य अंगों पर चित्रकारी भी करती हैं । हरित-रक्तिम, मेदुर पत्तियों को कानों में खोंस कर कर्णाभूषण बनाती हैं । कुछ इसी की छोटी-सी झलकी इस श्लोक की तीसरी पंक्ति में मिलती है । देवी अपने प्रिय, सरल व भोले भीलों के बीच में उन्हीं के श्रृंगार से शोभित चित्रित की गई हैं । देवी के श्रीअंगों पर पल्लव-श्रृंगार उन्हें अलबेली छटा दे रहा है । देवी ने अपने श्रुत अर्थात् कानों पर पूरी तरह विकसित व अति सुन्दर पल्लव लगाया हुआ है, जिसका रंग अरुणिम आभायुक्त लाली लिये हुए है । देवी बड़ी सजीली लग रही हैं । कृतफुल्ल अर्थात् पूरी तरह खिला हुआ,  तल्लज: शब्द श्रेष्ठता दिखाने वाला शब्द है, जैसे कुमारीतल्लजः यानि श्रेष्ठ कुमारी अथवा कन्या । तल्लजपल्लव  से अभिप्राय है श्रेष्ठ अथवा अत्यंत सुन्दर किसलय या पत्र-पल्ल्व । समुल्लसित काअर्थ है अत्यंत आभायुक्त, अत्यंत चमकीला अथवा उज्जवल । अरुण रंग का संबंध प्रभात से है । प्रभातकालीन आकाश की लालिमा को अरुणिमा कहा जाता है । प्रभात की बेला में कलियों का स्फुटन होता है तथा वातावरण में स्फूर्ति व आनंद छाया रहता है । देवी को सल्ललिते (सद् + ललिते) कह कर पुकारा , अर्थात् वे सर्वमंगला-मंजुला हैं, सुलावण्यमयी हैं । पूर्ण प्रस्फुटित पल्लव लगा कर देवी सोहनी-सलोनी लग रही हैं । उनका सुकुमारता सौन्दर्य और लावण्य देखते ही बनता है  ।

आदिशक्ति का एक नाम ललिता भी है । आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार “ ललिता शाक्त आगमों में बहुत सम्मानित देवी हैं । शिव की जो लीला-शक्ति विश्व की सुन्दर रूप में रचना करती है, उसीका नाम ललिता है ।”। श्लोक के अन्त में स्तुतिकार कह उठता है,  हे देवी , हे महिषासुर का घात करने वाली, सुन्दर जटाधरी हे गिरिजा, तुम्हारी जय हो, जय हो !

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9 comments

  1. संदीप कुमार says:

    “शितकृतफुल्ल” की जगह कुछ अभिलेखों में “सितकृतफुल्ल” है। मेरे विचार से “सितकृतफुल्ल” ही सही शब्द होना चाहिए क्योंकि “सीत” का अर्थ होता है हल (कृषि में उपयोग होने वाला यंत्र) का निचला नुकीला भाग।
    राजा जनक की पुत्री का नाम सीता भी इसी सीत से उत्पन्न होने के कारण पड़ा। और आपने भी व्याख्या में धारदार शब्द का प्रयोग किया है।

    • Kiran Bhatia says:

      मान्यवर , यहां “ शितकृतफुल्ल ” सही है । इति शुभम् । 

  2. Deepak says:

    इस श्लोक का अर्थ मैं पिछले 5 दिनों से खोज रहा था क्योंकि जहाँ भी हिन्दी अर्थ लिखा था उसे देखकर मन को संतुष्टि नहीं मिल रही थी क्योंकि शाब्दिक अर्थ नहीं बन पा रहा था.. फिर ‘तरल्लक’ का अर्थ ढूँढने लगा तो फेसबुक पर किसी की पोस्ट दिखी जिसने 12वे श्लोक का बिल्कुल यही अर्थ लिखा हुआ है लेकिन उसने भी 14 श्लोक के बाद कुछ नहीं डाला.. उसके पोस्ट से ‘सद्ललिता’ कॉपी करके गूगल में डाला तो तब आपकी वेबसाइट का लिंक आया… तब जाकर मैं सभी श्लोकों का सही अर्थ पढ़ पा रहा हूँ..

    अब सवाल यह है कि मुझे आपकी वेबसाइट क्यों नहीं मिली?

    एक ब्लागर होने के नाते आप इसे शायद समझ पाएँ..

    आपने पोस्ट लिखते समय अपनी hyperlink सेटिंग में ‘vyakhya.org/mm/vyakhya/s12/’ डाला हुआ है… अगर इसके स्थान पर ‘vyakhya.org/mahishashur-mardini-meaning-slok-12/’ होता तो शायद मैं और हजारों लोग इसे सशब्दार्थ पढ़ पाते..

    मेरा निवेदन आपसे यही है कि कृपया अपना hyperlink ठीक कर दें..

    धन्यवाद.

    • Kiran Bhatia says:

      आदरणीय दीपकजी, आपका स्वागत है ।आपने कृपापूर्वक हमें युक्तिसंगत सुझाव दिया है, जो सादर स्वीकार्य व मान्य है । आपका भूरिश: धन्यवाद । आपके कथन को कार्यरूप में परिणत करने के विषय में अवश्य अपनी टेक्निकल टीम से मैं बात करूंगी । अविलम्ब यथोचित साधन किया जायेगा ।सुधी पाठकों को यह सहज ही में यह सुलभ हो, इसी में ‘ व्याख्या ‘ की सार्थकता है । इति नमस्कारान्ते ।

      • Deepak says:

        बहुत बहुत धन्यवाद..
        उनसे इस बात की चर्चा जरूर करें कि गूगल में ‘vyakhya’ कीवर्ड लिखने पर आपकी वेबसाइट सबसे ऊपर आनी चाहिए जबकि पहले पेज पर कहीं भी वेबसाइट नहीं दिखती।
        अतः बेहतर SEO तथा SMO हेतु कुछ उपाय करें..

        आपने बहुत अच्छे तरीके से व्याख्या दी हुई है सभी श्लोकों की.. उत्तम कार्य।

        • Kiran Bhatia says:

          अवश्य । जय माता दी । कृपया आठवां श्लोक भी देख लें । वांछित शब्दार्थ लिख दिये गये हैं । इति शुभम् ।

  3. सुजीत भोगले says:

    इस श्लोक से आगे आपने अन्वय और पदच्छेद नही दिया है क्या वो भी प्राप्त हो सकता है. उच्चारण एवं अर्थ समझने में उस से काफी सहाय्यता प्राप्त होती है . धन्यवाद.

    • Kiran Bhatia says:

      सुजीत भोगलेजी, बहुत बहुत शीघ्र सभी श्लोक शब्दार्थ, सन्धि-विच्छेद व अन्वय सहित प्रकाशित कर दिये जायेंगे । विलम्ब व असुविधा के लिये क्षमाप्रार्थी हूं । धन्यवाद । इति शुभम् ।

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