महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्

श्लोक १५

Shloka 15

करमुरलीरववीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते
मिलितपुलिन्द मनोहरगुंजित रंजितशैल निकुंजगते ।
निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ

हिमालय का पर्वत-प्रदेश देवी की क्रीड़ास्थली है ।यहां के कोकिल-कूजित वन-विपिन, जिनकी करगत मुरली से झर झर कर बहती स्वरलहरियों से आन्दोलित तथा कोयल को लजाने वाली स्वरमाधुरी से मुखरित हो रहे हैं, ऐसी हे (अलौकिक  तान छेड़ने वाली) मंगलमनोहरा देवी ! पुलिन्द नामक  स्थानीय जनजाति के समुदाय द्वारा मिल कर गाये जाने वाले , मीठे-मनोहर समूहगीतों से गुंजरित व विविध रंगों से रंजित पहाड़ों व निकुंजों में विचरण करने वाली  ! पहाड़ों पर, जो आपके केलिस्थल (क्रीडास्थल) हैं, सद्गुणसम्पन्न महाशबरी जनजाति के अपने भील जनों, वनवासी गणों के साथ सुप्रसन्न हे देवी ! हे महिषासुर का घात करने वाली, सुंदर जटाधरी गिरिजा, तुम्हारी जय हो, जय हो !

व्याख्या

`महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्` के पन्द्रहवें श्लोक में स्तुतिकार देवी के `शैलसुता` रूप पर प्रकाश डाला है । कवि ने देवी के पार्वत्य प्रदेश के वन-विपिन की तरुता (ताजगी) व सुरम्यता का रंगपूरित चित्र उकेरा है । साथ ही देवी पार्वती के सरल सहचर और उनके स्नेहभाजन, जो स्थानीय जन हैं, उनकी प्रकृति-संस्कृति का परिचय देते हुए उनकी सद्गुणसंपन्नता तथा सौभाग्यसंपन्नता को रेखांकित किया है ।

प्रस्तुत श्लोक की प्रथम पंक्ति में देवी पार्वती को वेणु (मुरली) की सुमधुर सुरलहरियां बिखेरते हुए चित्रित किया गया है । कवि कहते हैं कि देवी जब अपने हाथ में ली हुई मुरली बजाती हैं तो उससे निकलती स्वर-लहरियों से कोकिल के कूजने का स्वर भी लज्जित हो जाता है, ऐसी मीठी-मंजुल तान वे छेड़ती हैं । कोयल पंचम सुर में गाती है तथा उसका गान, सभी के लिये श्रुतिसुभग (श्रुति यानि कर्ण और सुभग यानि प्रिय, अत: श्रुतिसुभग अर्थात् कर्णप्रिय)  होता है, किन्तु उसका लज्जित हो जाना इस बात को सूचित करता है कि देवी की मुरली से छेड़ी हुई तान कितनी कर्ण-मधुर है ! प्रथम पंक्ति का प्रथम शब्द है करमुरलीरववीजितकूजित । यह सन्धियुक्त शब्द ध्यातव्य (ध्यान देने योग्य) है ।कर+मुरली+रव+विजित+कूजित इन सबसे मिल कर यह बना है । कर+मुरली =‘करमुरली’ अर्थात् करगत ( हाथ में ली हुई) मुरली । ‘रव’ यानि ध्वनि। ‘वीजित’ शब्द ‘वीज्’ धातु से बना है, जिसका कोशगत (शब्दकोश में दिया हुआ) अर्थ है, पंखा झलना, पंखा करके ठण्डा करना । श्लोक के सन्दर्भ में ‘आन्दोलित करना’ इसका अभिप्रेत अर्थ है  । करमुरलीरववीजित कहने से तात्पर्य है करगत मुरली से आन्दोलित, स्पन्दित । करमुरलीरववीजित के आगे कूजित लिखा है । कूजित होता है कुकू करके मंजु-मीठे स्वर में गाना अथवा कलरव करना । इस प्रकार करमुरलीरववीजितकूजित से निष्पन्न अर्थ है कि देवी के कर में शोभित मुरली से झरती सुमधुर स्वरलहरियों से आन्दोलित हैं, दोलायमान हैं पर्वत प्रदेश के बनबाग । दूसरे शब्दों में कहा जाये तो पर्वत वन-विपिन मुरली की मीठी तान में झूम रहे हैं, अर्थात् करमुरलीरव से वीजित हो रहे हैं । यही वन-निकुंज कूजित भी हो रहे हैं  कुकू करती कोयल के कलघोष से । ‘वीज्’ धातु में पंखा करके ठण्डा करने का भी भाव है । वस्तुत: देवी की मुरली अलौकिक तान छेड़ती है जिससे मन की वृत्तियां सात्त्विक व सुशान्त हो जाती हैं । सांसारिक सुखाभासों में मन न उलझने से वह शीतलता को प्राप्त होता है । मुरलीरव से कोकिल को लज्जित होता हुआ बताया गया है, क्योंकि उसका कलकूजन, पंचम स्वर में उसकी रसाल कूक ऐहलौकिक होती है व क्षणिक आनन्द देती है ।मंजुमती अर्थात् मनोहरा । कुल मिला कर करमुरलीरववीजितकूजत लज्जितकोकिल मंजुमते पंक्ति का भावार्थ इस प्रकार है । हे मनोहरे ! तुमने अपने हाथ में जो मुरली थाम रखी है, उसका नाद अलौकिक संगीत की सृष्टि कर रहा है । मुरलीरव से झरती सुमधुर सुरलहरियों से पार्वत्य प्रदेश के वन-विटप, विपिन-वीथियां, कुंज-निकुंज मत्त हो कर झूम रहे हैं, डोल रहे हैं । इसके लोकोत्तर नाद से हे शुभे, कलघोष करती कोकिल का कूजन लज्जित हो रहा है ।

   १५वें श्लोक की द्वितीय व तृतीय पंक्ति में पार्वती के कौमार्यकाल की क्रीड़ा-स्थली रहे पर्वत व वहाँ के बर्बर व असभ्य दिखने वाले किन्तु निष्कपट व निश्छल निवासियों का चित्रण है । स्थानीय जन देवी के स्नेहभाजन हैं । पर्वत पार्श्व की पहाड़ी पहाड़ी रंगबिरंगी फूलों के खिलने से विविध मनोहारी रंगों से रंजित हो रही है । पर्वत-वासिनी माता को दूसरी पंक्ति में`रंजितशैल निकुंजगते` कह कर पुकारा गया है, अर्थात् विविध रंगों की सुरंगिमा से आच्छादित पहाड़ियों में जा कर विहार करने वाली हे देवी !  निकुंज कहते हैं लताओं व पौधों से आच्छादित स्थान को । गते शब्द गये होने का सूचक है । जो इन सुरंजित पहाड़ों पर  जाती हैं व वहां विहार करती हैं, वे हैं निकुंजगते  ।पहाड़ इसलिए रंगीन हैं कि रंग-बिरंगी पहाड़ी फूलों की छटा चारों ओर बिखर जाती है और तब पहाडियां सतरंगी सुषमा से समाच्छादित हो जाती हैं । यह विविध रंग हरे हरे तृण, लता, गुल्मों के साथ मिल कर पर्वतीय सौंदर्य को बहुगुणित कर देते हैं । रंगबिरंगी पहाड़ी फूल, वनौषधियाँ तथा तरु-पादप नयनाभिराम दृश्य उपस्थित कर देते हैं । और पर्वत-प्रदेशों की मनोरम, संकरी व सर्पिलाकार पगडंडियों पर गाते-गुनगुनाते, सरल स्थानीय जन पूरे परिदृश्य को संगीतमय और सजीव बना देते हैं । यह स्थानीय लोग पुलिन्द जनजाति के बताये गये हैं । इन रमणीय निकुंजों को ‘मनोहरगुंजित’ कहने का अभिप्राय यह है कि पर्वतीय जनों द्वारा मिलजुल कर गाये जाते हुए मीठे, मधुमय समूहगानों से गुंजायमान हैं यह शैल-निकुंज, देवी का जिन पर अतिशय अनुराग है और जहां वे जाती हैं तथा विहार करती हैं । अतः देवी को `मिलितपुलिन्द मनोहरगुंजित रंजितशैल निकुंजगते` कह कर पुकारा गया ।

प्रस्तुत श्लोक की तृतीय पंक्ति के अनुसार भगवती अपने गणों, अपने जनों से अतीव प्रीति रखती हैं । इन पहाड़ी वनों पर बसने वाले भीलजन, जिन्हें यहां कवि ने ‘महाशबरीगण’ कहा है, वस्तुत: महाशबरी जनजाति के सरल लोग हैं । पर्वत-पार्श्व की घाटी-घाटी में घूमते यह लोग देवी के अपने प्रियजन हैं, उनके अपने भूतगण हैं, जिन पर वे अत्यंत अनुरागमयी व अनुकम्पामयी हैं । यह सब निश्छल व निष्कपट लोग कृत्रिम शिष्टता से दूर आडम्बररहित जीवनयापन करते हैं । यह भोलेभाले भील सर्वसद्गुणों से संपन्न हैं ।यही वे लोग हैं, जिन्हें माता के मुरलीरव की स्वरलहरियां सुनाई देती हैं, इस तरह यह लोग सर्वसौभाग्य से भी संपन्न हैं । केलितले शब्द में केलि का अर्थ है क्रीड़ा और तल से तात्पर्य स्थल से है । पर्वत की वन-वीथियां  माँ के बाल्यकाल की क्रीडास्थली रही हैं । यहां के जीव, यहां के पत्र-पुष्प-पल्लव, प्रकृति, यहां की हरीतिमा, यहां की सुरंगिमा, यहां के कदम्ब-कुंज व उनकी मदमतत्त करने वाली सुवास, यहां का संगीत, यहां के श्रमशील व ग्राम्यजन, उनके अपने गण आदि से अम्बा अतीव प्रीति रखती हैं । उनके साथ नाचना, गाना, मोद मनाना देवी का क्रीड़ा-विलास है, जिसमें उन्हें सौख्य (सुख) मिलता है ।

इस प्रकार देवी की स्तुति करता हुआ स्तुतिकार कहता है कि  हे शुभे ! जिनकी मुरली की तान से पर्वत-प्रदेश का वनप्रांत हिल्लोरित है, कोकिल-कूजन लज्जित है, जो गुंजित-रंजित गिरि-कानन में विहार करती  हैं और पहाड़ी वनों में अपने भूतगणों के साथ आमोद-प्रमोद मनाती हैं, ऐसी हे महिषासुर का घात करने वाली, सुंदर जटाधरी गिरिजा, तुम्हारी जय हो, जय हो !

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2 comments

  1. दीपक अवस्थी says:

    प्रणाम ।

    कृपया ‘वीजित’ का अर्थ स्पष्ट करें..

    धन्यवाद.

    • Kiran Bhatia says:

      वीजित का अर्थ है आन्दोलित । माँ की मुरलीरव की सुमधुर स्वर-लहरियों से वन-विपिन आन्दोलित हैं । श्लोक १५ की व्याख्या में इसे विशद रूप से समझाया गया है । पृष्ठ का कार्य अभी प्रगति पर है ।
      इति शुभम् ।

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