महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्

श्लोक १५

Shloka 15

करमुरलीरववर्जितकूजितलज्जितकोकिलमंजुमते
मिलितमिलिन्दमनोहरगुंजितरंजितशैलनिकुंजगते ।
निजगणभूतमहाशबरीगणरंगणसम्भृतकेलितरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

करमुरलीरववर्जितकूजितलज्जितकोकिलमंजुमते
करमुरलीरववर्जितकूजितलज्जितकोकिलमंजुमते कर + मुरली + रव + वर्जित + कूजित + लज्जित + कोकिल + मंजुमते
कर = हाथ
मुरली = बांसुरी
रव = स्वर
वर्जित = परित्यक्त, छोड़ा हुआ
कूजित = कु कू की ध्वनि किया हुआ, गुंजित
लज्जित = लज्जा से युक्त
कोकिल = कोयल
मंजुमते = ( के प्रति) हे प्रीतिकर भाव रखने वाली
मिलितमिलिन्दमनोहरगुंजितरंजितशैलनिकुंजगते
मिलितमिलिन्दमनोहरगुंजितरंजितशैलनिकुंजगते मिलित + मिलिन्द + मनोहर + गुंजित + रंजित + शैलनिकुंजगते
मिलित = एक स्थान पर एकत्रित
मिलिन्द = भंवरे
मनोहर = मन हर लेने वाले
गुंजित = गुंजायमान
रंजित = रंगे हुए
शैलनिकुंजगते = हे पर्वत-प्रान्त के कुंजों में विचरण करने वाली (देवी)
निजगणभूतमहाशबरीगणरंगणसम्भृतकेलितरते
निजगणभूतमहाशबरीगणरंगणसम्भृतकेलितरते निजगण + भूत + महाशबरीगण + रंगण + सम्भृत + केलिरते
निजगण = अपने गण, जन
भूत = भूत आदि गण
महाशबरीगण = शबरी नामक एक भील-समुदाय के वन्य-जन
रंगण = नृत्य, गीत, अभिनय आदि नाट्यलीलाएं
सम्भृत = (से) युक्त, सज्जित, संपन्न
केलिरते = आमोद-प्रमोद में, क्रीड़ा में रत हे (देवी)
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि शैलसुते
महिषासुरमर्दिनी महिषासुर + मर्दिनी
महिषासुर = यह एक असुर का नाम है ।
मर्दिनी = घात करने वाली
रम्यकपर्दिनि रम्य + कपर्दिनि
रम्य = सुन्दर, मनोहर
कपर्दिनि = जटाधरी
शैलसुते = हे पर्वत-पुत्री

अन्वय

(हे) कर मुरली रव वर्जित कूजित लज्जित कोकिल मंजुमते (हे) मिलित मिलिन्द मनोहर गुंजित रंजित शैलनिकुंजगते (देवी) (हे) निजगण भूत महाशबरीगण रंगण सम्भृत केलिरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि (जय जय हे) शैलसुते ।

भावार्थ

हिमालय का पर्वत-प्रदेश देवी की क्रीड़ास्थली है ।यहां के कोकिल-कूजित वन-विपिन देवी की करगत मुरली से झर झर कर बहती स्वरलहरियों से आन्दोलित हैं और इस मिठासभरे मुरलीरव को सुन कर कोयल लज्जित हो कर नीरव हो जाती है । माता उस मौन हो जाने वाली कोकिल के प्रति प्रीतिभाव रखती हैं, (अत:उन्हें मंजुमति वाली कहा है) ऐसी हे मंजुल-मनोहर मति से संयुत देवी ! एकत्रित हुए भँवरों के मनोहर गान से गुंजरित व विविध रंगों से रंजित पार्वत्य प्रदेश के वनकुंजों में विचरणशील हे देवी, अपने भूत आदि गणों व महाशबरी आदि जनजाति के अपने भील जनों के साथ नृत्याभिनय तथा क्रीड़ा से विनोद पाती हुई हे देवी ! हे महिषासुर का घात करने वाली, सुंदर जटाधरी गिरिजा, तुम्हारी जय हो, जय हो !

व्याख्या

महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम् के पन्द्रहवें श्लोक में स्तुतिकार ने देवी को पर्वतवनविनोदिनी के रूप का चित्रण किया है । कवि ने देवी के पार्वत्य प्रदेश के वन-विपिन की तरुता (ताजगी) व सुरम्यता का रंगपूरित चित्र उकेरा है । साथ ही देवी पार्वती के सरल सहचर और उनके स्नेहभाजन, जो स्थानीय जन हैं, उनकी संस्कृति व प्रवृत्ति का परिचय दिया है ।

प्रस्तुत श्लोक की प्रथम पंक्ति में देवी पार्वती को वेणु (मुरली) की सुमधुर सुरलहरियां बिखेरते हुए चित्रित किया गया है । कवि कहते हैं करमुरलीरव अर्थात् कर-पल्लव में ली हुई मुरली का स्वर, देवी के मुरली बजाने पर जब निसृत होता है तो उस छेड़ी हुई तान व स्वर-लहरियों से कोकिल के कूजने का स्वर भी लज्जित हो जाता है, फलत: वह मुखर कोकिल मौन हो जाता है । वर्जित शब्द के संस्कृत में यह अर्थ है, छोड़ा हुआ, अलगाया हुआ, वंचित, रहित इत्यादि । मुरलीरव सुन कर नीरव हो जाना (कोकिल का) कवि की दृष्टि में उसका लज्जित हो जाना है , क्योंकि तब कोयल गात गाना छोड़ देती है । छोड़ दिया गया कल-कूजन यही अभिप्राय है वर्जितकूजित कहने से । कोयल पंचम सुर में गाती है तथा उसका गान, सभी के लिये श्रुतिसुभग (श्रुति यानि कर्ण और सुभग यानि प्रिय, अत: श्रुतिसुभग अर्थात् कर्णप्रिय)  होता है, किन्तु उसका लज्जित हो कर मौन हे जाना इस बात को सूचित करता है कि देवी की मुरली से छेड़ी हुई तान कितनी कर्ण-मधुर है ! वस्तुत: देवी की मुरली अलौकिक तान छेड़ती है जिससे मन की वृत्तियां सात्त्विक व सुशान्त हो जाती हैं । सांसारिक सुखाभासों में मन न उलझने से वह शीतलता को प्राप्त होता है । मुरलीरव से कोकिल को लज्जित हो कर कूजनरहित होता हुआ बताया गया है, क्योंकि उसका कलकूजन, पंचम स्वर में उसकी रसाल कूक, वस्तुत: ऐहलौकिक होती है व क्षणिक आनन्द देती है । मुरलीरव से झरती सुमधुर सुरलहरियों से पार्वत्य प्रदेश के वन-विटप, विपिन-वीथियां, कुंज-निकुंज सब मत्त हो कर झूमते हैं, डोलते हैं । इससे अलौकिक संगीत की सृष्टि होती है । इस लोकोत्तर रव को सुन कर कलघोष करते कोकिल का नीरव हो जाना अस्वाभाविक नहीं है । तदुपरान्त मंजुमते के संबोधन से देवी को पुकारने से तात्पर्य है कि कलघोष करती और फिर लाज से भर जाने वाली कोकिल के प्रति मंजु यानि प्रिय तथा मति यानि भाव रखने वाली, अर्थात् प्रेम का भाव रखने वाली हे देवी ! कुल मिला कर पहली पंक्ति से यह ध्वनि निकलती है कि कलरव करती और फिर मुरलीरव से नीरव होती कोकिल के प्रति स्नेह-स्निग्ध भाव रखने वाली हे मंजुमति ! तुमने अपने हाथ में जो मुरली थाम रखी है, उसके बजाने पर उत्पन्न राग अलौकिक संगीत की सृष्टि कर रहा है । 

१५वें श्लोक की द्वितीय व तृतीय पंक्ति में पार्वती के कौमार्यकाल की क्रीड़ा-स्थली रहे पर्वत व वहाँ के बर्बर व असभ्य दिखने वाले किन्तु निष्कपट व निश्छल निवासियों का चित्रण है । स्थानीय जन देवी के स्नेहभाजन हैं । पर्वत पार्श्व की पहाड़ी पहाड़ी रंगबिरंगी फूलों के खिलने से विविध मनोहारी रंगों से रंजित हो रही है । पर्वत-वासिनी माता को दूसरी पंक्ति में रंजितशैलनिकुंजगते  कह कर पुकारा गया है, अर्थात् विविध रंगों की सुरंगिमा से आच्छादित पहाड़ियों में जा कर विहार करने वाली हे देवी !  निकुंज कहते हैं लताओं व पौधों से आच्छादित स्थान को । गते शब्द गये होने का व गतिशीलता का सूचक है । जो इन सुरंजित पहाड़ों पर  जाती हैं व वहां विहार करती हैं, वे हैं निकुंजगते । पहाड़ इसलिए रंगीन हैं कि रंग-बिरंगी पहाड़ी फूलों की छटा चारों ओर बिखर जाती है और तब पहाडियां सतरंगी सुषमा से समाच्छादित हो जाती हैं । यह विविध रंग हरे हरे तृण, लता, गुल्मों के साथ मिल कर पर्वतीय सौंदर्य को बहुगुणित कर देते हैं । रंगबिरंगी पहाड़ी फूल, वनौषधियाँ तथा तरु-पादप नयनाभिराम दृश्य उपस्थित कर देते हैं । पर्वत-प्रदेश भँवरों के झुण्डों की गुनगुन करती मनोहर गुंजार से गुंजरित हैं। इसलिये इस शैल प्रदेश को मिलितमिलिन्दमनोहरगुंजित कहा है ।

प्रस्तुत श्लोक की तृतीय पंक्ति के अनुसार भगवती अपने गणों, अपने जनों से अतीव प्रीति रखती हैं । इन पहाड़ी वनों पर बसने वाले भीलजन, जिन्हें यहां कवि ने ‘महाशबरीगण’ कहा है, वस्तुत: महाशबरी जनजाति के सरल लोग हैं । पर्वत-पार्श्व की घाटी-घाटी में घूमते यह लोग देवी के अपने प्रियजन हैं, उनके अपने भूतगण हैं, जिन पर वे अत्यंत अनुरागमयी व अनुकम्पामयी हैं । यह सब निश्छल व निष्कपट लोग कृत्रिम शिष्टता से दूर आडम्बररहित जीवनयापन करते हैं । यह भोलेभाले भील सर्वसद्गुणों से संपन्न हैं ।यही वे लोग हैं, जिन्हें माता के मुरलीरव की स्वरलहरियां सुनाई देती हैं, इस तरह यह लोग सर्वसौभाग्य से भी संपन्न हैं । केलितले शब्द में केलि का अर्थ है क्रीड़ा और तल से तात्पर्य स्थल से है । पर्वत की वन-वीथियां  माँ के बाल्यकाल की क्रीडास्थली रही हैं । यहां के जीव, यहां के पत्र-पुष्प-पल्लव, प्रकृति, यहां की हरीतिमा, यहां की सुरंगिमा, यहां के कदम्ब-कुंज व उनकी मदमत्त करने वाली सुवास, यहां का संगीत, यहां के पर्वतीय स्थानीय जन, उनके अपने गण आदि से अम्बा अतीव प्रीति रखती हैं । उनके साथ नाचना, गाना,  अभिनय-चेष्टाएं आदि करके क्रीड़ा-विनोद करना देवी का मनभाता तथा भोलाभाला आमोद-प्रमोद है, जिसमें उन्हें सौख्य (सुख) मिलता है , अत: कवि ने उन्हें  रंगणसम्भृतकेलिरते कह कर संबोधित किया ।

इस प्रकार देवी की स्तुति करता हुआ स्तुतिकार कहता है कि  हे शुभे ! जिनकी मुरली की तान से , कोकिल लज्जित हो कर कूजन रहित हो गया है, जो गुंजित-रंजित गिरि-कानन में विहार करती  हैं और पहाड़ी वनों में अपने भूतगणों के साथ आमोद-प्रमोद मनाती हैं, ऐसी हे महिषासुर का घात करने वाली, सुंदर जटाधरी गिरिजा, तुम्हारी जय हो, जय हो !

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2 comments

  1. दीपक अवस्थी says:

    प्रणाम ।

    कृपया ‘वीजित’ का अर्थ स्पष्ट करें..

    धन्यवाद.

    • Kiran Bhatia says:

      वीजित का अर्थ है आन्दोलित । माँ की मुरलीरव की सुमधुर स्वर-लहरियों से वन-विपिन आन्दोलित हैं । श्लोक १५ की व्याख्या में इसे विशद रूप से समझाया गया है । पृष्ठ का कार्य अभी प्रगति पर है ।
      इति शुभम् ।

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