महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्

श्लोक १७

Shloka 17

विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक संगतारक संगतारक सूनुसुते ।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ

अपने सहस्र हाथो से देवी ने जिन सहस्र हाथों को अर्थात् सहसों दानवों को विजित किया उनके द्वारा और (देवताओं के) सहस्र हाथों द्वारा वन्दित, अपने पुत्र को सुरगणों का तारक (बचाने वाला) बनानेवाली, तारकासुर के साथ युद्ध में,(देवताओं के पक्ष में) युद्ध बचाने वाले पुत्र से पुत्रवती अथवा ऐसे पुत्र की माता एवं उच्चकुलोत्पन्न सुरथ और समाधि द्वारा समान रूप से की हुई तपस्या से प्रसन्न होने वाली देवी, हे महिषासुर का घात करने वाली सुन्दर जटाधरी गिरिजा ! तुम्हारी जय हो, जय हो !

व्याख्या

`महिषासुरमर्दिनीस्तित्रम्` के सत्रहवें श्लोक में सहस्र भुजाओं वाली देवी के दर्शन होते हैं । तीनों पंक्तियों में तीन पृथक पृथक प्रसंगों का उल्लेख है । पहली पंक्ति में देवी के सहस्र भुजा धारण कर दैत्यों के साथ युद्ध की बात कवि ने कही है। यहाँ `सहस्रकरैक` शब्द तीन बार आया है, जिसका अर्थ है सहस्र करो अर्थात हाथों से। `विजितसहस्रकरैक` का अर्थ हुआ कि जीते हुए सहस्र हाथों द्वारा अर्थात् जिन हजारों दैत्यों को विजित किया, उनके हजार-हजार हाथों द्वारा जो वन्दित हे देवी ! उसके बाद आने वाले `सहस्रकरैक` शब्द से तातपर्य है अपने हजार हाथों से, अब इन दोनों का मिला कर अर्थ होगा कि अपने हजार हाथों से जिन हजारों दैत्यों को रणभूमि में जीता, हजारों को जीता तो उन पराजित दैत्यों के हाथ भी हजारो हुए, अतः उनसे नमस्कृत। दैत्यों से त्रस्त हजारों देवतागण करबद्ध हो कर भगवती से अपनी रक्षा की प्रार्थना करते हैं, अतः `सहस्रकरैकनुते` कह कर उन्हें हजारों हाथों से वन्दित कहा गया। कुल मिला कर इस पंक्ति में स्तुति करते हुए कहा गया है कि अपने हजार करों से जीते हुए हजार-हजार करों से अथवा हजारों दैत्यों के करों से और हजारो देवताओं के करों से या देवताओं के हजार हाथों से नमस्कृत हे देवी !

durgaइस श्लोक की दूसरी पंक्ति में `संगतारक` शब्द दो बार आता है। `संग` का एक अर्थ है `साथ` और दूसरा अर्थ है `मुठभेड़` अथवा `युद्ध` । `तारक` शब्द की आवृत्ति भी तीन बार दिखाई देती है । `तारक` का एक अर्थ है तारने वाला या बचाने वाला तथा दूसरा `तारक` से `तारक नामक असुर` अभिप्रेत है, जिसे बहुधा `तारकासुर` कहा जाता है । `सुरतारक` यानि सुरगणों का रक्षक और `कृतसुरतारक` अर्थात् देवताओं का रक्षक बनाने वाली । तात्पर्य यह कि अपने पुत्र को देवताओं का रक्षक बनाने वाली । तारकासुर ने ब्रह्माजी से पाप्त वरदान के फलस्वरूप स्वयं के अवध्य होने के कारन देवों के साथ युद्ध कर, स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था । वह वरदान के अनुसार केवल शिव-पार्वती के औरस (उनके वीर्य से उत्पन्न) पुत्र द्वारा ही वध्य था और भगवान शिव उस समय सती के वियोग में संसार से विरक्त हो कर हिमालय पर तपस्या करने चले गए थे । अतः उनके सत्व (वीर्य) से पुत्रोत्पत्ति की कोई संभावना न दिख रही थी । ऐसी स्थिति में तारकासुर स्वयं को अमर मान बैठा था, क्योंकि अन्य कोई तो उसे मारने में सक्षम था नहीं । तत्पश्चात जब पर्वतराज-पुत्री पार्वती व शिवजी का विवाह होता है तब उनसे उत्पन्न उनके पुत्र कुमार कार्त्तिकेय देव-सेनापति बन कर तारकासुर से युद्ध कर के उस असुर का वध करते हैं । अतः यहाँ `कृतसुरतारक` का अर्थ है सुरों का रक्षक बनाने वाली । इसके बाद आने वाले`संगतारक` का अर्थ है `तारकासुर के साथ` और इसके बाद वाले `संगतारक` का अर्थ है `संग यानि युद्ध और तारक यानि बचाने वाला`, दूसरे शब्दों में कह जाये तो युद्ध में जीत दिलवाने वाल । `सूनुसुते` में सूनु का अर्थ है `पुत्र` और `सुता` का अर्थ यहाँ `पुत्री` न हो कर `पुत्रवाली` होगा । कुल मिल कर पूरी पंक्ति का अर्थ हुआ कि अपने पुत्र को तारकासुर-संग्राम में देवताओं का रक्षक अथवा सेनापति बना कर, युद्ध को जितवाने वाले पुत्रवाली हे देवी !

इस काव्य की तीसरी पंक्ति में राजा सुरथ और समाधि नामक कुलीन वैश्य की कथा की ऒर संकेत है । राजा सुरथ अपने शत्रु द्वारा पराजित हो कर तथा अपने मंत्रियो के विश्वासघात के कारण विरक्त हो गए थे । दूसरी ओर समाधि नामक उच्चकुल में उत्पन्न एक वैश्य अपने ढहन के लोभी स्त्री-पुत्रों द्वारा अपने ही घर से निकाल दिया गया था । शत्रुओं के भय से भयभीत राजा सुरथ और परिवार से विक्षुब्ध वैश्य समाधि वन में मिलते हैं व एक दूसरे के मित्र बन जाते हैं। इसके पश्चात् एक-दूसरे की आपबीती सुन कर सुमेधा ऋषि के आश्रम में जाते हैं, तो ऋषि उन दोनों को देवी का मंगलकारी नवाक्षरमंत्र प्रदान करते हैं। वेदोक्त विधि से भगवती चण्डिका (शिवा) की आराधना करने के लिए कहते हैं । फलतः दोनों पूजन आदि करते हैं, तथा कठोर तप भी । देवी का ध्यान लगाते हैं और अंततः देवी प्रसन्न हो कर दोनों को दर्शन दे कर कृतकृत्य करती हैं । यहाँ कहां गया है कि राजा सुरथ की तथा (वैश्य) समाधि की समाधी समान थी, समान रूप से दोनों ने ध्यान लगाया था । सुजात का अर्थ है उच्चकुलोत्पन्न व्यक्ति । स्तुतिकार देवी को सम्बोधित करता हुआ कहता है कि राजा सुरथ और वैश्य समाधि दोनों ऊंचे कुल के भद्र व्यक्ति थे । दोनों के समान रूप से किए जाने वाले तप से प्रसन्न होने वाली हे देवी, हे महिषासुर का घात करने वाली सुन्दर जटाधरी गिरिजा ! तुम्हारी जय हो, जय हो !

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