महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्

श्लोक २०

Shloka 20

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ

तुम्हारा मुख-चन्द्र, जो निर्मल चंदमा का सदन है, सचमुच ही सभी मल-कल्मष को किनारे पर कर देता है अर्थात् दूर कर देता करता है । इन्द्रपुरी की चंद्रमुखी हो या सुन्दर आनन वाली रूपसी, वह (तुम्हारा मुख-चन्द्र) उससे (अवश्य) विमुख कर देता है । हे शिवनाम के धन से धनाढ्या देवी, मेरा तो मत यह है कि आपकी कृपा से क्या कुछ संपन्न नहीं हो सकता । हे महिषासुर का घात करने वाली सुन्दर जटाधरी गिरिजा ! तुम्हारी जय हो, जय हो !

व्याख्या

`महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्` के बीसवें श्लोक में कवि देवी की स्तुति करता हुआ कहता है कि तुम्हारा मुख-चन्द्र निर्मल चन्द्रमा का घर है, अर्थात् रूप, सौंदर्य, उज्जवलता, निर्मलता एवं शीतलता का आगार (घर) है, चन्द्र के सभी गुणों और कलाओं का आगार है । ऐसा यह मनोरम मुख देवी के कृपापात्र को इन्द्रलोक की इंदुमुखी, सुमुखी रूपसियों से क्या विमुख नहीं कर देता ? अर्थात् उनसे पराङ्गमुख (विमुख) कर देता है । कवि कहता है कि मेरा तो यह मानना है कि आपकी कृपा के बल से, हे शिवनाम के धन से धनाढ्या देवी, क्या क्या नहीं हो सकता ? हे महिषासुर का घात करने वाली सुन्दर जटाधरी गिरिजा ! तुम्हारी जय हो, जय हो !

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