महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्

श्लोक २१

Shloka 21

अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ

दीनों पर सदैव दयालु रहने वाली हे उमा, अब मुझ पर भी कृपा कर ही दो, (मुझ पर भी तुम्हें कृपा करनी ही होगी) । हे जगत की जननी जैसे तुम कृपा से युक्त हो वैसे ही धनुष-बाण से भी युक्त हो, अर्थात् स्नेह व संहार दोनों करती हो । जो कुछ भी उचित हो यहाँ, वही आप कीजिए, हमारे ताप (और पाप) दूर कीजिए, अर्थात् नष्ट कीजिए । हे महिषासुर का घात करने वाली सुन्दर जटाधरी गिरिजा ! तुम्हारी जय हो, जय हो !

व्याख्या

`महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्` का यह इक्कीसवां और अंतिम श्लोक है । पाप-ताप नष्ट करने वाली जगज्जननी से स्तवन करता हुआ स्तुतिकार कहता है कि हे उमा ! तुम सदा दीनों पर दया करती हो । मुझ पर भी अब कृपा कर दो । जो कुछ और जैसा मेरे लिए करणीय है, वह कर दो। वस्तुतः भक्त सदैव स्वयं को दीन समझता है । कवि कहता है कि तुम स्नेहमयी भी हो और रोषमयी भी हो । कवि की यह उक्ति सर्वशः सत्य है, क्योंकि भगवती कृपामयी भी व कोपमयी भी हैं । वह विनती करते हुए कहता है कि मेरे हेतु क्या उचित है, वह मुझे आदेश दे कर आप बताइये और मेरे ताप, मेरे संताप को दूर कीजिए । हे महिषासुर का घात करने वाली सुन्दर जटाधरी गिरिजा ! तुम्हारी जय हो, जय हो !

–समाप्त —
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32 comments

    • Kiran Bhatia says:

      अनुवाद एवं चित्रांकन को पसंद करने तथा उत्साहवर्धन करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।

  1. Kedar Prasad says:

    मैं काफी दिनों से महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम् का हिन्‍दी अर्थ तलाश रहा था, अब मेरी तलाश पूरी हुई। मुझे ना सिर्फ अर्थ ही मिला बल्कि इतनी स्‍पष्‍ट व्‍याख्‍या भी मिली, जो मैं सोच भी नहीं सकता था। आपका बहुत बहुत धन्‍यवाद, आभार।

    • Kiran Bhatia says:

      आपका बहुत बहुत धन्यवाद, पढ़ने एवं पसन्द करने के लिये साथ ही मेरा उत्साह-वर्धन करने के लिये भी । आपके लिखे गये दो शब्द मेरे लिये बहुत मूल्यवान हैं । इति शुभम् ।

  2. Bhavesh says:

    Very nice and noble work done by you. We have team of youth having music composing and recording facility. If you support, we can make your creativity more reachable and attrective for common man. Kindly give your contact. My no. 07574850913

    • Kiran Bhatia says:

      Dear Bhavesh,

      I work in the humble hope that it will benefit someone, and as such all the work on this site is open for reuse by anyone.

      There’s no permission required ! I hope that your efforts make our heritage accessible to more people.

      And a humble thanks for considering this work worthy of your project.

      With Regards,
      Kiran Bhatia

      • Bhavesh says:

        Thank you for your permission. We will keep everything accessible, our objective is to contribute for our great ancient culture.

        Will keep in touch.

  3. Vinay says:

    मैंने ऐसे स्तोत्रों के लिए एंड्रॉइड ऐप बनाना शुरू कर दिया है और मुझे आपकी रचनाओं से अनुमति और सहायता की भी आवश्यकता है।

    • Kiran Bhatia says:

      हमारी प्राचीन व गौरवमयी संस्कृति के सेवार्थ किये गए किसी भी कार्य के लिए आपको अनुमति की आवश्यकता नहीं है । सहर्ष यथोचित सहायता भी उपलब्ध कराई जाएगी । इति शुभम् ।

  4. रवि कुमार says:

    आपका यह कार्य बहुत ही हमारे लिये बहुत ही प्रेरणाप्रद और लाभकारी है, इसके लिए आपको कोटि कोटि शुभकामनाएं।

    • Kiran Bhatia says:

      आपका स्वागत है । धन्यवाद , रवि कुमारजी । इति नमस्कारान्ते !

  5. Ram says:

    🌺क्लीं🌺
    अत्यंत गम्भीर,भावपूर्ण व् सटीक शब्दों को प्रकट करने के लिए हृदय से आभार 🙏
    अगर कोई प्रिंट कॉपी उपलब्ध है तो ज़रूर बतलायें
    officeramgovinddas@gmail.com

    • Kiran Bhatia says:

      आपने पढ़ा और कार्य की सराहना करके मेरा उत्साह-वर्धन किया, इसके लिए आपका धन्यवाद । अभी यह सामग्री केवल ब्लॉग पर ही उपलब्ध है ।
      इति शुभम् ।

  6. कमलेश रविशंकर रावल says:

    अब कह सकता हूँ कि साहित्य के नौ रस ईस प्रसिद्ध रचना में झलकते हैं, आप ने अपने भावानुवाद तथा व्याख्या के माध्यम से आज पूरा दिन मूझे माँ के गुणगान और महत्ता समझने के लिए प्रेरित किया, सर्वे लोका: सुखिनाः भवन्तुः
    माँ के चरणों में नत मस्तिष्क होते हुए आप का पुनः साधुवाद

    • Kiran Bhatia says:

      अकारणकरुणावरुणालया माँ के चरणों में उन्हीं का कृपा – प्रसाद अर्पित है। उनके उपासक मेरे लिए सम्मान्य हैं । कृपया सेवा का अवसर दें । धन्यवाद ।

  7. संदीप कुमार says:

    “वैसे ही धनुष-बाण से भी युत हो” के स्थान पर “वैसे ही धनुष-बाण से भी युक्त हो” लिख कर त्रुटि को दूर करें।

  8. Nandini kashyap says:

    Dear kiran bhatia ji,
    One fine day, i suddenly got a thought in my mind to learn mahishasuramardhini stotram with meaning. I searched for it everywhere but could not find satisfactory results. I prayed to devi maa to give me a guru who can explain me this stotram. And on the same day i found the translation of this stotram by you. I was literally amazed your translation seemed like a guru explaining me. You are blessed, devi maa herself chose you to convey the meaning of this great stotram! I would be your obliged throughout my life gurumaa🙏🙏

    • Kiran Bhatia says:

      Dear Nandiniji, I have yet to learn a lot. Divine Mother always blesses her children. Each one of us is blessed , only if one realises it . You are so fortunate and pure that you could connect to her. Divine Maa is aadiguru and gurumaa. Jai Mata di. Thank you .

  9. दीपक says:

    कृपया ‘तथानुमितासिरते’ और ‘भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते’ का संधि विच्छेद करने की कृपा करें..

    • Kiran Bhatia says:

      भवती + उररी + कुरुतात् + उरु + तापम् + अपाकुरुते= भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते ।

      • Kiran Bhatia says:

        ऊपर दे दिया है । उर नहीं, उरु है, जिसका अर्थ है बड़ा , महान् । अत: उरुतापम् का अर्थ हुआ बड़ा अथवा महान् दुख ।

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