अदृष्ट से अभिसार

सूर्योदय प्रकाश व प्रवृत्ति का समवाय
बीजगर्भ से फूटता नवांकुर समुदाय
रवि-चंद्र नभ में साथ रुकते पंक्तिवार
उदय-अस्त के पर्व का चारु चमत्कार ।

सेवा-निवृत्त वृद्ध-सा है क्षीण अन्धकार
किशोर किरणों का है रागारुण प्रसार
चहुँ ओर प्रकृति का सौंदर्य-सम्भार
पक्षी-बोलियों का मीठा रव संचार

चटक-दंपत्ति का युगपत् प्रात-व्यापार
सुनाई पड़ता है पारावतों का घूत्कार
मिलिन्द-जोड़े हैं करते गुनगुन गुंजार
सर्र सर्र वात में झूली लता लहरदार

हरितोद्यान बैठे हैं मित्र मण्डलाकार
करते भजन धुन गायन मन्त्रोच्चार
व्यायाम हास वार्ता मुद्रा प्राण-व्यापार
अस्मिता से जोड़ती है ध्यान की धार


श्रवणपथ को सींचती हो सुधाधार
ऐसे सुधीर स्वर में संयत सूत्रधार
लयान्वित करवा श्वासों के तार
पहुंचाता न जाने कहां किस पार

चल पड़ती हूं प्रश्वास-पुल से उस पार
हे अदृष्ट! तुम्हारा करने मैं अभिसार
तुम्हारे पद्मगंधी पथ पर करके विहार
भूली-भ्रमी मैं लौटती हूं होकर निर्भार

मार्ग अवरुद्ध करते हैं शिवशिवेतर भाव
वरद सिद्ध होते हैं पर मुझे मेरे अभाव
सत्र-समाप्ति घोष करता है ओम-उच्चार
कर्म में प्रवृत्त होने की समय की पुकार ।

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