भोग और जीवन

 

टप टप कर रीतता गया जल
माटी की मटकी चटक गई
कभी सुध से जीव न जीवन जिया
काल-कपालिनी आकर झटक गई
जान न पाया मदोन्मत्त मूर्च्छित
कब सुरा ही सुराही गटक गई !

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4 comments

  1. mahim says:

    आपके इस वेब पृष्ठ पर बने चित्र का आशय क्या है ?

    • Kiran Bhatia says:

      ` माटी की मटकी `से तात्पर्य हमारे जीवन से है और वेबचित्र में टूटा हुआ पात्र किसी भी समय जीवन रुपी पात्र के टूट जाने की अर्थात् क्षणभंगुर जीवन के अंत हो जाने की संभाव्यता को दर्शाता है ।
      इति शुभम् ।

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