भोग और जीवन

 

टप टप कर रीतता गया जल
माटी की मटकी चटक गई
कभी सुध से जीव न जीवन जिया
काल-कपालिनी आकर झटक गई
जान न पाया मदोन्मत्त मूर्च्छित
कब सुरा ही सुराही गटक गई !

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