हरसिंगार

शरद ऋतु की भीगी भोर
हरी दूब ओस से सराबोर
हरसिंगार छिटके सब ओर
पुलकित प्रकृति का पोर-पोर

हेमाभ- पीत पुष्पनाल पर
सितकलिका के स्फुटित अधर
तरु के एक ही मंद स्मित पर
बिखर पड़ते फूल झर-झर -झर

उपवन में मनमानी करने
अठखेली अनजानी करने
ऊषा की अगवानी करने
क्वार की सुबह सुहानी करने

बिछ जाते सौरभदूत धरा पर
खिले खिले रहते प्रभात भर
चढ़ाये जाते यह शिवलिंग पर
मुदित रहते हैं महादेव हर हर

इतर पुष्पों का पतित अम्बार
होता पूजा में निषिद्ध हर बार
पर धूळ -धूसरित भी हरसिंगार
सजाता शिव को है वार-प्रतिवार

शिव करुणा के पारावार
है करवाते इनसे श्रृंगार
पा कर हर की प्रीति अपार
यह फूल कहलाता हरसिंगार

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4 comments

  1. I like this poem very much. :) May be because harsingar flowers are one of my favorite flowers.
    Very interesting blog. All the photos are very beautiful. Thanks for sharing. :)
    Regards,
    Chandrika Shubham

  2. सुरेन्द्र वर्मा says:

    सभी रचनाओं में आपका वैशिष्ट्य दृष्टव्य है… पठन मात्र से गम्य नहीं हो पाती….समय मिलने पर विचारणीय हैं. सहसा नीरज की पंक्तियाँ स्मरण में आती हैं:
    शब्द तो शोर है, तमाशा है, भाव के सिन्धु में बताशा है,
    मर्म की बात होंठ से न कहो, मौन ही भावना की भाषा है.
    अस्तु. हरसिंगार (अब तक हम इसे हारसिंगार कहते आये हैं) कविता से जान पड़ता है कि भूमि पर गिरे ये पुष्प शिवजी को चढ़ाए जाते हैं….अभी तक मात्र तुलसीदल के बारे में ही ऐसा ज्ञात था. हम सूर्योदय से पूर्व शाखाओं से चयन करते हैं, अधिक मात्रा की आवश्यकता हो तो उचित स्थान पर रात में ही स्वच्छ चादर तरु के नीचे बिछा कर हरसिंगार प्राप्त कर लेते हैं! गोपाल सेवा में भी ये पुष्प अभीष्ट हैं.

    • Kiran Bhatia says:

      `भावसिंधु में शब्द` को` बताशा ` बताने वाली आपकी अभिव्यक्ति सुन्दर व सटीक है । भगवान् हर को प्रिय होने से यह पुष्प `हरसिंगार`कहलाता है । प्रचलित नाम `हारसिंगार` ही है। धन्यवाद।

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