जिजीविषा

 

दुर्गम वन में
कठोर शिलाओं के मध्य
भी पनप जाते हैं
तृण वीरुध एकाकी अकिंचन
अपालित अनाश्रित
कभी नीर-वात-वर्द्धित
कभी निर्वात-वर्द्धित
प्रचंड लू के थपेड़े
झंझा के झोंके
वर्षा के झकोरे
अनवरत झेले
पनपते जो चले
बिन उलाहना दिए
जीने की चाहना लिए
समर्पित रहे कर्म में दक्ष
अपनी जिजीविषा के समक्ष !
वे सत्य के प्रकाशक हैं
इस सन्देश के संवाहक हैं
कि नहीं उनका कुछ बिगड़ता-बिगडाता
जिसका पालक हो स्वयं विधाता I

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2 comments

  1. जिजीविषा को सम्पूर्ण रूप से अभिव्यक्त किया है। जीवन स्वमार्ग स्वयं ही प्रशस्त कर लेता है। सुन्दर कविता। शुभकामनायें।

    • Kiran Bhatia says:

      मान्यवर , आपका भूरिशः धन्यवाद । इति शुभम् ।

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