प्रिय कुसुम ! तुम.. !

बचे थे फाल्गुन आने में दिन दो चार
कैसी आई यह बहार अबकी बार
मैत्री-कानन में सखि ! हाथ तुम्हारा छूट गया
था सुरभित जिससे वह ‘कुसुम’ शाख से टूट गया
तुम नित्य कृष्ण को भोग लगातीं नया नया
कृष्ण ने घर पर ही अपने तुम्हें बुला लिया
तुम्हारी विदाई ने बहुत रुलाया है मुझे
जा सकता नहीं कभी भी भुलाया तुम्हें
तुम्हारे गुण देख मैं अचम्भित होती थी
बहती गुण-गंगा में कभी हाथ भी धोती थी
हतप्रभ रह जाती तुम्हारी निष्ठा देख
साथ अल्प रहा ,यह रही भाग्य-रेख
तुमसे आस्था का नया छोर मिला था
जीवन-डगर को नया मोड़ मिला था
प्रतिभा नूतन युग की , पुरातन के संस्कार
मोह लेता था तुम्हारा निष्कपट व्यवहार
तुम थीं जैसै पूरी की पूरी स्मित की बनी
हाय ! बालक-सी थीं तुम निश्छल, सजनी !
चिरनिद्रा में सोई सखि ! तुम्हें साश्रुनयन
अर्पित हैं श्रद्धा सुमन, यह मेरे भाव-स्पन्दन ।

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2 comments

  1. सुरेन्द्र वर्मा says:

    वेदना को सीमा में बाँधने का सशक्त पर निष्फल प्रयास… सहना ही होता है…

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