उल्का

ulka

उल्काओं का नियमित नर्त्तन अंतरिक्ष की रंगशाला में
भूपथ पर विखण्डित होता है विनाश की महाज्वाला में
सर्पिल भीम जटाओं का जंगल गह्वर कहीं गरजता है
तीसरे नेत्र की अंगार-अंगुली से मुण्डमाली बरजता है

विस्फोट पृथ्वी पर है तो भू पर ही है प्राण-भण्डार
जहाँ उपल हैं टूटते वहीँ पर उपलब्ध भी हैं उपचार
हिमरेखा कैलाश की है परिपूरित प्रचुर वरदानों से
मानस के राजहंस गाते हैं गान उन्मुक्त उड़ानों से ।

← शर-कान्तार अनुक्रमणिका आराध्या →

Leave a Reply

Your email address will not be published.