शिवसंकल्पसूक्त

श्लोक ३

Shloka 3 Analysis

यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु ।
यस्मान्न ऋते किंचन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।।

अन्वय

यत् प्रज्ञानं चेतः उत धृति च यत् प्रजासु अन्तः अमृतं ज्योतिः यस्मात् ऋते किंचन कर्म न क्रियते तत् में मनः शिवसंकल्पं अस्तु ।

सरल भावार्थ

जो मन प्रखर ज्ञान से संपन्न, चेतना से युक्त्त एवं धैर्यशील है, जो सभी प्राणियों के अंतःकरण में अमर प्रकाश-ज्योति के रूप में स्थित है, जिसके बिना किसी भी कर्म को करना संभव नहीं, ऐसा हमारा मन शुभ संकल्पों से युक्त हो !

व्याख्या

शिवसंकल्पसूक्त के तृतीय मन्त्र में ऋषियों का कथन है कि मन प्रखर ज्ञान से संपन्न है । वस्तुतः वह मन ही है जो लौकिक व अलौकिक बातों का ज्ञान रखता है, ग्राह्य व त्याज्य का निर्णय लेता है । स्वस्थ मन ही ईश्वर से `असदो मा सद्गमय मृत्योर्मा अमृतगमय` की प्रार्थना करता है । वैदिक ऋषि मन्त्रों के द्रष्टा होते थे । प.श्रीराम शर्मा आचार्य का कथन है कि “प्रत्येक पदार्थ और विधान के जड़ तथा चेतन दो विभाग होते हैं । आत्मज्ञानी पुरुष मुख्यतः प्रत्येक पदार्थ में चेतन शक्ति को ही देखता है, क्योंकि वास्तविक कार्य और प्रभाव उसीका होता है।” उनके अनुसार फलतः वैदिक ऋषि वेद के मन्त्रों एवं उनकी शक्ति को चेतना से अनुप्राणित मानते थे तथा प्रकृति की संचालक शक्तियों को देवता मान कर उनसे प्रार्थना करते थे, उनकी स्तुति करते थे । यह उनका अंधविश्वास नहीं उनका उत्कृष्ट कोटि का ज्ञान था, जो जड़ में अवस्थित चेतन के दर्शन कर लेता था । सूक्ष्म से सूक्ष्म पदार्थ की मूलभूत शक्ति व उनके कार्योंके वैज्ञानिक रहस्य इन ऋषियों के ज्ञानचक्षुओं के आगे प्रकट होते थे । उन्होंने स्तुति प्राकृत शक्तियों के स्थूल रूप की नहीं अपितु उनकी शासक अथवा अहिष्ठात्री चेतन शक्ति की है। वेदों में आध्यात्मिक विषयों का और अथर्ववेद में विविध प्रकार की व्याधियो के निवारण के उपाय, औषधियों और मन्त्र-तंत्र का विधान है और इन सबको इसमें देवता माना गया है । इनके मन्त्र गूढ़ार्थ लिए हुए होते हैं । बिना आत्मज्ञान के इन्हें हृदयंगम नहीं किया जा सकता ।

gurukulवस्तुतः पदार्थ में निहित चेतन शक्ति उन्हीं के सम्मुख सक्रिय होती है जो निर्मल मन से पूरी तरह निजी स्वार्थ से या अन्य मनोविकार से अलिप्त रहते हैं तथा जो `आत्मवत् सर्वभूतेषु` के भाव से सब में एक ही चैतन्य शक्ति के दर्शन करते हैं । ऐसे महान ऋषियों के आश्रम के निकट रहने-बसने वाले, वहां घूमने वाले हिंस्र पशु भी अहिंसक हो जाते थे । वैदिक ऋषि जानते थे कि शरीर की शक्ति से मन की शक्ति अनेक गुनी अधिक है । यही कारण है कि इस मन्त्र में मन को प्रखर ज्ञान, चेतना व धृति से युक्त कहा गया है । धृति का अर्थ केवल धैर्य ही नहीं अपितु स्थैर्य भी है । इस शब्द में स्फूर्ति, दृढ संकल्प, साहस तथा सहारा देने के भाव भी समाहित हैं । अतएव इसका संकुंचित अर्थ न लेकर इसे विस्तृत परिप्रेक्ष्य में देखना अपेक्षणीय है । आगे इस मंत्र में कहा गया है कि यह मन सब में अमर-ज्योति के रूप में स्थित है । यह चेतना ऋषियों ने सभी में पायी है। यही कारण है कि जगत के सर्वप्रथम आदि कवि वाल्मीकि एक दुर्दांत डाकू से मुनि बन गए, महामूर्ख कालिदास महाकवि के रूप में उभर कर आये । यह चेतना मनुष्य के भीतर निहित वह अमर ज्योति है जिसके बिना कुछ भी कर पाना सम्भव नहीं है । ज्ञान जो सब के भीतर ढंका हुआ है, वह मन के द्वारा प्रकशित किये जाने के कारण मन को अमर-ज्योति कहा है । सब के अंतःकरण में जलती हुई भी यह ज्योति केवल वहीँ अपना आलोक बिखेर सकती है, जहाँ मन मल से रहित हो, अमल हो, निर्मल हो । रामचरितमानस में श्रीराम विभीषण से ये कहते हैं कि

निर्मल मन जान सो मोहि पावा । मोहि कपट छल छिद्र न भावा ।।

गोस्वामीजी मानस में जानकीजी से निर्मल मति प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं ।

जनकसुता जगजननी जानकी । अतिसय प्रिय करुणानिधान की ।।
ताके जुग पदकमल मनावउं । जासु कृपा निर्मल मति पावउँ ।।

इस प्रकार मन की पावनता और निर्मलता पर बल दिया गया है भारतीय संस्कृति में सर्वत्र । क्योंकि यह प्रकृष्ट ज्ञान का साधन है । ऋषि कहते हैं की ऐसा हमारा मन श्रेष्ठ और कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो !

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