शिवसंकल्पसूक्त

श्लोक ६

Shloka 6 Analysis

सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेsभीशुभिर्वाजिन इव ।
हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।।

अन्वय

यत् मनुष्यान् सुषारथिः अश्वानिव नेनियते अभीशुभिः वाजिन इव यत् हृत्प्रतिष्ठं अजिरं जविष्ठं तत् मे मनः शिवसंकल्पं अस्तु ।

सरल भावार्थ

लगाम के नियंत्रण से घोड़ों को संचालित करके गंतव्य तक ले जाने वाले कुशल सारथी की भांति सधा हुआ मन मनुष्यों को लक्ष्य तक पहुंचाता है । मन अतिस्फूर्तिवान् व सर्वाधिक वेगवान् अश्व की भांति होता है , ऐसा तेज और द्रुतगामी मन,  जो ह्रदय-प्रदेश में स्थित है, वह हमारा मन  श्रेष्ठ व कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो ।

व्याख्या

शिवसंकल्पसूक्त के षष्ठ मन्त्र में ऋषियों ने मन को उत्तम सारथी की उपमा दी है । एक कुशल सारथी हाथ में वल्गाएं ले कर अपने तीव्र वेगगामी अश्वों को भलीभांति अपने नियंत्रण में रखता है और वे अश्व उसीकी निर्धारित दिशा में अपनी द्रुत गति से दौड़ते हैं । सारथी का मनोरथ होता है निज लक्ष्य तक पहुँचना । अश्व उपकरण हैं, उसे पहुँचाने के लिए, और वे वही भूमिका निभाते हैं । यह स्थिति आदर्श है, जो वल्गा थामे हुए सारथि को उसका इष्ट गंतव्य देती है । लेकिन कहीं स्थिति इसके विपरीत हो जाये तथा अश्व सारथी के आदेश को न मान कर स्वेच्छा से सरपट दौड़ने लगें तो सारथी की बहुत दुर्गति कर सकते हैं, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। अतः अपनी प्रार्थना में ऋषिगण मन को एक कुशल सारथी के रूप में देखते हुए कहते हैं कि जो मन वल्गा (लगाम) थामे, अति वेग से दौड़ते हुए अश्वों को उत्तम सारथी की भांति, मनुष्यों को उनके शुभ गंतव्य तक ले जाता है, ऐसा हमारा मन शुभ संकल्पों से युक्त हो । ध्यातव्य है कि यहाँ मन को उत्तम या श्रेष्ठ सारथी कहा है, जिससे अभिप्राय है कि उसके अश्व उसके द्वारा सुप्रशिक्षित हों और उसके द्वारा वल्गाएं (लगाम) थामते ही उसकी इच्छानुसार निर्दिष्ट मार्ग पर अपनी द्रुतगामी गति से चलने के लिए तत्पर रहें ।

Cosmic-Flowछठे मन्त्र में मन को ज़रारहित व अतिवेगशील भी कहा है । वस्तुतः जिस पदार्थ में अतिशय आसक्ति होती है, मन वहीँ वेग से ले जाता है । योग तथा अभ्यास से यदि मन सधा हुआ न हो तो मनुष्य को बड़ी द्रुत गति से वह विषयों के अति मोहक मार्ग पर भटका कर कर्त्तव्य से च्युत कर सकता है । और समुचित रूप से सधा होने पर सन्मार्ग पर चलते हुए मनुष्य के सम्मुख कुछ भी असम्भव नहीं रहने देता । यही मन तप के लिए पर्वत की कंदराओं में तथा परमार्थ के लिए सुदूर सात समुद्रों के पार भी ले जाता है । ऋषियों ने इस मन को जरारहित अर्थात् सदा युवा रहने वाला भी बताया है । महाराज भर्तृहरि ने अपने वैराग्यशतक में अंतहीन तृष्णाओं से घिरे मनुष्य की दयनीय अवस्था का चित्रण करते हुए कहा है-

भोगा न भुक्ताः वयमेव भुक्ताः तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः ।
कालो न यातो वयमेव यातास्तृष्णा न जीर्णो वयमेव जीर्णाः ।।

इसका भावार्थ यह है कि भोगों को हम नहीं भोगते, भोग ही हमें भोगते हैं, हम स्वयं ही (उन भोगों द्वारा) भुक्त हो जाते हैं, तप नहीं तपता, तप तो हम जाते हैं, काल नहीं बीतता, हम बीत जाते हैं, तृष्णाएं जीर्ण अथवा बूढी नहीं होतीं, हम ही जीर्ण या बूढे हो जाते हैं । उनका भी यही मानना है कि तृष्णाएं सदा युवा रहती हैं । जिस चंचल मन में इन तृष्णाओं का जन्म होता है वह सदा वीर्यवान् रहता है । विषय उसे अपनी ओर आकर्षित करते हैं, तथा वह तृप्ति के साधन जुटाता हुआ अतृप्ति में ही डूबा रहता है । इसीसे मन को जरारहित कहा है, जरा का अर्थ है बुढ़ापा ।

यदि लगाम ढीली छोड़ दी जाये तो, घोड़ा अपने सवार को गिरा सकता है या उसे भटका सकता है । अतः कुशल सारथि लगाम कस कर रखता है । विवेकशील जन मन को वश में रखते हैं व विवेकहीन, मंदबुद्धि मन के ही वशवर्ती हो जाते हैं । मन को नियंत्रण में रखने वाला ही वास्तव में कुशल, प्रवीण या उत्तम सारथी है । दूसरे शब्दों में सधा हुआ, विवेकशील मन ही प्रवीण सारथी है, क्योंकि मन में जो संकल्प उठ जाते हैं, उनसे मन को वियुक्त करना कठिन व दुःसाध्य होता है, वह सही दिशा में ले जाये, उसीमें जीवन का श्रेय है, अन्यथा अधोगति भी वही मन करता है। जैसे अनियंत्रित व अप्रशिक्षित अश्व अपने सवार को नीचे गिरा देता हैं, वैसे ही अनियंत्रित और स्वेच्छाचारी मन मनुष्य को पतन के गर्त्त में गिरा देता है । ऐसा मन काम्य नहीं हैं । अतएव ऋषि कुशल सारथी के उपमान द्वारा सधे हुए मन का वरण करते हुए कहते हैं, कि हमारा मन श्रेष्ठ और कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो ।

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14 comments

  1. Govind Deshpande says:

    Actually shivsankalpa sukta should be compulsory in our education systm right from childhood to higher education.

  2. ललित जोशी says:

    कोटिशः धन्यवाद्।।
    अद्भूत है, अतुल्य है, इन मंत्रों से मनुष्य जीवन में सत्य को पाता है, सफलता पा सकता है।
    ओर जीवन का सही मूल्य जान सकता है।
    किरण जी आपको पुनः साधुवाद।।🙏

    • Kiran Bhatia says:

      आदरणीय ललित जोशीजी, आपका बहुत बहुत धन्यवाद । इन मन्त्रों की महिमा सचमुच ही अद्भुत् और अवर्णनीय है । । उत्तर में विलम्ब के लिए क्षमाप्रार्थी हूं ।
      इति नमस्कारान्ते ।

  3. Vandana Ruhela says:

    महोदया नमस्कार!
    बहु शोभनं कायं कृतमस्ति भवत्या।
    अभिनन्दनानि साधुवादाश्च। 🙏🙏

    • Kiran Bhatia says:

      भवती संस्कृतानुरागिनी अस्ति । आनन्दं अनुभवामि । अनुग्रहीतास्मि । इति नमस्कारांते ।

  4. डॉ.आर.ए.एस. चौहान says:

    व्याख्या उत्तम लगी।
    इस मंत्र में अश्वानिव है और आगे वाजिन इव,अश्व और वाजी समानार्थी हैं,क्या यह पुनरुक्ति है या विशेष प्रयोजन?

    • Kiran Bhatia says:

      प्रस्तुत मन्त्र में ‘ अश्वानिव  ‘ तथा ‘ वाजिन इव ‘ शब्दों में निरर्थक पुनरुक्ति नहीं है । दोनों के सन्दर्भ अलग हैं । कृपया ‘ सरल भावार्थ ‘ को पुनः एक बार देख लें, क्योंकि आपकी शंका ( जोकि बिलकुल सही है } को दृष्टि में रखते हुए भावार्थ को और भी सरल व स्पष्ट बना कर मैनें दुबारा लिख दिया है । यदि अब भी शंका हो तो , उसका निवारण करने में मुझे प्रसन्नता होगी । इति शुभम् । 

    • Kiran Bhatia says:

      मान्यवर , मैं समझ नहीं पाई , आप किसका सही उच्चारण चाहते हैं । व्याख्या पसंद करने के लिए आपका धन्यवाद । इति शुभम् । 

  5. Surya Prakash Rawal says:

    I have just read your excellent commentary on Shiv Sankalapa Suktam. You have beautifully explained the Suktam quoting profusely from Bhagavada Gita, Upanishads, Bharathari, Ramcharitmanas etc. That shows you are a prolific reader and well versed in all important scriptures. My pranams to you!

    • Kiran Bhatia says:

      Shree Surya Prakash Rawalji, thanks for liking the व्याख्या । In fact I have not read महाराज भर्तृहरि का वैराग्य शतकम् । But the shlok given in व्याख्या is well known . My regards to you too.
      इति नमस्कारान्ते ।

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