शिवमहिम्नःस्तोत्रम्

श्लोक १३

Shloka 13 Analysis

यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सती-
मधश्चक्रे बाण: परिजनविधेयत्रिभुवन: ।
न तच्चित्रं तस्मिन् वरिवसितरि त्वच्चरणयो-
र्न कस्याप्युन्नत्यैभवति शिरसस्त्वय्यवनति: ।। १३ ।।

यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सती-
यदृद्धिम् यत् + ऋद्धिम्
यत् = जो (अपने वैभव से)
ऋद्धिम् = ऐश्वर्य को, वैभव को
सुत्राम्ण: = इन्द्र के
वरद = हे वर देने वाले (भगवन्)
परमोच्चैरपि परम + उच्चै: + अपि
परम = सबसे अधिक
उच्चै: = बढ़े-चढ़े
अपि = भी
सतीम् = हुए
-मधश्चक्रे बाण: परिजनविधेयत्रिभुवन:
(पहली पंक्ति के अन्तिम शब्द सतीम् का म)
-मधश्चक्रे अध: + चक्रे
अध: = नीचा
चक्रे = कर दिया
बाण: = बाण नामक असुर ने, बाणासुर ने
परिजनविधेयत्रिभुवन परिजन + विधेय + त्रिभुवन
परिजन = दास
विधेय = की तरह
त्रिभुवन: = तीनों लोक, ( त्रिलोकी को दास की तरह अपने अधीन रखने वाले बाणासुर ने)
न तच्चित्रं तस्मिन् वरिवसितरि त्वच्चरणयो-
= नहीं
तच्चित्रं तत् + चित्रम्
तत् = यह
चित्रम् = आश्चर्य (की बात)
तस्मिन् = इसमें
वरिवसतरि = पूजा करने वाला, प्रणामशील
त्वच्चरणयो: = आपके चरणों में
र्न कस्याप्युन्नत्यैभवति शिरसस्त्वय्यवनति:
र्न = ( पिछली पंक्ति के अंतिम शब्द का आधा भाग) नहीं है
कस्याप्युन्नत्यैभवति कस्यै + अपि + उन्नत्यै + भवति
कस्यै = किसकी
अपि = (अर्थ पर बल देने के लिये यह शब्द प्रयुक्त हुआ है) किसकी उन्नति नहीं होती है ?
उन्नत्यै = उत्कर्ष के लिये
भवति = होती है
शिरसस्त्वय्यवनति: शिरस: + त्वयि + अवनति:
शिरस: = शीश का
त्वयि = आपके आगे, आपके चरणों में
अवनति: = झुकना (नमस्कार-वन्दना करने के लिये)

अन्वय

(हे) वरद ! परिजन विधेय त्रिभुवन: बाण: परम उच्चै: सतीम् सुत्राम्ण: ऋद्धिम् अपि यत् अध: चक्रे तत् त्वत् चरणयो: वरिवसतरि तस्मिन् चित्रम् न त्वयि शिरस: अवनति: कस्यै उन्नत्यै न भवति ।

भावार्थ

हे वरदायी प्रभो ! तीनों लोकों को दास की तरह अपने अधीन रखने वाले बाणासुर ने देवराज इन्द्र के विपुल वैभव के बढ़े-चढ़े हुए होने के उपरान्त भी उसे जो अपने वैभव से नीचा दिखा दिया, इसमें आपके चरणों में प्रणामशील उस बाणासुर का यह कार्य कोई अचम्भे की बात नहीं है । आपके चरणों में शीश झुका कर नमस्कार निवेदित करना किसके उत्कर्ष का कारण न होगा ? अर्थात् आपके आगे सिर झुकाने वाले की सदा ही उन्नति होती है ।

व्याख्या

शिवमहिम्न:स्तोत्रम् के तेरहवें श्लोक में स्तुतिगायक गन्धर्वराज पुष्पदन्त अपना यह मत स्थापित करते हैं कि श्रीशिव के पदकमलों में प्रणाम निवेदित करने के लिये शीश झुकाने वाला कोई भी व्यक्ति परम उत्कर्ष को प्राप्त होता है । वे बाण नामक शिव-भक्त असुर के विषय में बताते हैं कि किस प्रकार शिव की कृपा और उनकी प्रसन्नता को पा कर वह तीनों लोकों को अपने वश में रखने वाला बन गया था । बाण को बाणासुर के नाम से जाना जाता है ।

महादेव को संबोधित करते हुए कवि कहते हैं कि हे वरदायी प्रभो ! देवराज इन्द्र का अपार वैभव बढ़ा-चढ़ा होने पर भी बाण उससे भयभीत न था और न हि वह इससे हतप्रभ था । यदृद्धिं सुत्राम्णो  में प्रयुक्त सुत्रामन् शब्द इन्द्र का एक नाम है, इसकी छठी विभक्ति बनती है सुत्राम्ण: । वाक्य में वरद शब्द से पहले आने पर सुत्राम्ण: शब्द से विसर्ग का लोप हो जाता है तथा उसका रूप सुत्राम्णो बन जाता है, जिसका अर्थ है इन्द्र की । सुत्रामन् का कोशगत (शब्दकोश में दिया गया) अर्थ है सुष्ठु त्रायते अर्थात् जो भलीभाँति रक्षा करता है । देवताओं के राजा का वैभव परमोच्च तो होगा ही । किंतु सम्पत्ति-समृद्धि की विपुलता में बाण इन्द्र से भी अधिक उच्चतर था । इसलिये कवि ने कहा कि इन्द्र के ऋद्धि में सर्वोपरि होने पर भी बाण ने परमोच्चैरपि सतीमध्चक्रे अर्थात् उसे नीचा दिखा दिया, अधोमुखी कर दिया । प्रह्लाद के वंश में उसने जन्म लिया था । परम शिवभक्त व महादानी दैत्यराज बलि का पुत्र था बाणासुर । वामनावतार में विष्णु के याचना करने पर बलि ने संपूर्ण पृथ्वी दान में दे दी थी । उसी बलि का औरस पुत्र था बाणासुर, जो शिवभक्त, मान्य, बुद्धिमान, सत्यप्रतिज्ञ तथा दानशील था । वह त्रिलोकी को जीत कर शोणितपुर में रह कर राज्य करता था । यह भगवान शिव की कृपा थी उस पर कि तीनों लोकों को जीत कर उसने अपने अधीन कर रखे थे व सभी देवगण बाण: परिजनविधेयत्रिभुवन यानि बाण के दास की भांति हो गये थे ।

अत्यधिक संक्षेप में बाणासुर की शिवभक्ति की कथा इस प्रकार है । पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार असुरकुल में उत्पन्न देवशत्रु बाणासुर वस्तुत: प्रह्लाद का प्रपौत्र, विरोचन का पौत्र तथा दैत्येन्द्र बलि का पुत्र था । वह प्रजावत्सल एवं मित्रवत्सल तो था, किन्तु वह देवताओं का शत्रु था । शिव की अपरिमित कृपा से उसे एक सहस्र (हज़ार) भुजाएं प्राप्त थीं । अपने आराध्य महादेव के पास वह कैलाश पर ज़ाया करता था व शिव का प्रीतिपात्र था । किसी से भी रण करने के लिये उसकी भुजाएं सदा खुजलाया करती थीं । शिवपुराण की कथा के अनुसार एक बार उस महादैत्य ने अपनी हज़ार भुजाओं को बजा कर ताण्डव नृत्य के द्वारा महेश्वर को प्रसन्न किया था । कहीं अन्य कथाओं में कुछ भिन्नता लिये हुए यह प्रसंग आता है कि जब शिव कैलाश पर नृत्य कर रहे थे, तब बाणासुर ने हजार हाथों से मृदंग बजा कर उन्हें प्रसन्न कर दिया था । भागवत में वर्णन है कि बाणासुर भगवान शंकर का अनन्य भक्त था और उनसे उसने सहस्र भुजाएं पाईं थीं । शिव-पार्वती ने उसे अपना पुत्र माना था । सहस्र भुजाएं पाकर हर्ष और श्रद्धा के अतिरेक में उसने उन सहस्रों हाथों से ताली बजा-बजा कर उमा-महेश्वर की स्तुति की एवं शिवजीके ताण्डव-नृत्य करने पर उसने पूरे पांच सौ वाद्य उठा लिए सहस्र करों में । सहस्रबाहुर्वादेन ताण्डवेsतोषयन् मृडम् — (श्रीमद्भागवत महापुराण १०|६२|४) । वह अकेला ही बड़े से बड़े वाद्य-मण्डल से बड़ा था । वह मुख से स्तवन करता जा रहा था । इस प्रकार उसने महादेव को प्रसन्न कर दिया । शिव द्वारा उसे वर देने की इच्छा प्रकट करने पर उसने कहा कि हे विभो ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरे नगर के अधिपति बन कर सपरिवार अपने गणों के सहित इसी नगर के समीप निवास कर मेरा हित करते हुए मेरी रक्षा करें । और भगवान चन्द्रशेखर ने उसकी मनोवांछा पूरी की और उसे अपनी कृपा-छाया का बल दिया । फलस्वरूप वह बाण अजेय हो गया था व त्रिलोकी को जीत कर उसके विपुल वैभव का वह स्वामी बन गया था । उसने स्वर्ग को जीत कर त्रिदशपति इन्द्र को सदा के लिये अपना करदाता बना दिया था । यह थी उसके उत्कर्ष की गौरवगाथा । बाणासुर के विषय में मत्स्यपुराण का कहना यह है,

तपसा तोषितो यस्य पूरे वसति शूलभृत् ।
महाकालत्वमगत्साम्यं यश्च पिनाकिन: ।।

अर्थात् तपस्या से तुष्ट शूलपाणि जिसके पुर में निवास किया करते थे व जो पिनाकी प्रभु के साम्य महाकालत्व को प्राप्त हो गया था ( ऐसा था वह बाणासुर) ।  गन्धर्वराज पुष्पदंत अपने आराध्य से कहते हैं कि बाण की ऐसी अद्वभुत् उन्नति कोई आश्चर्य का विषय नहीं है, क्योंकि शिरसत्वय्यवनति अर्थात् आपके आगे, आपके चरणों में शीश झुकाना भला किसके लिये उन्नतिकारक न सिद्ध होगा, अर्थात् सब के लिये ऐसा करना परम प्रगतिकारक व कल्याणप्रद है । आपकी पूजा-उपासना करने वाले के लिये, आपकी समाराधना में संलग्न रहने वाले के लिये इस तरह के अथाह ऐश्वर्य की प्राप्ति कोई अचम्भे की बात नहीं है । पुरारी का पूजापरायण भक्त, उनके पादपद्मों में झुकने वाला प्रणाम-प्रवण भक्त पग-पग पर प्रगति पाता है । भगवान आशुतोष के निकट कुछ भी अदेय नहीं है और उनके अनुग्रह का कोई ओर-छोर नहीं है । वरदानों का वर्षण करने वाले आनन्द-निर्झर भगवान शिव को स्तुतिकार कदाचित् इसीलिये श्लोक की पहली पंक्ति में वरद के संबोधन से पुकारते हैं ।

श्लोक १२ अनुक्रमणिका

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