शिवमहिम्नःस्तोत्रम्

श्लोक २३

Shloka 23 Analysis

स्वलावण्याशंसाधृतधनुषमह्नाय तृणवत्
पुर: प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि ।
यदि देवी स्त्रैणं यमनिरत देहार्धघटना-
दवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा: युवतय: ॥ २३ ।।

स्वलावण्याशंसाधृतधनुषमह्नाय तृणवत्
स्वलावण्याशंसाधृतधनुषमह्नाय तृणवत् स्व + लावण्य + आशंसा + धृत + धनुषम् + अह्नाय
स्व = अपने, निज
लावण्य = सौन्दर्य
आशंसा = के भरोसे
धृत = थामे हुए, ताने हुए
धनुषम् = धनुष को
अह्नाय = तत्क्षण, तुरन्त
तृणवत् = तिनके की तरह
पुर: प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि
पुर: = (आँखों के) सामने
प्लुष्टम् = जला हुआ
दृष्ट्वा = देख कर
पुरमथन = हे पुरारी !
पुष्पायुधमपि पुष्पायुधम् + अपि
पुष्पायुधम् = कामदेव को
अपि = भी
यदि देवी स्त्रैणं यमनिरत देहार्धघटना-
यदि = अगर
देवी = देवी पार्वती
स्त्रैणम् = स्त्री में आसक्त
यमनिरत = हे योग में तत्पर, योगेश्वर
देहार्धधटना- = (देवी को) देह का आधा भाग देने की घटना
देहार्धघटना-दवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा: युवतय:
देहार्धघटना देहार्धघटना + त् +अवैति
देहार्धघटनाद् = (देवी को) देह का आधा भाग देने की घटना से
अवैति = समझती हैं
त्वामद्धा त्वाम् + अद्धा
त्वाम् = आपको
अद्धा = अच्छा ही है, ठीक ही है
बत = बेचारी
वरद = हे वरदायी !
मुग्धा: = भोली ( होती हैं)
युवतय: = नवयौवनाएं

अन्वय

(हे) पुरमथन ! देवी स्वलावण्याशंसा धृतधनुषम् पुष्पायुधम् पुर: अह्नाय तृणवत् प्लुष्टम् दृष्ट्वा अपि यदि (हे) यमनिरत ! (सा) त्वाम् देहार्धघटनात् स्त्रैणम् अवैति अद्धा (हे) वरद ! बत युवतय: मुग्धा: ।

भावार्थ

हे पुरान्तक ! देवी अपने (पार्वती के) सौन्दर्य के भरोसे पर धनुष उठाये हुए कुसुमायुध को, अपनी आँखों के सामने तुरन्त ही तिनके की तरह जलता हुआ देख कर भी हे योगेश्वर ! यदि आपको अर्धनारीश्वर रूप ले लेने के कारण स्त्री में परम आसक्त समझती हैं, तो ठीक ही है, हे वरदायी प्रभो ! बेचारी नवयौवनाएं होती ही भोली हैं । ( भोली ही तो होती हैं )

व्याख्या

प्रस्तुत श्लोक में गन्धर्वराज भगवान शिव की स्तुति का गायन करते हुए उनकी अर्धनारीश्वर छवि का पावन स्मरण करते हैं । इसके साथ ही वे त्रिपुरारी के महायोगेश्वर रूप को रेखांकित करना नहीं भूलते । सन्दर्भ यह है कि रूपगर्विता देवी पार्वती शम्भु के अर्धनारीनटेश्वर रूप धारण कर लेने से उन्हें स्त्री में परम आसक्त मान लेती हैं । अपने नवयौवन के मद में मत्त रूपगर्विता शिवा क्या जाने कि उक्त रूप तो लीलाविशारद प्रभु का एक आनन्दविलास मात्र है और उन वरदायक का प्रत्येक विलास उनमें प्रीति रखने वालों का सुख-संपादन करता है ।

पहली पंक्ति में पहला शब्द है स्वलावण्याशंसाधृतधनुषम्, यहां स्व से तात्पर्य देवी पार्वती के स्व से है न कि कामदेव के स्व से । शिवजी की तपस्थली पर देवी ने अपने नेत्रों के सामने तुच्छ तिनके की तरह कामदेव को धू-धू कर जलते हुए देखा है जो महेश्वर के मन में विक्षेप उत्पन्न करने देवराज इन्द्र द्वारा वहाँ भेजे गये थे । शिवपुराण की रुद्रसंहिता, पार्वती खण्ड में लिखा है कि जब मदन को बुलाकर इन्द्र ने उन्हें कार्य सौंपा तो इसके सफल होने में सन्देह भी प्रकट किया । इस पर मदन ने दर्प के साथ बताया कि मैं क्षणभर में सुन्दर स्त्री के कटाक्षों से लोक में किसी को भी भ्रष्ट कर सकता हूं, शंकर को भी भ्रष्ट कर सकता हूँ । मेरा बल बल है सुन्दर स्त्री । यही कारण है कि त्रैलोक्यसुन्दरी पार्वती के अनन्य रूप-लावण्य से अतिरिक्त बल पाकर सर्वजित् मदन के मन में ध्यानरत महायोगेश्वर पर विजय पाने की बड़ी आशंसा थी अर्थात् जय की आशा बंधी थी । दाक्षायणी (दक्षपुत्री सती) के योगाग्नि में देहत्याग करने के अनन्तर भगवान भूतभावन जब हिमालय पर्वत के औषधिप्रस्थ नामक नगर में गंगावतरण नामक एक उत्तम शिखर पर तप करने पहुंचे, तो शैलराज हिमालय ने अपनी अनन्य सुन्दरी पुत्री पार्वती के लिये शिवजी से उनके पदपद्मों में सेवा-अर्चना करने के लिये अनुज्ञा चाही । शैलराज की प्रार्थना का गौरव रखने के लिये महेश्वर ने अनुमति दे दी । अब पार्वती अपनी सखियों के साथ वहाँ रहते हुए कुशा, तिल, पुष्प, फल, जल आदि लाकर शम्भु के चरणों में निवेदित करती रहीं । उनकी वहां उपस्थिति से कन्दर्प को कार्यसिद्धि का आश्वासन मिला । पुष्पायुध कामदेव का एक नाम है, क्योंकि उनके आयुध पुष्प के होते हैं, अत: उन्हें पुष्पशर, पुष्पधन्वा, पुष्पचाप, कुसुमायुध, कुसुमसायक आदि नामों से भी जाना जाता है । मदन-दहन का आख्यान अनेक पुराणों में वर्णित है । शिवपुराण के अनुसार अपने पुष्पशरों से सज्जित मदन ने पार्वती को ध्यानरत शिव के निकट देख कर उस अवसर को सर्वथा उपयुक्त पाया । एक ओर कामदेव का अपना मादक ऐश्वर्य व दूसरी ओर नवयौवना देवी का लुनाई भरा रूपैश्वर्य, बस फिर क्या था ! पूरे विश्वास के साथ बाणसहित हाथ में धनुष थामे मदन ने महेश्वर पर अपना अमोघ पुष्पबाण सन्धान किया । परमेश्वर के ध्यान में व्याघात पड़ा । उन्होंने नेत्र खोले और अपने वाम भाग में काम पर दृष्टि पड़ते ही शिवजी को तीव्र क्रोध उत्पन्न हुआ । और अह्नाय अर्थात् अविलम्ब उसी क्षण उनके ललाट के मध्यभाग में स्थित तृतीय नेत्र से प्रलयाग्नि के समान भयंकर अग्नि प्रकट होकर निकली और देखते ही देखते कुसुमायुध उस प्रचण्ड अग्नि में तिनके की तरह जल कर भस्म हो गये । यह सब पार्वती के नेत्रों के सम्मुख घटित हुआ । (शिवपुराण की कथा के अनुसार तब वे बहुत घबरा गईं तथा सखियों सहित अपने भवन को लौट गईं ।)

इस प्रकार इस श्लोक में यह निरूपित किया गया है कि देवी भलीभांति इस बात से विज्ञ हैं कि शम्भु कामजित् हैं तथापि रूपगर्विता देवी उमा अपने कान्त को हल्के में लेती हैं । विवाहोपरान्त लोकधर्म का प्रवर्तन करने वाले कालीपति शिव लोकगति का आश्रय लेते हुए देवी पार्वती के साथ वन-वनान्तरों व सुरम्य स्थलों में विहार करते हुए दाम्पत्य की मधुर विलासिनी लीलाएँ दीर्घ समय तक रचाते हैं । अपने वामांग में अर्थात् अपनी देह के वाम भाग में, प्रकारान्तर से वे अपनी अर्धदेह में अपनी प्राणप्रिया को स्थान देते हैं, जिसे इस श्लोक में देहार्धघटना कहा है । एक ही विग्रह में अपने युग्म रूप को प्रतिष्ठित करके शिव अर्धनारीश्वर कहलाये । कवि के अनुसार देवी ने देहार्धघटना के कारण अर्थात् अपने कामजित् कान्त को अर्धनारीश्वर रूप अंगीकृत कर लेने के कारण स्त्रैण अर्थात् स्त्री में परम आसक्त मान लिया । उनकी यह रूपाकृति देख कर देवी के मन में यह सोच उठा कि महेश्वर में उत्कट स्मर-भाव उद्भूत हो रहा है । यह उनका भोलापन था कि यम-नियम में तत्पर रहने वाले अपने पति के जितेन्द्रियत्व को वे समझ न पायीं । जबकि उन्होंने अपने सामने ही कुपित शम्भु को देखा था कामदेव को तृणवत् अर्थात् तिनके का तरह भस्म करते हुए । गन्धर्वराज स्तुति गाते हुए कहते हैं कि हे यमनिरत ! अर्थात् हे योग व यम-नियमादि में रत रहने वाले प्रभो, हे संयम-संलग्न योगेश्वर ! इतने पर भी देवी आपके आधे तन में स्थान पाकर यदि यह समझती हैं कि आप उनमें अत्यधिक आसक्त हो गये हैं और उन्होंने आपको अधीन व अधीर कर रखा है, तो हे वरद ! ठीक ही है—अद्धा ! नवयौवनाएं बेचारी मूढ़ ही तो होती हैं, गूढ़ बात को कहाँ वे समझ पातीं हैं । अत: यौवनांगनाओं को मुग्धा: युवतय: कहा है । एक प्रकार से उनका संकेत देवी पार्वती की ओर है कि वे भोली हैं तथा योगेश्वर का वैराग्य से अभिज्ञ भी । सदाशिव के वास्तविक रूप का बोध उन्हें नहीं है ।

विद्वान लेखक श्री सुदर्शन सिंह ‘चक्र’ ने अपनी पुस्तक शिव चरित में भवानी-शंकर के युग्म रूप के विषय में अपने विचार प्रकट किये हैं । संक्षेप में कहा जाये तो लेखक के विचारानुसार पार्वती वस्तुत: शिव से अभिन्ना हैं । वे शिव से प्रकट की हुई उनकी शक्ति हैं, उनकी सर्वस्व हैं । भगवान शिव नित्य शक्ति-समन्वित हैं । यही कारण है कि शिवलिंग में पीठ का भाग शक्ति का स्वरूप माना जाता है । जहां केवल पुरुष है, वहाँ सृष्टि नहीं है और यदि सृष्टि है तो परम तत्व शक्ति-समन्वित हो कर रूपाकार ग्रहण करता है । शक्ति के बिना सृष्टि संभव नहीं । उनके शब्दों में जैसे महारुद्र सृष्टि होने पर सगुण साकार रूप से ब्रह्माण्ड में प्रकट होते हैं, उनसे नित्य अभिन्न महाशक्ति भी प्रकट होती है । वे विकार से प्रकट हुईं हैं, अत: परमेश्वर के निर्विकार रूप को नहीं देखतीं । यद्यपि प्रकृति अथवा माया के क्रियाकलाप पुष्कल हैं, असंख्य हैं, तथापि वहीं तक सीमित है, जहां तक जगत् है । जगत् चाहे सूक्ष्म हो या विराट, दृश्य हो या अदृश्य, है वह वस्तुत: माया की रंगशाला ही ।

महाशक्ति की पुराणों में अनेक कथाएं मिलती हैं । परम शिव की यह नित्यशक्ति अपने प्रकट रूप में माया अथवा प्रकृति है । विकार से उत्पन्न होने से उनमें भ्रान्ति का होना आश्चर्यजनक नहीं है । यद्यपि शिव की यह माया शिव के अधीन है, किन्तु वे अपने प्राणवल्लभ शिव को अपने अधीन मानती हैं । माया ने सकल जगत् को भले ही व्याप्त कर रखा हो, किन्तु माया जिन शक्तिमान की शक्ति है, उन्हें वह स्वयं भी नहीं जानती । इस सीमा से परे जो तत्व है, उस पर प्रकृति की एक नहीं चलती । न हि उस तत्व का उसे बोध ही होता है, अत: वे अबोध हैं, भोली हैं और वे शिव के केवल उस रूप को ही जानती हैं, जिसमें सब प्रपंच समाया हुआ है । जग को नचाने वाली माया या प्रकृति अथवा शक्ति, जिस शक्तिमान के संकेत पर नाचती है, उसके उसी रूप को जानती है, जो उसके अधिकार-क्षेत्र में आता है । और जो उनके अधिकार-क्षेत्र में है, उसे वह पूरा अपने वश में मानती हैं ।

भगवान भूतभावन का अपनी शक्ति के साथ समन्वित अर्धनारीश्वर रूप श्रद्धागम्य है, भाव व श्रद्धा रख कर इसके तत्व को हृदयंगम किया जा सकता है । इसके मूल में सृष्टि का रहस्य निहित है । आज प्राणिशास्त्री भी कहने लगे हैं कि सृष्टि का प्रत्येक प्राणी उभयलिंगी है । पदार्थविज्ञान कहता है कि प्रकृति के प्रत्येक अणु में आकर्षण-विकर्षण की दोनों शक्तियां एक साथ हैं । भगवान भव व भवानी का नित्य अभिन्नत्व इस तथ्य का सनातन प्रतीक है । शिव की इस नित्य शक्ति से जगत् कभी रिक्त नहीं होता । इसे महामाया कहें या महाशक्ति, यही विश्व में परिव्याप्त ऊर्जा का दिव्य और उदात्त रूप है । यही पुरुष के ओज में है । उसकी पुंसवन-शक्ति यही है, जो स्त्री की प्रसव-शक्ति से मिल कर जीव के जन्म का कारण बनती है । श्रीलिंगमहापुराण में महेश्वर का यह कथन दृष्टव्य है—

स्त्रीलिंगमखिलं देवी प्रकृतिर्मम देहजा ॥
पुल्लिंगं पुरुषों विप्रा मम देहसमुद्भव: ।
उभाभ्यामेव वै सृष्टिर्मम विप्रा न संशय: ।

अर्थात् इस संसार में समस्त स्त्रीलिंग-समुदाय मेरी देह से उत्पन्न प्रकृतिदेवी का ही स्वरूप है । इसी प्रकार समस्त पुल्लिंग-समुदाय मेरी देह से उत्पन्न पुरुष का स्वरूप है । यह सृष्टि मुझसे प्रादुर्भूत पुरुष-प्रकृति अथवा नर-नारी—इन्हीं दोनों से हुई है ।

प्रत्येक नर-नारी में अर्धनारीश्वर रूप की अदृश्य व सूक्ष्म स्थापना है, जो उनके अभिन्नत्व एवं परस्परावलम्बन को संकेतित करती है । देहार्धघटना वस्तुत: भगवान शिव के लीला-वपु का विस्तार है । इसका स्मरणमात्र वासनाओं का क्षय करता है । देवी पार्वती शिव से अभिन्ना हैं ।

श्लोक २२ अनुक्रमणिका श्लोक २४

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