शिवमहिम्नःस्तोत्रम्

श्लोक ९

Shloka 9 Analysis

ध्रुवं कश्चित्सर्वंसकलमपरस्त्वध्रुवमिदं
परो ध्रौव्याध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये ।
समस्तेऽप्येतस्मिन्पुरमथन तैर्विस्मित इव
स्तुवन्जिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता ।। ९ ।।

ध्रुवं कश्चित्सर्वंसकलमपरस्त्वध्रुवमिदं
ध्रुवम् = नित्य
कश्चित्सर्वंसकलमपरस्त्वध्रुवमिदं = कश्चिद् + सर्वम् + सकलम् + अपर: + तु + अध्रुवम् + इदम्
कश्चिद् = कोई
सर्वम् = सम्पूर्ण
सकलम् = समूचे को (जगत को)
अपर: = अन्य (कोई)
तु = तो
अध्रुवम् = अनित्य
इदम् = यह
परो ध्रौव्याध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये
परो = अन्य
ध्रौव्याध्रौव्ये = नित्यानित्य (नित्य-अनित्य)
जगति = जगत् में
गदति = निश्चित रूप से बताता है
व्यस्तविषये = विपरीत दिशागामी विषय में
समस्तेऽप्येतस्मिन्पुरमथन तैर्विस्मित इव
समस्तेऽप्येतस्मिन्पुरमथन = समस्ते + अपि + एतस्मिन् + पुरमथन
समस्ते = सब में, (सब के कारण)
अपि = भी
एतस्मिन् = इस (सब) में, (इस सब के कारण)
पुरमथन = (हे) त्रिपुरसंहारक
तैर्विस्मित = तै: + विस्मित
तै: = इनसे, (इन सबसे)
विस्मित = चकित, अचम्भित
इव = (हुआ ) सा
स्तुवन्जिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता
स्तुवन्जिह्रेमि = स्तुवन् + जिह्रेमि
स्तुवन् = स्तुति करता हुआ
जिह्रेमि = लज्जा का अनुभव कर रहा हूं
त्वाम् = आपको (भजता हुआ )
= नहीं
स्तुवन्जिह्रेमि त्वां न = आपको भजता हुआ ( आराधना करता हुआ ) मैं लज्जित नहीं होता
खलु = सचमुच
ननु = ही
धृष्टा = उद्धत, ढीठ, दुस्साहसी
मुखरता = वाचालता, बहुत अधिक बोलना

अन्वय

पुरमथन ! कश्चिद् इदम् सर्वम् ध्रुवम् गदति अपर:सकलम् अध्रुवम् । तु पर: जगति ध्रौव्याध्रौव्ये व्यस्तविषये एतस्मिन् समस्ते तै: विस्मित इव अपि त्वाम् स्तुवन् न जिह्रेमि । ननु मुखरता खलु धृष्टा ।

भावार्थ

हे त्रिपुरसंहारक ! इस समस्त जगत ( व जगत के भीतर आने वाले समस्त पदार्थों ) को कोई निश्चित रूप से नित्य बताता है तथा अन्य कोई इसे अनित्य कह देता है । तो कोई और इस जगत के विषय में इसे नित्य – अनित्य दोनों बता कर विपरीत -दिशागामी मत रखता है । इन सभी बातों से विस्मित हुआ-सा भी मैं आपकी स्तुति करता हुआ लाज-संकोच का अनुभव नहीं करता हूं अर्थात् मैं तो आपकी ही आराधना करता हूं , ऐसा कहने में मुझे कोई झिझक नहीं है । वाचालता वास्तव में निर्लज्ज होती है । तात्पर्य यह कि वाचाल लोग अर्थात् ज़्यादा बोलने वाले लोग सचमुच ही ढीठ प्रकृति के होते हैं ।

व्याख्या

स्तोत्रकार पुष्पदन्त, जो कि गन्धर्वराज हैं, शिवमहिम्न:स्तोत्रम् के नौवें श्लोक में इस जगत की नश्वरता के विषय में विभिन्न मतों को संक्षेप में बताते हुए इन मतों के मकड़-जाल से स्वयं को अप्रभावित किन्तु विस्मित हुआ-सा अभिव्यक्त करते हैं । तत्पश्चात् इन सब शाश्वत-नश्वर आदि मतों से उन्हें कोई प्रयोजन नहीं है , इस तथ्य को अपनी अडिग शिव-श्रद्धा से संलग्न करते हैं । भगवान शिव ही उनके एकमात्र आराध्य -उपास्य हैं , स्तव्य हैं, इस तथ्य पर बल देते हैं तथा ऐसा करने व कहने में उन्हें कोई हिचक या झिझक नहीं है, इसका भी प्रतिपादन करते हैं । अपने निस्संकोच कथन के साथ-साथ यह भी कह देने में वे पीछे नहीं रहते कि अधिक वाचालता ( बातूनीपना ) निर्लज्जता की वाहक होती है, यह उन्हें विदित है । तथापि ऐसा इसलिए कहना पड़ता है क्योंकि महादेव के प्रति अपनी अविचल आस्था कोइस तरह मुखरता से स्पष्ट करने में वे किसी को दुर्विनीत या धृष्ट भी लग सकते हैं । अतः कहते हैं कि वाचाल व्यक्ति की अधिक बोलने की वृत्ति निर्लज्जता-संवलित होती ही है और मैं भी इसका अपवाद नहीं हूं ।

लोक में आत्मा, परमात्मा, जगत व इसकी प्रकृति एवं पदार्थ को ले कर, सृष्टि आदि को लेकर पुराकाल से गहन चिन्तन होता चला आ रहा है और अनेकानेक मत-मतान्तर प्रचलित हैं, इस मन्थन के फलस्वरूप । मानव की अनुसंधित्सा ( अनुसन्धान करने की इच्छा ) व जिज्ञासा सदा से सक्रिय एवं बलवती रही है । यह उसका मनोविनोद भी रहा है । श्रुति, स्मृति, पुराण व हमारे दर्शन-ग्रन्थों आदि में विभिन्न विचारधाराएं वर्णित हैं । भिन्न-भिन्न ऋषियों के पृथक् पृथक् मत हैं और इस कारण उनके वर्णनों में भी भेद परिलक्षित होता है ।

डा. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा सम्पादित ग्रन्थ ‘ हिन्दी साहित्य कोश ‘ आत्मा -विषयक मत-वैभिन्न्य पर प्रकाश-क्षेपण करते हुए यह कहता है, ” भारतीय दर्शन में सामान्यतः दो धाराएं हैं – आत्मवाद और अनात्मवाद या नैरात्म्यवाद । आत्मवाद के अन्तर्गत समस्त हिन्दु दर्शन है और अनात्मवाद में बौद्ध तथा चार्वाक दर्शन है ।” यहीं पर आगे कहा है कि, ” आत्मवाद के अनुसार आत्मा नित्य, अजर-अमर, सभी वस्तुओं की साक्षी, चेतन और अपरिवर्तनशील है । अनात्मवाद के अनुसार या तो आत्मा है ही नहीं और या तो वह नश्वर तथा परिवर्तनशील है । जैनमत में वह परिवर्तनशील और अपरिवर्तनशील दोनों है …” इसी प्रकार बौद्धों के विज्ञानवादियों ने संसार को चित्त की ही एक भ्रान्ति के रूप में माना व संसार के वास्तविक स्वभाव का ज्ञान प्राप्त कर चित्त को भ्रान्ति से मुक्त कराने पर बल दिया । शून्यवादियों ने संसार को अनित्य बताया । कहने का तात्पर्य यह है कि जगत को किसी विचारधारा ने नित्य या शाश्वत बताया तो किसी और ने इसको अनित्य कहा । किसी अन्य ने इसे शाश्वत तथा नश्वर अर्थात् नित्य व अनित्य दोनों ही बताया । इस विपरीत दिशागामी मतों व लोक में इनके विस्तार को देखते हुए स्तोत्रगायक को विस्मय होता है । अचम्भित तो वे हैं किन्तु भगवान् कपाली की कृपा से असमंजस में नहीं हैं ।

भारतीय संस्कृति में समाविष्ट धर्म-साधनाओं एवं दर्शनों की व्यापकता असामान्य है । इनकी जड़ें बहुत गहरी हैं तथा विचारधाराएं कहीं प्रमाण-पुष्ट हैं तो कहीं परम्परा-मान्य ।। इनमें रुचि-वैचित्त्र्य एवं मत-वैभिन्न्य भी प्रबल है । किन्तु चिन्तन-सामर्थ्य दोनों में अद्भुत् है । इसी कारण विस्फारित-नेत्र गन्धर्वराज अपने आराध्य के पाद-पद्मों में अपनी सुदृढ़ आस्था को स्पष्टरूपेण रेखांकित करते हैं । वे शिवार्चनपरायण होने के कारण, शिव के पुनीत चरणों का आश्रय ग्रहण करने के कारण स्वयं को धन्य समझते हैं । और निस्संकोच इसका गर्वमिश्रित स्वीकार भी करते हुए कहते हैं कि हे त्रिपुर का दमन करने वाले पुरान्तक ! मैं लोक में मतों, विचारों व श्रद्धाओं की बहुलता और उनके परस्पर विरोधी कथन वाले विचित्र विषय से आश्चर्यातिरेक से भर जाता हूं । तथापि यह कहने में तनिक सी भी लज्जा का अनुभव नहीं करता कि मैं आप ही का उपासक हूं । त्रिपुरारी के प्रति अपरिसीम निष्ठा से निःसृत इस स्पष्टोक्ति के कारण वे स्वयं को निर्लज्जप्राय की संज्ञा भी दे देते हैं । दूसरे शब्दों में अपने आप के लिए जो कहते हैं उसका भाव यह है कि मैं ठहरा व्यर्थ का प्रलाप करने वाला, अतः आपकी आराधना करने में उचित-अनुचित का भान न रख कर ढीठ की तरह जो कुछ मन में आता है, प्रलाप ( बकवाद ) किये जाता हूं ।

अपने को मुखर या वाचाल ( बहुत बोलने वाला ) कह कर स्तोत्रगायक गन्धर्वराज एक तरह से मूक हो जाने का उपक्रम करते हैं । मानो यह कहना चाह रहे हों कि उद्धत व अशिष्ट होकर और कितना बोलूं ! जो शब्द से, वाणी से परे हैं, उन परात्पर शिव का गुण-गायन मैं क्या बोल कर, क्या गा कर करूँ ? निष्कपट बालक जैसे परिचित-अपरिचित-अतिपरिचित लोगों की भीड़ में खो कर अपनी माता ( या पिता ) को देख कर सहज ही उनकी ओर दौड़ता हुआ चला जाता है, वैसे ही श्रद्धाओं व मतो की भीड़ में पुष्पदन्त ( स्तोत्र-रचयिता ) केवल अपने प्रभु त्रिपुरारी को ही पहचानते हैं तथा अन्य सभी को छोड़कर केवल उनकी आराधना करने में संकोच का अनुभव किसी भी तरह नहीं करते । वे मुक्तकण्ठ से इस भाव को प्रकट भी करते हैं । अत: गा उठते हैं ” स्तुवन्जिह्रेमि त्वां न ” अर्थात् आपकी स्तुति करने में लज्जा का लेशमात्र भी आभास मुझे नहीं होता । किसी मनोभाव को व्यक्त करने की तीव्र उत्कण्ठा व्यक्ति को मुखर बना देती है तथा वह असंयत होकर बोलने में प्रवृत्त हो जाता है । अतएव अन्त में वे कहते हैं ” खलु ननु धृष्टा मुखरता ” यानि वाचालता बड़ी धृष्ट होती है ।

श्लोक ८ अनुक्रमणिका श्लोक १०

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