शिवताण्डवस्तोत्रम्

मूल पाठ

nataraja-cosmic-dancer-QE86_l

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुंगमालिकां ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नःशिवः शिवम् ।। १ ।।

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि ।
धगद्धगद्धगज्वललल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ।। २ ।।

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-
स्फ़ुरद्दिगन्तसंततिप्रमोदमानमानसे ।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ।। ३ ।।

जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदम्बकुमकुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ।। ४ ।।

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर –
प्रसूनधूलिधोरणीविधूसरांघ्रिपीठभूः ।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ।। ५ ।।

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिंगभा-
निपीतपंचसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालि संपदे शिरो जटालमस्तु नः ।। ६ ।।

 

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्जवल-
द्धनंजयाहुतीकृतप्रचंडपंचसायके ।
धराधरेंद्रनंदिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ।। ७ ।।

नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्-
कुहूनिशीथिनीतमःप्रबंधबद्धकन्धरः ।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलनिधानबन्धुरः श्रियं जगद् धुरन्धरः ।। ८ ।।

प्रफुल्लनीलपंकजप्रपंचकालिमप्रभा-
वलंबीकंठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ।। ९ ।।

अखर्वसर्वमंगलाकलाकदम्बमन्जरी
रसप्रवाहमाधुरीविज्रिम्भणामधुव्रतम् ।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ।। १० ।।

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस-
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।
धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदन्गतुङ्गमङ्गल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचंडताण्डवः शिवः ।। ११ ।।

 

nataraja_be91
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणरविन्द्चक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समप्रवर्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ।। १२ ।।

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुंजकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् ।
विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ।। १३ ।।

निलिम्पनाथनागरी कदम्बमौलिमल्लिका-
निगुम्फनिर्भर क्षरन्मधूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परश्रियं परं पदं तदंगजत्विषां चयः ।। १४ ।।

प्रचण्डवाडवानलप्रभाशुभप्रचारिणी
महाष्टसिद्धिकमिनीजनावहूत जल्पना ।
विमुक्तवामलोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषणो जगज्जयाय जायताम् ।। १५ ।।

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततं ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् ।। १६ ।।

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शंभुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरंगयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ।। १७ ।।

इति श्रीरावणकृतं शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

3 comments

  1. सुरेन्द्र वर्मा says:

    श्रद्धेय डा. किरणजी,
    जय श्री कृष्ण! पुन: आपकी सुन्दर प्रस्तुति के किंचित परिष्कार हेतु निवेदन को धृष्टता न मान, उचित समझें तो निवेदन:
    शिव ताण्डव स्तोत्र:
    उपक्रम बहुत सरस: अनुच्छेद II: पंक्ति 6: सहस्त्र के स्थान पर सहस्र अभीष्ट
    अनुच्छेद IV: पंक्ति 6: जिब्हा के स्थान पर जिह्वा
    मूल पाठ:
    श्लोक 4: (मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ।। 4 ।।
    अलग से copy कर देखने पर शुद्ध है, परन्तु site पर पढ़ने देखने में क्यों मनो विनोदमदुभतं …. दिखता है, कारण
    मुझे नहीं पता, उससे पाठ में विक्षेप होता है.
    रसप्रवाहमाधुरीविज्रिम्भनामधुव्रतम्…(10) के स्थान पर रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।
    (श्लोक 10 व्याख्या में सही है, सिवाय अन्वय में दो स्थानों पर व्रिजृम्भणा है.
    आवश्यक परिष्कार उपरांत टिप्पणी हटा देने की विनती. साभार-

    • Kiran Bhatia says:

      आदरणीय श्री सुरेद्र वर्माजी, जय श्रीकृष्ण । विद्यानुरागी पाठकों द्वारा पढ़े और सराहे जाने का हर्ष द्विगुणित हो जाता है उनके द्वारा दर्शायी हुई अशुद्धियों का तदनुकूल परिष्कार करके । शतशः धन्यवाद ।

      १ -`महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम्` में मूल पाठ के प्रथम श्लोक में ‘हे’ लगा हुआ है ।
      २ – शिवमहिम्नस्तोत्रम्: में Leave a Reply प्रावधान शीघ्र ही क्रर दिया जायेगा ।
      ३ – शिवताण्डस्तोत्रम् में `विनोदमद्भुतं` `मैक ` में सही दीखता है, जैसा कि लिखा गया है ।
      ४ – शिवमहिम्नःस्तोत्रम् के ३४वें श्लोक का अन्वय भी लिख दिया गया है, जो पता नहीं कैसे छूट गया था ।आपने संशोधन के लिए सूचित किया, जिसे सद्य स्वीकार किया गया और इसके लिए आपका आभार प्रकट करती हूँ ।
      इति नमस्कारन्ते ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>