शिवताण्डवस्तोत्रम्

श्लोक १५

Shloka 15 Analysis

प्रचण्डवाडवानलप्रभाशुभप्रचारिणी
महाष्टसिद्धिकमिनीजनावहूत जल्पना ।
विमुक्तवामलोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषणो जगज्जयाय जायताम् ।।

प्रचण्डवाडवानलप्रभाशुभप्रचारणी प्रचण्ड + वाडवः + अनलः
+ प्रभा + शुभप्रचारिणी
प्रचण्ड = विकराल
वाडवः = बड़वाग्नि
अनल = अग्नि
वाडवानलः = बड़वानल, समुद्र के भीतर रहने वाली आग
प्रभा = तेज
शुभप्रचारिणी = शुभत्व का प्रसार करने वाली
महाष्टसिद्धिकामिनीजनावहूत महा + अष्टसिद्धि +
कामिनीजन + अवहूत
महाष्टसिद्धि = (अणिमा  आदि) अष्ट महासिद्धियां
कामिनीजन = स्त्रियां
अवहूत = पुकारा गया, बोला गया
जल्पना = मुखरित बोल, अस्फुट बातचीत का रव
विमुक्तवामलोचनो विवाहकालिकध्वनिः
विमुक्तवामलोचनो = कटीले, चपल-चंचल नेत्रों वाली
विवाहकालिकध्वनिः = विवाह के समय गाये जाने वालेमंगल गीतों की ध्वनि
शिवेति मन्त्रभूषणो जगज्जयाय जायताम्
शिवेति = शिव (यह)
मन्त्रभूषणो = मन्त्रभूषणः
मन्त्रभूषणः = श्रेष्ठ मन्त्र, मन्त्रराज, मन्त्रों में सिरमौर
जगज्जयाय = जगत् + जयाय
जगज्जयाय जायताम् = जगविजय करे, जग में उत्कर्ष हो

व्याख्या

volcano‘शिवताण्डवस्तोत्रम्’ के १५ वें श्लोक में रावण पवित्र शिवमंत्र के प्रति अपनी अनन्य श्रद्धा व्यक्त करते हुए उसकी जयकार करता है । स्तुतिकार कहता है कि (पापों का नाश करने में) बड़वानल की भांति प्रचण्ड, तेजोमयी और शुभत्व का प्रसार करने वालीं (अणिमा आदि) महा अष्टसिद्धियां, (शिव-पार्वती) के विवाह के समय, स्त्री स्वरूप में मूर्तिमान हो कर समुपस्थित हुईं व उनकी वाणी से मुखरित होने  वाले बोलों में एवं कटीले, चंचल-चपल नेत्रों वाली, सुर रमणियों द्वारा गाये जाते हुए विवाह-काल के मंगल-गीतों में ध्वनित होने वाला ‘शिव’ नामक यह श्रेष्ठ मंत्र (मन्त्रों में सिरमौर) जग में विजयी हो, अर्थात् जगत में मंगल का प्रसार करे, उसकी विजय-पताका लहराए । शिव-मंत्र को प्रणाम !

vivaha-parvatiप्रस्तुत श्लोक में स्तुतिकार रावण ने जगदम्बा और भगवान शम्भु के शुभ-विवाह की दिव्यता तथा भव्यता का उल्लेख करते हुए शिवमंत्र, जिसे ‘मन्त्रभूषण’ कहा है, की महामहिमा प्रतिपादित करते हुए कामना की है कि यह मंत्रराज लोक में विजय-विस्तार करे, जय-पताका फहराये, जिससे सर्वत्र सर्वप्रकारेण शिव हो, मंगल हो । चतुर्दिक शुभत्व का प्रसार हो एवं पाप-ताप, क्लेश-कालुष्य का विनाश हो । श्लोक में इस दिव्य विवाह में सम्मिलित सिद्धिदात्री देवियों के वर्णन से, अमंगल के अंत और शुभत्व के प्रसार की कामना प्रथम पंक्ति से ही परिलक्षित होती है । रावण के अनुसार समस्त अष्ट महासिद्धियाँ स्त्रीस्वरूप धारण करके  पावन विवाहोत्सव में विराजमान हुईं । उन्हें इस विशेषण से वर्णित किया गया है ” प्रचण्डवाडवानलप्रभाशुभप्रचारणी “, जिसका अर्थ है , पाप-राशि को बड़वानल की भांति जला कर नष्ट करने वालीं व इस पाप-नाश के फलस्वरूप  शुभ ही शुभ शेष रह जाने से, उस शुभत्व की प्रचारिणी एवं अमित आभा से परिपूर्ण । जो साक्षात महासिद्धियाँ हों , उनके लिए तो इन सब शब्दों का कुछ विशेष प्रयोजन नहीं है, किन्तु रावण का आशय है इनके माध्यम से मंत्रराज शिवमंत्र  का मुक्त-कण्ठ से महिमा-गान करना व  अपना अभीष्ट जन-जन तक पहुंचाना ।

रावण आगे कहता है कि साक्षात स्त्रीरूप में मूर्तिमती होकर विवाह में समुपस्थित उन शुभांगनाओं के कलकण्ठ से श्रुतिमधुर वाणी मुखरित हुई । साथ ही चंचल-चपल नेत्रों वाली सुररमणियों ने परिणय-समय में गाये जाने वाले मंगल-गीत सस्वर गाये । विवाह-स्थल के श्रवणसुखद कोलाहल  में भगवान शिव अर्थात् वर का नाम ले कर सभी देवियों ने हर्षोल्लास से गायन किया ।  इसीलिए वहां जो ब्रह्मघोष गूंजा, उसमें शिवमन्त्र ध्वनित होने की बात रावण कहता है । संभवतया वर का नाम ले ले कर सौभाग्यवती स्त्रियों द्वारा गायन की प्रथा का आरम्भ यहीं से हुआ होगा । आज भी विवाह के अवसरों पर बड़े हास-परिहास से वर व वरपक्ष के लोगों का नाम ले ले कर, अति मृदुलता से प्रीतिपूर्वक उनका उपहास करते हुए, कन्यापक्ष की सौभाग्यवती, चतुर स्त्रियां, गीतों में मनभावनी, सुहावनी-सी मीठी-मीठी गालियां देते हुए संगीतमय आयोजन में मनोरंजन व विनोद का विधान करती हैं और यह शुभ माना जाता है । सुरबालाओं, shiva-parvati सुरांगनाओं को चंचल-लोल नेत्रों वाली कहने के पीछे तथा उनके कर्णप्रिय बोलों को ‘जल्पना’ कहने के पीछे भी यही आशय निहित है कि वे स्त्रियोचित प्रीति-परिहास से, मनहरण करने वाले मीठे मीठे बोलों से, विशाल महाआयोजन में उठने वाली, विभिन्न अस्फुट ध्वनियों के दिव्य-रव के बीच शिवनाम से शुभवर्धन कर रही हैं । जगदम्बा व शिव के परिणय-समय, वहां मंगल गीतों में गुंजित ‘शिव’ नाम की गिरा से दिशाएं परिव्याप्त हो गईं । वेदपाठ की मांगलिक ध्वनियों से वातावरण गूँज उठा । उस मंगल-घोष में निनादित शिव के नाम को रावण ने ‘मन्त्रभूषण’, अर्थात मन्त्रों में सिरमौर कह कर नमन किया है । स्तुतिकार ने कामना की है कि उन स्त्रीविग्रह-रूपिणी सिद्धियों व सुरांगनाओं द्वारा मुखरित, विवाह-कालिक मंगल घोष में निनादित, इस मन्त्रराज की जय हो । प्रकारांतर से सर्वत्र निर्बाध गति से प्रसृत हो, जिससे लोक का मंगल हो, सबका हित-साधन हो ।

यहां द्रष्टव्य है कि पाप-समूह को जलाने वाली महासिद्धियों को ‘बड़वानल’ कहा । बड़वानल या बड़वाग्नि समुद्र में स्थित वह भयंकर अग्नि है जिसके कारण महाविनाश हो जाता है । बड़वानल के विषय में विज्ञान के प्राध्यापक प्रो. रामदास गौड़ के द्वारा बताये गए कतिपय तथ्य, जो रोचक और ज्ञानवर्धक भीं हैं, गीता प्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित ग्रन्थ ‘मानस-पीयूष, खंड-६ में उपलब्ध होते हैं, जिनका निचोड़ इस प्रकार है । प्रो. गौड़ के अनुसार इस वर्तमान श्वेतवाराह कल्प के उषःकाल में, लगभग २ करोड़ चालीस लाख वर्ष पूर्व इस धरती की अत्यंत उत्तप्त दशा थी । (आधुनिक विज्ञान का भी यह कहना है कि करोड़ों वर्ष पहले यह पृथ्वी सूर्य के गोले-सी गर्म थी ) ।  उस समय पत्थर व अन्य कच्ची धातुएं अधिकांश द्रव और अर्धघन अवस्था में थी । विशालकाय पर्वत तरल रूप में जलती हुई वायु के झोंकों से लाखों वर्षों तक इधर-उधर उड़ते रहे (पुराणों में कदाचित इसी को पर्वतों का पंखयुक्त होना कहा गया है) । कालान्तर में धरती के ताप के घटने से पत्थरों व अन्य धातुओं का द्रव जलरूप में ढल कर बररसता जाता था और जम कर ठोस होता जाता था । पृथ्वी १२०० दर्जे तक ठंडी हुई, तब उसके उपरी तल का चिप्पड़ ठोस और अचल हो गया । यह पहाड़ थे, जो अचल हो गए । फिर भी भूगर्भ के भीतर बड़वानल से उत्तप्त पहाड़ ‘चल’ ही रह गए । ये ज्वालामुखी के रूप में महासागर के गहरे भीतर अब भी वर्तमान हैं और इनके चलने से धरती फटती है व कई द्वीप बह जाते हैं ।  यह चलने वाले पहाड़ या भूगर्भ का बड़वानल जब चाहे उपद्रव खड़ा कर देते हैं तथा महाविनाश का कारण बनते हैं ।

बड़वानल की बात करते हुए इस तथ्य को रेखांकित करना अप्रासंगिक नहीं लगता कि आर्ष-ग्रंथों में ऐसे ऐसे वैज्ञानिक तथ्यों का सहज विवरण पाया जाता है, जिन्हें पाश्चात्य देशों के वैज्ञानिक लाखों वर्षों के अन्तराल के बाद, अथक प्रयासों के अनन्तर खोज कर गर्वान्वित अनुभव करते हैं । ‘श्वेताश्वतरोपनिषद्’  के ६ठे अध्याय के १५ वें मन्त्र में प्राचीन ऋषि ने परमात्मा के सन्दर्भ में ‘जल में अग्नि के सन्निहित’ होने की बात कही है –

एको हंसो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्निः सलिल संनिविष्टः।

अर्थात इस लोक के मध्य में एक ही हंस (परमात्मा) है, वह जल में अग्नि के समान अगोचर है । ‘जल में अग्नि के होने का ज्ञान’ ऋषि के लिए कोई बड़ी बात हो ऐसा उसकी शैली से कहीं नहीं झलकता । लगता है मानों वह कोई बड़ी जानी मानी बात कह रहा हो, जैसे साधारणतया उपमा दी जाती है कि मुखड़ा चाँद-सा है,  कुछ इसी साधारण भाव से ऋषि यह कहता हुआ प्रतीत होता है कि परमात्मा इस लोvolcano_into_the_seaक में ऐसे रहता है जैसे जल में अग्नि रहती है ‘…एवाग्निः सलिल संनिविष्टः’ । विद्वान लेखक प॰ श्रीराम शर्मा आचार्य इस मन्त्र के सन्दर्भ में कहते हैं कि “जल की उत्पत्ति अग्नि से होती है (अग्नेरापः) और अग्नि जल में समाविष्ट है ‘बड़वानल’ के रूप में, यह सिद्धांत विज्ञानं-सम्मत है (हाइड्रोजन + ऑक्सीजन + ताप = पानी)” । ऋषि के कहने के ढंग से हमें ज्ञात होता है कि उस काल तक तो विज्ञान का यह सत्य कितना पुराना पड़ चुका था ।

समुद्र के गर्त्त में ज्वालामुखी के रूप रहती हुई, विनाश का ताण्डव करने वाली इस अग्नि को ‘सुबाड़वाग्नि  भी कहते हैं । हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि-नाटककार श्री जयशंकर प्रसाद अपने एक ऐतिहासिक नाटक ‘स्कंदगुप्त’ के आह्वान-गीत में आर्यावर्त्त के वीरों में ओज भरते हुए कहते हैं,

शत्रु-सैन्य-सिंधु में
सुबाड़वाग्नि से जलो
प्रवीर हो जयी बनो
बढ़े चलो बढ़े चलो

‘सिद्धिदः’ भी भगवान शिव का एक नाम है । संयम में संस्थित, योग से समन्वित, तपःपूत योगीगण उनसे सिद्धियों को प्राप्त करते है । वे स्वार्थवश इनका दुरुपयोग नहीं करते । ‘पातञ्जलयोगप्रदीप’ नामक ग्रन्थ में अष्ट-सिद्धियों का संक्षिप्त उल्लेख इस प्रकार मिलता है ।

अणिमा शरीर का सूक्ष्म रूप कर लेना
लघिमा शरीर का हल्का कर लेना
महिमा शरीर को बड़ा कर लेना
प्राप्ति जिस पदार्थ को चाहे प्राप्त कर लेना
प्राकाम्य बिना रुकावट के इच्छा का पूर्ण होना
वशित्व पाँचों भूतों तथा भौतिक पदार्थों को वश में कर लेना
ईशित्व भूत-भौतिक पदार्थों के उत्पत्ति-विनाश का सामर्थ्य
यात्राकामावसायित्व प्रत्येक संकल्प का पूरा हो जाना अर्थात् जैसा

योगी संकल्प करे उसके अनुसार भूतों के स्वभाव का अवस्थापन हो जाना

जिस प्रकार वेदों की ऋचाएँ द्वापर युग में कृष्ण-जन्म  के समय भूमण्डल पर, ब्रज धरा पर गोपियाँ बन कर अवतरित हुई थीं,  कुछ इसी प्रकार महा अष्टसिद्धियां शिव-विवाह के अवसर पर स्त्री रूप में समुपस्थित हुईं व श्रीमयी इन देवियों ने अपनी श्रुतिमधुर गिरा से ब्रह्मघोष किया ।

रावण ने अत्यंत सुन्दर व सजीव शब्दों में दिव्य विवाह-प्रसंग parvati-parameshvrwti5bj.D.0.Shiva-Parvati-Mahashivratri-Picकी एक पावन झलक प्रस्तुत की है ।  जो अनकहा है उसे भी हृदयंगम किया जा सकता है । चंचल-चक्षु सुरांगनाओं के वहां होने से उनके स्वामियों की अनकही उपस्थिति का भी बोध होता है । मंगल-ध्वनियों से एक अभिप्राय वेदपाठ की ध्वनियों से भी है जो वेदोक्त विधि-विधानों से विवाह के सम्पन होने को सूचित करती हैं । इस दिव्य विवाह के प्रत्येक पक्ष को आलोकित करना रावण का अभीष्ट नहीं है, इन सब से उसका प्रयोजन है शिवमंत्र की महिमा को रेखांकित करना व उसकी जयजयकार करना । अतः विवाह-कालिक अन्य विवरण यहाँ प्राप्त नहीं होते । बात यहाँ जगदम्बा और आशुतोष प्रभु के दिव्य-विवाह की है तो चलते-चलते अन्यत्र दिए गए इस पावन प्रसंग के कतिपय वर्णनों पर एक विहंगम दृष्टि डाल लेना विषयांतर न होगा ।

विविध  स्थलों पर प्राप्त वर्णनों के अनुसार  शिव-पार्वती के विवाह में मूर्तिमान रूप धारण करके वेद, पुराण, शास्त्र , आगम आदि समागत हुए एवं पितामह ब्रह्माजी, श्रीविष्णु, सनकादि ऋषि, महासिद्ध व तपोनिधि ऋषिगण , देवराज देव-मंडली सहित, नारद मुनि , तुम्बरु , हा हा और हू हू आदि श्रेष्ठ गन्धर्व गण व किन्नर गण समुपस्थित थे । सभी प्रकार के देवता भी वहां विराजमान थे, जैसे आठ दिक्पाल, अष्ट वसु , एकादश रुद्र, बारह आदित्य,  उनचास मरुत एवं यक्ष और नाग आदि । साथ ही सभी जगन्माताएं, देवांगनाएँ, गायत्री, सावित्री, लक्ष्मी आदि सिद्धिदात्री देवियाँ भी वहां विराजमान हुईं । गोस्वामी तुलसीदास ‘पार्वती मंगल’ में कहते हैं “गन भये मंगल वेष मदन मन मोहन” अर्थात् शिवगणों ने भी सुन्दर स्वरूप धारण कर लिया था  व उनका रूप कामदेव का मन मोहने वाला था एवं शिवजी ने भी भयंकर रूप को त्याग कर सुन्दर रूप अपना लिया था । वे शरद पूर्णिमा के चन्द्र-से जान पड़ते थे” संभु सरद राकेस”। उत्साह-उत्सव में विविध वाद्यों की ध्वनि से वातावरण गुंजायमान था ।  दशों दिशाएं मांगलिक निनाद से परिव्याप्त हो उठीं थीं । ब्रह्माजी ने वेदोक्त विधि से विवाह कराया । देवता वेद-पाठ कर रहे थे । गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’में इस पावन प्रसंग का बड़ा सुष्ठु वर्णन किया है ।

बिबिध पाँति बैठी जेवनारा । लागे परसन निपुण सुआरा ।।
नारीबृंद सुर जेंवत जानी ।  लॉगिन दें गारी मृदु बानी ।।

अर्थात् देवताओं की पाँति जेवनार को बैठी । प्रवीण रसोइये पिरसने लगे । देवताओं को भोजन करता जान, स्त्रीवृंद मीठी, कोमल गालियां गाने लगा (स्त्रियाँ  मीठे-मनोरंजक, व्यंग भरे वचन सुनाने लगीं) ।

Shiv-Parvati-Vivahआगे गोस्वामीजी बताते हैं – “बेदी बेद-बिधान संवारी । सुभग सुमंगल गावहिं नारी ।।” अर्थात् वेदों के विधान के अनुसार वेदी सजाई गई और सौभाग्यवती नारियों ने मंगल-गायन किया । सौभाग्यवती स्त्रियों द्वारा वर का नाम ले ले कर मंगल-गीत गाने की प्रथा आज भी समाज में ज्यों की त्यों बनी  हुई है । चतुर स्त्रियां  आज भी ‘पार्वती मंगल’, ‘जानकी मंगल’ के मंगल गीतों का गायन करती हैं, और अब तक वर-मंडप में वर के नाम से बरना व कन्या-मंडप में कन्या के नाम से बरने गाये जाते हैं । अस्तु ।

अंत में ‘जय’ शब्द पर एक विहंगम दृष्टि डालनी अपेक्षित है । मानस-पीयूष (खण्ड २) में विद्वान लेखक श्री सूर्य प्रसाद मिश्र के कथनानुसार ‘जय’ शब्द के दो प्रमुख अर्थ हैं, शत्रु को जीतना तथा दूसरा अर्थ है ‘नमस्कार’ अथवा ‘प्रणाम’ । यह नमन करने के अर्थ में प्रयुक्त होता है । जैसे ‘जय जगदीश हरे ।’ कुछ लोग ‘जय हो’ कह कर अभिवादन करते हैं । ‘अमर विवेक’ ग्रन्थ के अनुसार शत्रु को जीतने से प्राप्त उत्कर्ष ‘जय’ है ।

जयः शत्रुपरांगमुखीकरणेन लब्धस्योत्कर्षस्य इत्यमरविवेके ।

प्रस्तुत श्लोक में मंगल-ध्वनियों और आनंदोल्लास से वातावरण प्रपूरित है, और क्यों न हो, शिव और शक्ति का विवाह है तथा यह सम्पूर्ण जगत शिव-शक्तिमय है, पार्वती -परमेश्वर जगत के माता-पिता हैं । रावण नमन करता हुआ मंत्रराज की जयकार करता है ।

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