शिवताण्डवस्तोत्रम्

श्लोक ७

Shloka 7 Analysis

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्जवल-
द्धनंजयाहुतीकृतप्रचंडपंचसायके ।
धराधरेंद्रनंदिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ।।

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्जवल करालभाल + पट्टिका +
धगद्धगद्धगद् + ज्वलत्
कराल = विकराल
भालपट्टिका = ललाटपट, मस्तकपट
धगद्धगद्धगद्ध = धधक धधक कर
ज्वलत् = जलाता हुआ
द्धनंजयाहुतीकृतप्रचंडपंचसायके धनञ्जय + आहुतीकृत +
प्रचंड + पंचसायकः
धनञ्जय = अग्नि, अग्नि का एक नाम
आहुतीकृत = हवि बना दिया
प्रचंड = दुर्दम ,दुद्धर्ष
पंचसायकः = कामदेव, पंचशर
धराधरेंद्रनन्दिनी कुचाग्र चित्रपत्रक
धराधरेंद्रनन्दिनी = पर्वतराजपुत्री, पार्वती
कुचाग्र = वक्षस्थल का अग्रभाग
चित्रपत्रक = अंगों पर विविध प्रकार की चित्रकारी करना, पत्र -रचना करना
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम
प्रकल्पनैक शिल्पिनि = चतुर चितेरे या सिद्धहस्त कलाकार में
त्रिलोचने = भगवन त्रिनयन में
रतिः + मम = रतिर्मम
रतिः = प्रीति, अनुराग
मम = मेरी

व्याख्या

`शिवताण्डवस्तोत्रम्` के सातवें श्लोक में रावण कहते हैं कि शिवजी के मस्तक पर धधकती हुई विकराल अग्नि ने दुद्धर्ष  पंचशर अर्थात्  कामदेव को हवि बना लिया । उन्हें भस्मीकृत कर दिया । पर्वतराज पुत्री के वक्ष-कक्ष पर विविध प्रकार से श्रृंगारिक पत्र-रचना करने में कुशल कलाकार, उन भगवान त्रिनयन में मेरी प्रीति सदा बनी रहे, मेरी धारणा लगी रहे ।

AgniDevप्रस्तुत श्लोक में रावण भगवान त्रिनेत्र के तीसरे नेत्र से समुद्भूत संहारक अग्नि की  महाज्वाला की विकरालता व  विलक्षणता वर्णित करते हुए कहते हैं कि शंकर के मस्तकपट से विनिःसृत धधकती हुई प्रचंड अग्नि ने पंचशर अर्थात्  कामदेव को अपनी हवि  बना लिया, हुताशन ने पुष्पधन्वा की आहुति ग्रहण कर ली, भालाग्नि देखते ही देखते उन्हें लील गई । स्तुतिकार के कथन का आशय है कि मन्मथ को तपोभंग के असाधु आचरण पर उद्यत देख कर महक्रोधाविष्ट हो कर महादेव ने अपने भाल पर स्थित तीसरे नेत्र को खोल दिया, जिससे कालाग्नि की भांति धधकती हुई प्रचंड कराल ज्वाल निकली तथा दुर्दम, दुस्सह कामदेव को तत्क्षण वहीँ भस्मीभूत कर दिया । विद्वान लेखक श्री सुदर्शन सिंह `चक्र` के अनुसार  प्रलयंकर प्रभु तो स्वयं ही अग्निमात्र के परमोद्गम, परमाराध्य हैं । उनका तृतीय नेत्र ही अग्नि का वास्तविक आवास है ।  `अग्निपुराण` के अनुसार अग्निदेव सात जिव्हाओं से युक्त हैं । इनके नाम हैं, कराली, धूमिनी, श्वेता, लोहिता, नीललोहिता, सुवर्णा, पद्मरागा ।  श्री चक्र के अनुसार शास्त्रों ने मरुत तथा अग्नि के उनचास-उनचास भेद किये हैं, किन्तु उन सभी का नाम केवल वैदिक महायज्ञों में ही स्मरण किया जाता है । `पंचाग्नि` के रूप में अग्निहोत्र के अर्थ घरों में अग्नि रखी जाती है । आवसथ्य, गार्हस्थ्य, आवाहनीय, सभ्य एवं दक्षिणाग्नि, यह पंचाग्नियों  का समूह है ।  दावाग्नि, बड़वाग्नि, जठराग्नि, वैद्युताग्नि आदि भी अग्नि के रूप है । उनके कथनानुसार अनेक ज्वलनशील पदार्थों के रूप में अग्निदेव धरित्री के उदर  में असंख्य  वर्षों तक रहे ।  अग्नि को `धनञ्जय` भी कहते हैं । कई स्थानों पर अग्नि ज्वालामुखी बन कर फूट निकलती है । अग्नि की – उष्णता की अनुपस्थिति भी प्रलय ही करती है।  आज के भूतत्वशास्त्री भलीभांति जानते हैं कि पृथ्वी पर कितनी बार हिमयुग आया है और उससे कितना विनाश हुआ है । अस्तु, यही कराल अग्नि मदन को लील गई।

सातवें श्लोक में `कराल` शब्द अग्नि की भयंकरता का 

कामदेवद्योतक है और `प्रचंड पञ्चसायके` कह कर रावण ने मदन को दुस्सह बताया है, जबकि वे पुष्पधन्वा हैं,  पुष्पसायक, कुसुमायुध हैं । पुष्पों के हेतु से उनके पञ्चशरों के नाम हैं – `अरविन्दमशोकं च आम्रं च नवमल्लिका, नीलोत्पलं  च पंचैते पंचबाणस्य सायकाः।` मदन (कामदेव) के लिए कहा गया है कि, “स्मारं पुष्पमयं चापं बाणाः पुष्पमया अपि। तथाप्यनंगस्त्रैलोक्यं करोति वशमात्मनः”, अर्थात्  स्मर (कामदेव) के शरचाप पुष्पमय हैं फिर भी अनंग (कामदेव) ने तीनों लोकों को अपने वश में किया हुआ है । यह कथन अक्षरशः सत्य है । मनोजव का मायाजाल दुर्भेद्य है । मदन की काम-कला की कादम्बरी का मद लोक में सभी को उन्मत्त और विह्वल कर देता  इसमें कुछ अनैसर्गिक नहीं है।  हमारे यहाँ पुरुषार्थ-चतुष्टय में तृतीय पुरुषार्थ के रूप में काम की गणना होती है । भारतीय आध्यात्मिकता `काम` को देवता की श्रेणी में रखती है न कि असुर की । वे कामासुर नहीं, कामदेव हैं । काम का सयंत और धर्मानुशासित आचरण प्रेम के उत्कर्ष में परिणत होता है, जो उसका उज्जवलतम पक्ष है । स्वामी अखंडानन्द सरस्वती ने विवाह संस्कार के विषय में कहा है,” है तो यह पति-पत्नी का सबंध, परन्तु यह भोग से मुक्ति का तरीक़ा है । विवाह भोग नहीं अपितु योग है । यह वर-वधू का संबंध आसक्ति में भक्ति है । ” उनके अनुसार स्वेच्छाचार या स्वच्छन्द आचरण में यह पवित्रता नहीं आ पाती है, किंतु विवाह-संस्कार के बंधन इसी प्रेम भावना का परिष्कार करके उसे उदात्त बना देते हैं । काम को अनंग, मनोज, मनोजव और मनोभव आदि मनपरक नामों से इसीलिए अभिहित किया गया है, क्योंकि इसकी उत्पत्ति मन में होती है । मन के उत्कृष्ट अथवा निकृष्ट भावों से इसे वेष्टित कर मनुष्य सदाचारी या दुराचारी बनता है । क्षुद्र वासनाओं के गर्त्त में गिर कर गर्हित  आचरण करने  वाला प्रेमराज्य में विचरण करने का स्वत्व (अधिकार)  खो बैठता है । `शिव` भाव को पुष्ट करने वाला काम पुरुषार्थ का स्थान पाता है । भगवान शिव द्वारा दग्ध मदन तब हुए जब वे तप, संयम, धर्म को नष्ट करने पर हठधर्मिता से, कुटिलता पर उद्यत हुए।  `शिवसंकल्प सूक्तम्` में मन को `अपूर्व यक्ष` कहा गया है ।  गौतम बुद्ध ने `धम्मपद` में मन के विषय में कहा है कि,

मनो पुब्बङ्गमा धम्मा मनोसेट्ठा मनोमया
मनसा ते पदट्ठेन भासती वा करोति वा

अर्थात्  सभी धर्मों (कार्य-कलापों) का आरम्भ मन से है । मन श्रेष्ठ है । सारे कार्य मनोमय हैं । मन  ऐन्द्रिक विषयों के प्रति अंधी आसक्ति छोड़ जब ईशचिंतन में निरत होता है तब वह अमृत का  धारक हो  जाता है । शिव  के श्रीअंगों मे दत्तचित्त मन की विषय-वासनाएं विलीन हो जाती हैं और वहां प्रवाहित होने लगती है आनंद की अजस्र धारा । यह कथन इस श्लोक की अगली पंक्ति के

पार्वती तपस्या

सन्दर्भ में खरा उतरता है, जिसमें शिव पर्वतराजपुत्री का बड़ी कुशलता से श्रृंगार कर रहे हैं । रावण के अनुसार वे पार्वती के उरःस्थल के अग्रभाग पर पत्र -रचना कर रहे हैं ।   पुरातन समय में देह के अंग-प्रत्यंगों की सौंदर्य-वृद्धि करने के लिए, उन्हें अलंकृत करने के लिए चन्दन, केसर, मेहंदी, कदम्ब, रक्त-चंदन, कस्तूरी आदि सुगन्धित द्रव्यों से शरीर पर चित्रकारी की जाती थी, बिंदियाँ और रेखाएं चित्रांकित की जाती थीं । इन्हें पत्रक, पत्रभंग, पत्रभंगी, चित्रपत्रक, पत्र-रचना तथा पत्रविशेषक  आदि कहा जाता है। संस्कृत रचनाओं में तरु–पादपों, पर्वतों से प्राप्त इन श्रृंगारोपयोगी साधन द्रव्यों से स्त्रियों के समलंकृत होने का उल्लेख स्थान-स्थान पर मिलता है । बाणभट्ट की `कादम्बरी` में तो पत्र -रचना प्रसंगोल्लेख का बाहुल्य है । श्रृंगार तिलक, ऋतुसंहारं, रघुवंशं, कुमारसम्भवं आदि में भी उल्लेख मिलते हैं । एक उदाहरण कालिदास कृत `कुमारसम्भवं` से प्रस्तुत है ।

हिमाव्यापायाद्विशदाधाराणा
मापाण्डरीभूतमुखच्छवीनाम्
स्वेदोद्गमः किम्पुरुषांगनानाम
चक्रे पदं पत्रविशेषकेषु । (३३)
–तृतीय सर्ग

हिमालय पर्वत पर वसंत ऋतू में किन्नरियों की मुखछवि का वर्णन करते हुए कालिदास यहाँ  कह रहे हैं kinnarकि हिमपात के समाप्त हो जाने के कारण निर्मल ओष्ठ और कुछ  श्वेत हुई मुख की कांति वाली किन्नर पत्नियों के मुख पर बनाई गई पत्र-रचना में स्वेद की बूंदों ने अपना स्थान बना लिया, अर्थात् उनकी पत्र-रचना में पसीने की बूँदें झलकने लगीं । अस्तु, इस श्लोक में गिरिजा के शतचन्द्रोज्ज्वल श्रीअंग पर महादेव द्वारा पत्र-रचना करना उनके दाम्पत्य-जीवन के स्नेह-सौहार्द को संकेतित करता है वहां शक्ति की प्रधानता का भी द्योतक है । उनके दिव्य दाम्पत्य जीवन की रस -माधुरी अनुपमेय है और उसका रस-रहस्य अननुमेय । शैलजा शिव की शक्ति हैं।  शक्ति और शक्तिमान में वस्तुतः भेद नहीं है। भगवान त्रिनयन पार्वती के प्राणवल्लभ ही नहीं उनके पुजारी भी हैं । अपने हाथों से उन्हें सजाने वाले, उनके वक्ष-कक्ष के चतुर चितेरे भी है । किसी सिद्धहस्त कलाकार की भांति उमा के उर पर पत्रभंग आदि उनके लीला-नाट्य हैं । वस्तुतः उनके इस श्रृंगार से युगल-तत्व की एकता लक्षित होती है । इसमें काम का संस्पर्श नहीं है।  काम तो स्वयं ही इन मायाधिप की माया से मोहित है । इसीलिए तो वह अज्ञ और अभिमानी  शिवमन  में विकार उत्पन्न करने की बात तक अपने मन में ला पाया । ‘शिवपुराण` में इस बात का उल्लेख है कि शिव की माया से विमोहित हो कर ही मदन ने इंद्र द्वारा कही हुई शिव तपोभंग की बात तुरंत मान ली थी ।

इत्युक्त्वा वचनं तस्मै तथेत्योमिति तद्वचः
अग्रहीत्तरसा कामः शिवमायविमोहितः।
–शिवपुराण

स्वयं माया से मोहित काम यह न समझ पाया कि इनके तो चिंतन-मात्र  से ही मोह-महिष का मर्दन होता है तथा  मन विगत-कल्मष हो जाता है ।  शिव-शिवा का अलौकिक प्रेम व पवित्रतम संबंध वाणी का विषय नहीं ।   इनके तत्व के मर्म को तो वेदवेत्ता मुनि भी  न जान पाये ।  रावण के कथन में गूढ़ार्थ निहित है । रावण के कथन के आशय को समझने के लिए यह जान लेना आवश्यक है कि भगवन शंकर के प्रति उसकी भावनाएं, उसके उदगार प्रेम-गंगा से सिंचित हैं तथा भक्ति-क्षेत्र की अमूल्य निधि हैं । रावण ने परस्पर  विरुद्ध भावों  को उभारा है एक ओर क्रोध की पराकाष्ठा है दूसरी और प्रेम का उत्कर्ष, जहाँ अनंग-संचार नहीं, सात्विकता का संचार है ।

`लिंगपुराण` कहता है कि शिव की गृहिणी दिव्य प्रकृति है। धराधरेंद्रनंदिनी प्रकारांतर से धरित्री ही हैं और धरती के उन्नत भाग अथवा उरःप्रदेश पर्वत हैं।  प्रातः जागरण के समय भूमि-वंदना के श्लोक में पृथ्वी को `पर्वतस्तनों से मंडलित’ कहा गया है। वंदना इस प्रकार है,

समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व में ।

अतः पार्वती को सजाते हुए शिव प्रकारांतर से पर्वतराजपुत्री  के साथ-साथ  धरा को, प्रकृति को भी सजा रहे हैं, क्योंकि उनमें ऐक्य है । उसमें चैतन्य फूंक रहे हैं । रावण का कहना है कि ऐसे त्रिलोचन  प्रभु में मेरी धारणा सतत और सदा लगी रहे । मैं उनकी अनुरक्ति में आनंद प्राप्त करूँ । यह श्लोक भाव-राज्य की लोकोत्तर महिमा का गान है ।

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