श्रीरामरक्षास्तोत्रम्

श्लोक २१

Shloka 21

सन्नद्ध: कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन्मनोरथान्नश्च राम: पातु सलक्ष्मण: ॥२१॥

सन्नद्ध: कवची खड्गी चापबाणधरो युवा
सन्नद्ध: = युद्ध के लिये उद्यत, कटिबद्ध, अस्त्र-शस्त्र से पूर्णत: सज्जित, सुसज्जित, तत्पर
कवची = कवच धारण किये हुए
खड्गी = तलवार लिये हुए
चापबाणधरो = धनुष-बाण धरे हुए
युवा = तरुण, युवक
गच्छन्मनोरथान्नश्च राम: पातु सलक्ष्मण:
गच्छन्मनोरथान्नश्च गच्छन्+ मनोरथान्+ न: + च
गच्छन् = चलते हुए, जाते हुए
मनोरथान् = अभिलाषाओं की, मन की इच्छाओं की, कामनाओं की
न: = हमारे
= और
राम: = श्रीराम
पातु = रक्षा करें
सलक्ष्मण: = लक्ष्मण सहित

अन्वय

सन्नद्ध: कवची खड्गी चापबाणधर: सलक्ष्मण: (अग्रत:) गच्छन् युवा राम: न: मनोरथान् पातु ।

भावार्थ

युद्ध के लिये कटिबद्ध, कवच पहने हुए, खड्ग लिये हुए, धनुष-बाण धरे हुए लक्ष्मण के साथ (आगे-आगे) चलते हुए तरुण श्रीराम हमारी कामनाओं की रक्षा करें (पूर्ति करें) ।

व्याख्या

श्रीरामरक्षास्तोत्रम् के इक्कीसवें श्लोक में प्रभु श्रीराम का जो युद्धोद्यत रूप लक्षित होता है, वह न्यूनाधिक पिछले श्लोक से मिलता हुआ है । रामचन्द्रजी अपने प्रिय और कर्त्तव्यपरायण अनुज लक्ष्मण के संग आगे-आगे चलते हुए चित्रित किये गये हैं । यौवन के ओज से सम्पन्न तेजस्वी तरुण श्रीराम संग्राम-वेश में सज्जित युद्ध के लिये सर्वथा उद्यत दिखाई देते हैं । उनकी खड्ग, जिसे वे लिये हुए हैं, उनकी युद्ध-तत्परता की द्योतक है । धनुष-बाण भी धारण  किये हुए हैं वे और कवच भी उन्होंने पहना हुआ है । उनके संग  उनके छोटे भैया लखनलाल हैं । दोनों एक साथ जा रहे हैं । अतएव उन्हें सलक्ष्मण कहा है ।ऐसे लक्ष्मण सहित चलते हुए राम हमारी अर्थात् हम भक्तों की मनोकामनाओं की  रक्षा करें । दूसरे शब्दों में कहें तो लक्ष्मणजी के संग आगे बढ़ कर चलते हुए रामजी हम भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करें, हमारे मनोरथ सिद्ध करें । हमारी कामनाओं पर उनकी कृपा रहे  और इस तरह मनोरथ रक्षित रहें, यह रघुनाथजी से प्रार्थना है ।

 

प्रस्तुत श्लोक में मनोरथान् —कामनाओं को, मनोरथों को तनिक विस्तृत परिप्रेक्ष्य में देखें तो हम पायेंगे कि कमलनयन के साधकों की साध राम की ओर मुख किये हुए हैं । राम ही चाह हैं, राम ही राह हैं । तृषा है तो केवल नयनाभिराम राम को नयनभर देख लेने की । नैन भी राम, चैन भी राम । उनके सुख से साधक सुखी और उनकी वेदना से व्याकुल होता है । आज भी रामकथा को पढ़ते हुए अनेक स्थलों पर पाठकों के नेत्र वाष्पपूरित हो जाते हैं । और यही होता है उनकी पावन कथा के रसनिमग्न श्रोताओं के साथ । रामरक्षा का अभ्यासी रामचरित का रसायन पाने की कामना का सदा सेवन करता है तथा इसमें सफल मनोरथ होने की आकांक्षा भी करता है ।

 

मन में मंजु मनोरथ हो, री !
– गीतावली—( १०४ )

 

श्लोक २० अनुक्रमणिका श्लोक २२

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