श्रीरामरक्षास्तोत्रम्
श्लोक २०
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आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषंगसंगिनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रत: पथि सदैव गच्छताम् ॥२०॥
| आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषंगसंगिनौ | ||
| आत्त | = | पकड़े हुए, थामे हुए |
| सज्ज | = | सन्धान किये हुए, डोरी कसे हुए |
| धनुषौ | = | धनुषों को |
| इषु | = | बाण (का) |
| स्पृशौ | = | स्पर्श करने वाले , हाथ में बाण लिये हुए |
| अक्षय | = | अचूक, अनश्वर |
| आशुग | = | बाण |
| निषंग | = | तरकश, तूणीर, निखंग |
| संगिनौ | = | सहित |
| रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रत: पथि सदैव गच्छताम् | ||
| रक्षणाय | = | रक्षा के लिये |
| मम | = | मेरी |
| रामलक्ष्मणावग्रत: | → | रामलक्ष्मणौ + अग्रत: |
| रामलक्ष्मणौ | = | राम और लक्ष्मण |
| अग्रत: | = | आगे-आगे |
| पथि | = | पथ में, मार्ग में |
| सदा | = | सदा, हमेशा |
| एव | = | ही |
| गच्छताम् | = | चलें |
अन्वय
आत्तसज्ज धनुषौ इषुस्पृशौ अक्षयाशुगनिषंगसंगिनौ रामलक्ष्मणौ मम रक्षणाय पथि सदा एव अग्रत: गच्छताम् ।
भावार्थ
प्रत्यंचा चढ़े (डोरी कसे) हुए धनुष थामे, हाथों में बाण लिये हुए, अचूक बाणों से युक्त तरकश को लिये हुए राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा के लिये मार्ग में सदा ही मेरे आगे-आगे चलें ।
व्याख्या
श्रीरामरक्षास्तोत्रम् के २०वें श्लोक में राम तथा लक्ष्मण से अपने रक्षण के लिये की गई प्रार्थना देखने को मिलती है, जो राम-लक्ष्मण के रक्षक-रूप का गतिमय चित्र उपस्थित कर देती है । दोनों दशरथकुमारों के हाथों में धनुष-बाण हैं तथा उनके धनुषों पर प्रत्यंचा चढ़ी हुई है । प्रत्यंचा धनुष की डोरी को कहते हैं । यह ज्या, शिंजिनी तथा मौर्वी भी कहलाती है । मूर्वा नाम की एक लता के कुछ भागों से यह डोरी तैयार की जाती है, अत: इसे मौर्वी भी कहते हैं । स+ज्या अर्थात् ज्या सहित का भाव कुछ विद्वान आत्तसज्ज के सज्ज शब्द में देखते हैं । इनके बाण अक्षय अथवा अनश्वर हैं । लक्ष्य को कदापि न चूकने के कारण ये बाण अचूक कहे जाते हैं । इन्हीं अक्षय बाणों से युक्त हैं इनके तूणीर तथा इनसे विनय यह है कि इन सभी से सुसज्जित राम-लक्ष्मण मेरा रक्षण सदा ही करते रहें । एतदर्थ ये दोनों मार्ग में मुझसे आगे-आगे चलें । प्रथम दृष्टि में यह श्लोक बड़ा कठिन प्रतीत होता है, किन्तु सन्धि-समास को अलग करके पढ़ने पर इसके सही अर्थ का समवबोध होता है । नीचे इसी का एक लघु प्रयास किया गया है ।सज्ज धनुष का अर्थ है वह धनुष, जिसकी डोरी (प्रत्यंचा) चढ़ी हुई हो और आत्त अर्थात् लिया हुआ । इस तरह आत्तसज्जधनुषौ का यह अर्थ हुआ कि चढ़ी हुई प्रत्यंचा वाले धनुष को लिये हुए दो व्यक्ति अथवा पुरुष । आगे का शब्द है इषुस्पृशौ । इषु कहते हैं बाण को तथा स्पृशौ का अर्थ है स्पर्श करने वाले दो जन । पूरे का शाब्दिक का अर्थ है बाणों को स्पर्श करने वाले दो व्यक्ति और तात्पर्य है हाथ में बाण लिये हुए । आत्तसज्जधनुषौ + इषुस्पृशौ = आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशौ तथा पूरे शब्द का अर्थ है चढ़ी हुई प्रत्यंचा वाले अथवा सन्धान किये हुए धनुष लिये हुए, बाणों को छूते हुए …। इसके बाद अगला जुड़ा हुआ शब्द है अक्षयाशुग, अक्षय + आशुग । अक्षय का अर्थ है अचूक, अनश्वर और आशुग का अर्थ होता है बाण । कुल अर्थ हुआ इन दो जुड़े शब्दों का अचूक बाण । अब पहले वाले लंबे शब्द से इस शब्द को जोड़ कर एक शब्द हुआ आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशौ + अक्षयाशुग = आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुग, जिससे निकलने वाला अर्थ है — सन्धान किया हुआ धनुष लिये हुए, बाणों का स्पर्श किये हुए और अचूक बाण…। अगला जुड़ा हुआ शब्द है निषंगसंगिनौ, निषंग + संगिनौ । इसमें निषंग का अर्थ है तरकस अथवा तरकश, जिसे तूणीर या निखंग भी कहते हैं । संग शब्द युक्त अथवा सहित का , साथ होने का बोध कराता है तथा पूरे शब्द का अर्थ है तरकश लिये हुए । अब इन सब शब्दों को जोड़ कर बीसवें श्लोक की पहली पंक्ति या पहला पद बनता है आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषंगसंगिनौ । इस तरह पहली पंक्ति पूरे एक लंबे शब्द में आ जाती है । इससे इस अर्थ का अवबोध होता है कि चढ़ी हुई प्रत्यंचा वाले अथवा सन्धान किये हुए धनुष लिये, बाणों को स्पर्श किये हुए और (अपने) अचूक तीरों से युक्त तरकश को लिये हुए …।
२०वें श्लोक की दूसरी पंक्ति अथवा पद में आगे की बात वर्णित है, जिसमें विनय किया गया है कि (ऊपर दिये गये सभी विशेषणों वाले दोनों) राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा करने के लिये सदा-सदा ही मार्ग में मेरे आगे हो कर चलें ।
| श्लोक १७, १८, १९ | अनुक्रमणिका | श्लोक २१ |
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