श्रीरामरक्षास्तोत्रम्
श्लोक १६
Shloka 16![]()
आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम् ।
अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान्स न: प्रभु: ॥१६॥
| आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम् | ||
| आराम: | = | उपवन, उद्यान |
| कल्पवृक्षाणाम् | = | कामनाओं की पूर्ति करने वाले कल्पतरुओं के |
| विराम: | = | अन्त (करने वाले) |
| सकलापदाम् | → | सकल + आपदाम् |
| सकल | = | सभी |
| आपदाम् | = | विपत्तियों के |
| अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान्स न: प्रभु: | ||
| अभिरामस्त्रिलोकानाम् | → | अभिराम: + त्रिलोकानाम् |
| अभिराम: | = | अति सुंदर |
| त्रिलोकानाम् | = | तीनों लोकों में |
| राम: | = | रामजी |
| श्रीमान | = | श्रीयुत् |
| स: | = | वे |
| न: | = | हमारे |
| प्रभु: | = | स्वामी (हैं) |
अन्वय
(य:) कल्पवृक्षाणाम् आराम: सकल आपदाम् विराम: त्रिलोकानाम् अभिराम: स: श्रीमान राम: न: प्रभु: ।
भावार्थ
जो कल्पतरुओं के उद्यान हैं, सभी विपत्तियों का अन्त करने वाले हैं हैं, तीनों लोकों में सर्वाधिक सुन्दर हैं, वे श्रीयुत् राम हमारे स्वामी हैं ।
व्याख्या

सोलहवें श्लोक में आगे श्रीराम को विराम: सकलापदाम् कहा है । विराम: का अर्थ है अन्त, समाप्ति, उपसंहार । सकल आपदा-विपदाओं के वे अन्त हैं, दूसरे शब्दों में कहें तो अन्त करने वाले हैं, विपदाओं के वारक हैं । अगली पंक्ति में कहा है कि तीनों लोकों में सबसे सुंदर हैं । त्रिलोकी की सुन्दरता एवं सुषमा की सुनिर्मल छटा हैं श्रीराम, त्रिभुवन-सुन्दर हैं श्रीराम । तीनों लोकों की लक्ष्मी जिनका पाद-संवाहन करती हैं, ऐसे श्रीनिवास हैं श्रीराम । हम सनाथ हैं उन्हीं लोकातीत सौन्दर्य-राशि रमापति से । यही श्रीमान् राम अर्थात्
| श्लोक १५ | अनुक्रमणिका | श्लोक १७, १८, १९ |
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