श्रीरामरक्षास्तोत्रम्

श्लोक २५

Shloka 25

रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम् ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नरा: ॥२५॥

रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम्
रामम् = राम को
दूर्वादलश्यामम् = दूब घास के तिनके जैसे श्याम वर्ण वाले को
पद्माक्षम् = कमलनयन को
पीतवाससम् = पीत वस्त्रधारी को
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नरा:
स्तुवन्ति = स्तुति करके पूजते हैं
नामभिर्दिव्यैर्न नामभि: + दिव्यै: + न
नामभि: = नामों से
दिव्यै: = दिव्य, सुंदर (नामों से, जो)
= नहीं (होते हैं)
ते = वे (मनुष्य)
संसारिण: = संसारी (संसार-चक्र से बंधे हुए)
नरा: = लोग, पुरुष

अन्वय

( ये ) दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससं रामं दिव्यै: नामभि: स्तुवन्ति ते नरा: संसारिण: न ।

भावार्थ

जो दूब के तिनके सरीखे सांवले, कमल जैसे नयनों वाले, पीताम्बरधारी श्रीराम की दिव्य नामों से स्तुति करते हैं, वे मनुष्य संसारी नहीं होते हैं । तात्पर्य यह कि ऐसे लोग संसार के अथवा जन्म-मरण के चक्र से बंधे हुए नहीं होते हैं अर्थात् वे मुक्त होते हैं ।

व्याख्या

श्रीरामरक्षास्तोत्रम् के श्लोक संख्या २५ में श्रीराम के कतिपय अन्य पावन नामों का वर्णन मिलता है । वे नाम हैं। यहाँ कहा गया है कि इन दिव्य नामों से श्रीराम की स्तुति का करने वाले, स्मरण करने वाले मनुष्य संसारी नहीं होते हैं । संसारी न होने से तात्पर्य है कि वे संसार में व उसके मायाजाल में, आवागमन के चक्र में नहीं बंधते हैं । गोस्वामी तुलसीदास रामचरितमानस में कहते हैं कि —
जासु नाम सुमिरत एक बारा । उतरहिं नर भवसिंधु अपारा ॥
— रामचरितमानस

 

अर्थात् राम का नाम एक बार ही ले लेने से मनुष्य भवसागर के पार उतर जाता है । वे अकारण करुणावरुणालय सुमिरन-भजन करने वाले भक्त को चौरासी के चक्र में फँसने नहीं देते । यही बात श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं — न मे भक्त: प्रणश्यति ( ९ । ३१ ) अर्थात् मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता ।
इस श्लोक में वर्णित पतितपावन राम के जगतारक दिव्य नाम वर्णित हैं, उनमें पहला नाम है दूर्वादलश्याम अर्थात् दूब नामक तृण के पत्र ( पत्ते ) की भाँति श्यामल वर्ण वाले राम । दूर्वा कहते हैं दूब को । दूब को प्रथम पूज्य देव गणेशजी के पूजन के समय उन्हें चढ़ाया जाता है । यह पवित्र घास होती है । इस श्लोक में राम के सांवले रंग को दूब घास के पत्ते की उपमा दी गई है, जो पहली दृष्टि में पाठक को अटपटी लग सकती है, क्योंकि कहाँ दूब की हरी-हरी घास और कहाँ श्रीराम का सलोना श्यामल वर्ण । वास्तव में इस उपमा के पीछे कविजन परम्परा की भावधारा प्रवाहमान है । काव्य परम्परा में श्यामल रंग हरे रंग की उपमा से शोभित किया जाता रहा है । इस विषय में प. हजारीप्रसाद द्विवेदी का यह कथन दृष्टव्य है कृष्ण, नील, हरित, श्याम आदि रंगों का प्रयोग एक-दूसरे के स्थान पर किया जा सकता है । यह मान लिया जाता है कि ये रंग एकार्थवाचक हैं । यदि घने घने हरे द्रुमों को दूर से देखा जाये तो वहाँ भी कुछ श्यामलता का आभास होता है । हमारे राष्ट्रीय गीत वन्दे मातरम् में भी शस्य श्यामला शब्द का प्रयोग मिलता है । प्रस्तुत श्लोक में इसी प्रकार सांवले सलोने राम को दूर्वादलश्याम कह कर पुकारा गया है ।

 

श्रीराम का दूसरा दिव्य नाम दिया है पद्माक्ष अर्थात् अक्ष अथवा नयन हैं जिनके कमल के समान, दूसरे शब्दों में कमलनयन राम । तीसरा दिव्य व उद्धारक नाम उनका पीतवाससम् कहा गया है । उनके इस पावन नाम से अभिप्राय राम के उस रूप से है, जिसमें वे पीतपट धारण किये हुए हैं । श्लोक की दूसरी पंक्ति में कहा गया है कि इन दिव्य नामों से राम की स्तुति जो मनुष्य करते हैं वे नर संसारपाश वाले नहीं होते । संसार से तात्पर्य है भव-भव के बन्धन से, जन्म-मरण के विकट चक्र से, चौरासी के चक्कर से । बार-बार माता के गर्भ में आना संसार है । सच तो यह है कि रामनाम लिखे हुए तो पत्थर भी तैर गये । रामनिष्ठ मनुष्य तो फिर भी मनुष्य है ।

 

इस श्लोक के अनुसार जो उपर्युक्त नामों से श्रीराम की स्तुति करते हैं, वे संसार-सागर का संतरण कर जाते हैं । संसार का अर्थ केवल दुनिया ही नहीं है, अपितु आवागमन के क्रम, व प्रपंच मायाजाल को भी संसार कहते हैं ।
श्लोक २२,२३,२४ अनुक्रमणिका

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