श्रीरामरक्षास्तोत्रम्
श्लोक २६
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रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् ।
राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिं
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ॥२६॥
| रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं | ||
| रामम् | = | राम को |
| लक्ष्मणपूर्वजम् | → | लक्ष्मण + पूर्वजम् |
| लक्ष्मण | = | लक्ष्मणजी |
| पूर्वजम् | = | के अग्रज को |
| रघुवरम् | = | रघुकुल में श्रेष्ठ को |
| सीतापतिम् | → | सीता + पतिम् |
| सीता | = | सीताजी |
| पतिम् | = | के पति को |
| सुन्दरम् | = | सुन्दर लगने वाले को |
| काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् | ||
| काकुत्स्थम् | = | ककुत्स्थ के वंशज को |
| करुणार्णवम् | → | करुणा + अर्णवम् |
| करुणा | = | करुणा |
| अर्णवम् | = | के सागर को |
| गुणनिधिम् | → | गुण + निधिम् |
| गुण | = | गुणों |
| निधिम् | = | के भण्डार को |
| विप्रप्रियम् | → | विप्र + प्रियम् |
| विप्र | = | ब्राह्मणों / ब्रह्मज्ञानी |
| प्रियम् | = | १ — के प्रिय को; २ — प्रेमी को |
| धार्मिकम् | = | धर्मनिष्ठ को, धर्मशील को |
| राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिं | ||
| राजेन्द्रम् | = | राजाओं में श्रेष्ठ को |
| सत्यसन्धम् | → | सत्य + सन्धम् |
| सत्य | = | सत्य |
| सन्धम् | = | जो अपने वचन पर डटा रहता है, उसे |
| दशरथतनयम् | → | दशरथ + तनयम् |
| दशरथ | = | दशरथ |
| तनयम् | = | पुत्र को |
| श्यामलम् | = | सांवले को |
| शान्तमूर्तिम् | → | शान्त + मूर्तिम् |
| शान्त | = | शान्ति |
| मूर्तिम् | = | की मूरत को |
| वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् | ||
| वन्दे | = | (मैं) वन्दन करता हूँ |
| लोकाभिरामम् | → | लोक + अभिरामम् |
| लोक | = | लोगों |
| अभिरामम् | = | को मनोहर लगने वाले को |
| रघुकुलतिलकम् | → | रघुकुल + तिलकम् |
| रघुकुल | = | रघुकुल |
| तिलकम् | = | के सर्वश्रेष्ठ को |
| राघवम् | = | महाराज रघु के वंशज को |
| रावणारिम् | → | रावण + अरिम् |
| रावण | = | रावण |
| अरिम् | = | के शत्रु को |
अन्वय
लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकं राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिं लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिं रामं वन्दे ।
भावार्थ
लक्ष्मण के बड़े भैया, रघुवंश में श्रेष्ठ ( राम ), सीताजी के पति, सुन्दर, ककुत्स्थ के वंशज, करुणा के सागर, गुणनिधान, विप्रप्रेमी, धर्मनिष्ठ, राजाओं में श्रेष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ, दशरथपुत्र, सांवले, सुशान्त, लोक-मनोहर, रघुवंशशिरोमणि, रघु के वंशज, रावणशत्रु राम का मैं वन्दन करता हूँ ।
व्याख्या
श्रीरामरक्षास्तोत्र के २६ वें श्लोक में भगवान राम के विभिन्न नामों का उच्चार करते हुए उन्हें नमन किया गया है । यहाँ पहला पावन नाम लक्ष्मणपूर्वजं है । यहाँ पूर्वज का रूढ़िगत अर्थ पूर्वपुरुष न लेकर अग्रज लिया जायेगा । संस्कृत शब्द पूर्वज से तात्पर्य है कि जिसका जन्म पहले हुआ हो अर्थात् जो अग्रजन्मा हो । इस प्रकार लक्ष्मण के पूर्वज यानि उनके अग्रज, बड़े भाई । अतएव राम को लक्ष्मणपूर्वजं कह कर पुकारा । यहाँ दूसरा नाम है रघुवरं, जिससे अभिप्रेत अर्थ है रघुवंश में सबसे श्रेष्ठ । वर शब्द श्रेष्ठता का द्योतक है । अगला नाम सीतापतिं है । सीताजी का नाम भी साथ जुड़ जाने से रामनाम की पवित्रता द्विगुणित ही नहीं बहुगुणित हो उठती है । सुन्दरं कहने से राम की मनोहारी व मनोज्ञ छवि अन्तर में उभरती है ।
भगवान राम को सुन्दर कह कर पुकारने के बाद काकुत्स्थं नाम से उनका वन्दन किया गया है । ककुत्स्थ वंश में जन्म लेने के कारण उन्हें काकुत्स्थ भी कहते हैं । इनके वंश को ककुत्स्थ वंश कहने के पीछे एक पौराणिक कथा है, जो अति संक्षेप में इस प्रकार है । इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न सूर्यवंशी राजा शशाद के पुत्र हुए प्रतापी राजा पुरंजय । कथा है कि एक बार देवों व राक्षसों के बीच हुए युद्ध में देवों को मुँहतोड़ पराजय का सामना करना पड़ा । इससे क्षुब्ध होकर देवराज इन्द्र ने परम प्रतापी राजा पुरंजय से सहायता की प्रार्थना की । पुरंजय इस शर्त पर सहयोग देने के लिये तत्पर हुए कि देवराज इन्द्र स्वयं उन्हें अपने कंधे पर उठा कर चलें । इन्द्र ने शर्त मान ली और बैल का रूप धारण कर लिया । ककुद् कहते हैं भारतीय बैल या साँड़ के कन्धे के उभार अथवा कूबड़ को । बैलरूपधारी इन्द्र के ककुद् यानि कूबड़ पर बैठ कर पुरंजय ने युद्ध में भाग लिया और इस बार राक्षसों को मुँहकी खानी पड़ी और राजा द्वारा राक्षसों का अन्त किया गया । तब से उन्हें ककुद् पर स्थित होने अथवा सवार होने वाले के रूप में जाना जाने लगा और वे ककुत्स्थ: कहलाने लगे । इसके उपरान्त उनके वंशज राजाओं को काकुत्स्थ: उपाधि मिली । इसी ककुत्स्थ वंश में उत्पन्न होने के कारण राम का एक नाम काकुत्स्थ भी है ।
भगवान राम के अगले तीन नाम हैं करुणार्णव, गुणनिधि व विप्रप्रिय, जिनके क्रमश: अर्थ हैं करुणा अथवा दया के सागर । अर्णव का अर्थ होता है सागर व करुणा शब्द उनकी अनुकम्पा व कृपा का द्योतक है । गुणनिधिं कहते हैं गुणों के निधान अथवा भण्डार को । राम सर्वगुणों से संपन्न हैं । उन्हें विप्रप्रियं कह कर पुकारने से अभिप्राय यह है कि विप्र उन्हें अति प्रिय हैं । विप्र शब्द से अभिप्रेत अर्थ है ब्राह्मण, ब्रह्मज्ञानी, तपोधनी मुनिजन । विप्रप्रिय कहने से दूसरा यह अर्थ भी निकलता है कि वे विप्रों के प्रिय हैं । किन्तु पहला अर्थ समीचीन लगता है । उन्होंने लक्ष्मण साथ मिल कर वन में महर्षि विश्वामित्र के आश्रम में राक्षसों से मुनिजनों व उनके यज्ञ की रक्षा की थी । यद्यपि महर्षि विश्वामित्र जन्म से ब्राह्मण न होकर कुलिक वंश में जन्मे राजा थे । यहाँ विप्र शब्द का जातिगत संकुचित अर्थ ग्रहण करना युक्तियुक्त नहीं लगता ।
उपर्युक्त तीन नामों के बाद भगवान राम को धार्मिकं अर्थात् धर्मशील ( धर्मात्मा ) कह कर पुकारा गया है और तत्पश्चात् उन्हें राजेन्द्रं व सत्यसन्धं के नाम से स्मरण किया गया है । जो राजाओं में इन्द्र के समान तेजस्वी हो, सभी राजाओं में सर्वश्रेष्ठ हो, वह होता है राजेन्द्र । उन्हें सत्यसन्ध पुकारने से उनके सत्यप्रतिज्ञ होने का परिचय उजागर होता है । सत्यसन्ध का अर्थ है, जिसकी सन्धा सत्य हो और सन्धा शब्द का अर्थ है प्रतिज्ञा, साहचर्य, मेल आदि । इस प्रकार राम को सत्यसन्ध कह कर उन्हें वन्दन करने से तात्पर्य है कि मैं उन राम की वन्दना करता हूँ, जिनके मुख से निकले बोल का मोल है, जो पूरी दृढ़ता से अपनी की हुई प्रतिज्ञा का पालन करते हैं । अपनी मैत्री का निर्वाह विकट से विकट परिस्थिति में भी करते हैं । इसका प्रसिद्ध दृष्टांत है बालि-वध की घटना ।
इसके बाद भगवान राम को दशरथतनयं अर्थात् दशरथ-पुत्र एवं श्यामलं अर्थात् सांवला कह कर नमन किया गया है । बाद में उन्हें शान्तमूर्तिं व लोकाभिरामं कह कर भी स्तुतिगान किया है । उनका शील (स्वभाव) शान्त और सौम्य है । वे शान्ति की बनी-बनायी मूरत हैं । उनका विग्रह शमित (शांत) है । उन्हें लोकाभिराम कह कर उनके त्रिभुवनमनोहर रूप की स्तुति की गयी है । अभिराम का अर्थ है मंजुल मनोहर और लोक से तात्पर्य है इस संसार से भी तथा तीनों लोकों से भी । रघुकुलतिलक कहने का आशय है कि राम रघुवंशमणि हैं । तिलक पवित्र होता है तथा उसका स्थान ललाट पर होता है । इस प्रकार राम रघुवंश के ललाट को दीप्त करते हैं । उनकी कीर्ति से रघुवंश गौरवान्वित होकर जगमगाता है । रघुवंश में उत्पन्न होने से वे राघव कहलाते हैं । दशकन्धर रावण के रिपु होने से उन्हें रावणारि कह कर नमन किया गया है । संक्षेप में कहें तो उपर्युक्त सभी दिव्य व जगतारण नामों का उच्चार करके भगवान राम को मैं वन्दन करता हूँ, यह भाव इस श्लोक में व्यक्त होता है ।
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