श्रीरामरक्षास्तोत्रम्
श्लोक २८
Shloka 28![]()
श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥
| श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम श्रीराम राम | ||
| श्रीराम | = | हे श्रीराम |
| राम | = | हे राम |
| रघुनन्दन | = | हे रघु के वंशज, पुत्र |
| राम, श्रीराम (पुनः) | = | श्लोक में बार-बार आने वाले सम्बोधन; अर्थ उपर्युक्त |
| भरताग्रज राम राम | ||
| भरताग्रज | → | भरत + अग्रज |
| भरत | = | भरत (अनुज) के |
| अग्रज | = | बड़े भाई (को) |
| श्रीराम राम रणकर्कश राम राम श्रीराम राम | ||
| रणकर्कश | → | रण + कर्कश |
| रण | = | युद्ध में |
| कर्कश | = | कठोर, प्रचण्ड, प्रबल, निष्ठुर |
| शरणं भव राम राम | ||
| शरणम् | = | रक्षक, आश्रय |
| भव | = | बन जाइये, बनें, हों |
अन्वय
(हे) श्रीराम (हे) राम रघुनन्दन राम राम श्रीराम राम भरताग्रज राम राम, राम राम रणकर्कश राम राम श्रीराम राम शरणं भव राम राम ।
भावार्थ
हे श्रीराम ! हे राम ! हे रघु के वंशज ! हे राम राम श्रीराम ! हे भरत के बड़े भैया ! राम राम राम राम हे युद्ध में प्रचण्ड बली ! राम राम श्रीराम राम आप (सदा) मेरे रक्षक हों ।
व्याख्या
श्रीरामरक्षास्तोत्रम् के अठ्ठाइसवें श्लोक में अपने प्रभु श्रीराम को बार-बार पुकारते हुए उनसे विनती की गई है कि वे सदा सर्वदा रक्षक बनें और बनें ही रहें । कहा गया है कि हे श्रीराम ! हे राम ! हे रघुवंश को नन्दित करने वाले अर्थात् रघु के वंशज राम ! नन्दन शब्द का अर्थ पुत्र होता है । पुत्र आनन्द देता है, नन्दित करता है, इसलिये नन्दन से पुत्र का अर्थ ग्रहण किया जाता है ।
आगे पुन: पुन: राम राम कहते हुए फिर उन्हें भरत के बड़े भैया के रूप में पुकारते हुए भरताग्रज कह कर संबोधित करते हैं स्तुतिगायक । तदुपरान्त उन्हें रणकर्कश नाम से पुकारना यह प्रकाशित करता है कि वे रणप्रवीर हैं, रणभूमि में परम प्रचण्ड हैं ।
प्रार्थना है कि हे परम वीर राम ! राम ! आप सदा मेरे रक्षक बनें, मेरा सहारा बनें — शरणं भव — हे राम राम ! श्रीराम !
| श्लोक २७ | अनुक्रमणिका | श्लोक २९ |
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