श्रीरामरक्षास्तोत्रम्

श्लोक २९

Shloka 29

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ श्रीरामचन्द्र + चरणौ
श्रीरामचन्द्र = श्रीरामचन्द्र
चरणौ = के चरणों को
मनसा = मन से
स्मरामि = सुमिरता हूँ
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ = श्रीरामचन्द्र के चरणों की / का
वचसा = वचन से
गृणामि = स्तुति (सराहना) करता हूँ
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ = श्रीरामचन्द्र के चरणों में
शिरसा = शीश (झुका कर)
नमामि = नमन करता हूँ
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये
श्रीरामचन्द्रचरणौ = श्रीरामचन्द्र के चरणों की
शरणम् = शरण, आश्रय
प्रपद्ये = ग्रहण करता हूँ

अन्वय

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ।

भावार्थ

मैं श्रीरामचन्द्र के चरणों को सुमिरता हूँ । श्रीरामचन्द्र के चरणों का अपने वचनों से गुणगान करता हूँ । श्रीरामचन्द्र के चरणों में अपना शीश नमाता हूँ । मैं श्रीरामचन्द्र के चरणों की शरण में जाता हूँ ।

व्याख्या

श्रीरामरक्षास्तोत्रम् के उन्नतीसवें श्लोक में ऋषि की ओर से अथवा साधक की ओर से कहा जा रहा है कि मैं अपने पूरे हृदय से भगवान राम के श्रीचरणों का पावन सुमिरन करता हूँ तथा वचनों से उनके चरणकमलों का गुणगान करता हूँ । भक्त अपने आराध्य के श्रीचरणों में अपना शीश नवाता कर अकुतोभय (भयरहित) हो जाता है । भक्त बड़ी निष्ठा से यह मानता है कि अपने भगवान के पदकमलों में ही शान्ति और मुक्ति की शीतल छाया है, जो उसके त्रिताप व पाप को हर लेती है । अत: वह कह उठता है कि शिरसा नमामि — मैं श्रीराम के चरणों में शीश नमाता हूँ अर्थात् उनके पावन चरणों में माथा टेक कर उन्हें प्रणाम निवेदित करता हूँ ।

 

श्रीराम का भक्त, उनका साधक उनके श्रीचरणों में पूरी श्रद्धा से स्वयं को समर्पित करके सुख पाता है । इस श्लोक का आशय है कि मैं बड़े प्रेम से अपने पतितपावन प्रभु का स्मरण-चिन्तनगुण-कीर्तन करता हूँ, साथ ही उनके चरणों में अपना सिर नवाता कर उनकी शरण ग्रहण करता हूँ ।

 

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में अपने आराध्य श्रीराम की शरणागत-वत्सलता का विस्तृत गुणगान किया है । हनुमानजी सुन्दरकाण्ड में कहते हैं —
सरन गए प्रभु ताहु न त्यागा । बिस्वद्रोह कृत अघ जेहि लागा ॥
— रामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड

 

विभीषण जब प्रभु राम की शरण-ग्रहण करते हैं, तब समस्त भयों से मुक्ति पा जाते हैं और उनकी विनय के सुन्दर बोल उनके मुख से झरने लगते हैं । इसकी एक बानगी दृष्टव्य है —
श्रवन सुजस सुनि आयउं प्रभु भंजन भव भीर ।
त्राहि त्राहि आरतिहरन सरनसुखद रघुबीर ॥४५॥
— रामचरितमानस

 

प्रस्तुत श्लोक पतितपावन श्रीरामचन्द्र के चरणों की शरण ग्रहण करता हुआ पूर्ण होता है । श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये
श्लोक २८ अनुक्रमणिका श्लोक ३०

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