श्रीरामरक्षास्तोत्रम्
श्लोक २७
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रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम: ॥२७॥
| रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे | ||
| रामाय | = | राम को |
| रामभद्राय | = | रामभद्र को |
| रामचन्द्राय | = | रामचन्द्र को |
| वेधसे | = | विधाता (राम) को |
| रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम: | ||
| रघुनाथाय | = | रघुनाथजी को |
| नाथाय | = | (जगत् के) नाथ को |
| सीताया: पतये | → | सीताया: + पतये |
| सीताया: | = | सीता के |
| पतये | = | पति को |
| नम: | = | (मेरा) नमस्कार है |
अन्वय
रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये रामाय नम: ।
भावार्थ
रामभद्र, रामचन्द्र, विधाता, रघुनाथ, ( मेरे व सकल जगत् के ) नाथ, सीताजी के पति राम को मेरा नमस्कार है ।
व्याख्या
श्रीरामरक्षास्तोत्र के २७वें श्लोक में भगवान राम को पुन: एक बार प्रणाम निवेदित किया गया है । यहाँ भी पिछले श्लोकों की भाँति राम को उनके लोकप्रिय नामों से पुकारने का सुख स्तोत्रकार को लब्ध होता है । राम में पूर्णतया आस्था व्यक्त होती है । कहा गया है कि रामभद्र राम, रामचन्द्र राम, विधाता राम को, रघुनाथ राम को, नाथ राम को, सीतापति राम को नमस्कार है ।
वेधसे शब्द का मूलरूप वेधस् है, जो सृष्टा, विधाता, ब्रह्मा, शिव, विष्णु, सूर्य व विद्वान के लिये प्रयुक्त होता है । संस्कृत में, जिसे प्रणाम किया जाता है, उस देव के नाम में चतुर्थी विभक्ति लगती है, अत: वेधस् का रूप वेधसे हो गया । और इसका अर्थ है कि विधाता राम को वन्दन करता हूँ । राम के सभी नामों में इसीलिये चतुर्थी विभक्ति लगी है ।
विधाता के बाद श्रीराम को रघुनाथ कह कर नमस्कार निवेदित किया गया है । वे रघुकुल में सर्वश्रेष्ठ हैं व रघुकुल उनके नाम से सुदीप्त है । आगे उन्हें नाथ कहने से आशय है कि वे जगत् के नाथ हैं तथा मेरे भी नाथ हैं । ऐसे नाथ को नमस्कार है । तत्पश्चात् सीता के पति राम को नमस्कार कहा है । दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि मैं जानकीजी के नाथ को नमस्कार करता हूँ । इस प्रकार राम के छह पावन नाम लेकर इस श्लोक में हमें मिलते हैं ।
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